जब नैहर की बात चली,तो मैंने ही खींची हुई ये तस्वीर मेरे हाथ लगी....मुर्गियाँ अक्सर घरमे आके अंडें देतीं..... ....मज़ेदार बात यह होती,कि, मुर्गा उन्हें अजीब से अजीब जगहें सुझाता(और ये लीडर मुर्गा हद से ज़्यादा बेवकूफ होता है...इन मामलों में) ...जहाँ एक पैर पेभी खड़ा ना रहा जा सके...और रोज़ाना, वही तमाशा दोहराता...अंत में मुर्गी अपनी पसंदीदा जगह पे ही अंडा देती...गर उस वक़्त कुर्सी पे कोई विराजमान होता तो खूब शोर मचाती...और बैठने वाला( जिसमे अक्सर मेरा भाई शुमार होता), नही उठता,तो वो गोद में अंडा देके, भाग लेती और खूब शोर मचाके ऐलान ज़रूर कर देती...! कुर्सी भी चाहे वैसी ही दूसरी क्यों ना हो, मुर्गी को वही स्थान...वही गद्दा, और वही दिशा...चाहिए....बदल नही सकते...वरना शोरसे कान पका देती थीं...!


