Saturday, July 4, 2009

बाबुल प्यारा ...!

जब नैहर की बात चली,तो मैंने ही खींची हुई ये तस्वीर मेरे हाथ लगी....मुर्गियाँ अक्सर घरमे आके अंडें देतीं..... ....मज़ेदार बात यह होती,कि, मुर्गा उन्हें अजीब से अजीब जगहें सुझाता(और ये लीडर मुर्गा हद से ज़्यादा बेवकूफ होता है...इन मामलों में) ...जहाँ एक पैर पेभी खड़ा ना रहा जा सके...और रोज़ाना, वही तमाशा दोहराता...अंत में मुर्गी अपनी पसंदीदा जगह पे ही अंडा देती...
गर उस वक़्त कुर्सी पे कोई विराजमान होता तो खूब शोर मचाती...और बैठने वाला( जिसमे अक्सर मेरा भाई शुमार होता), नही उठता,तो वो गोद में अंडा देके, भाग लेती और खूब शोर मचाके ऐलान ज़रूर कर देती...! कुर्सी भी चाहे वैसी ही दूसरी क्यों ना हो, मुर्गी को वही स्थान...वही गद्दा, और वही दिशा...चाहिए....बदल नही सकते...वरना शोरसे कान पका देती थीं...!

वो घर बुलाता है...

जब,जब पुरानी तस्वीरे
कुछ यांदें ताज़ा करती हैं ,
हंसते हसतेंभी मेरी
आँखें भर आती हैं!
वो गाँव निगाहोंमे बसता है
फिर सबकुछ ओझल होता है,
घर बचपन का मुझे बुलाता है,
जिसका पिछला दरवाज़ा
खालिहानोमें खुलता था ,
हमेशा खुलाही रहता था
वो पेड नीमका आंगन मे,
जिसपे झूला पड़ता था!
सपनोंमे शहज़ादी आती थी ,
माँ जो कहानी सुनाती थी!
वो घर जो अब "वो घर"नही,
अब भी ख्वाबोमे आता है
बिलकुल वैसाही दिखता है,
जैसाकी वो अब नही!
लकड़ी का चूल्हाभी दिखता है,
दिलसे धुआँसा उठता है,
चूल्हातो ठंडा पड़ गया
सीना धीरे धीरे सुलगता है,
बरसती बदरीको मै
बंद खिड्कीसे देखती हूँ
भीगनेसे बचती हूँ
"भिगो मत"कहेनेवाले
कोयीभी मेरे पास नही
तो भीगनेभी मज़ाभी नही।
जब दिन अँधेरे होते हैं
मै रौशन दान जलाती हूँ
अँधेरेसे कतराती हूँ
पास मेरे वो गोदी नही
जहाँ मै सिर छुपा लूँ
वो हाथभी पास नही
जो बालोंपे फिरता था
डरको दूर भगाता था।
खुशबू अब भी है आती
जब पुराने कपड़ों मे पडी
सूखी मोलश्री मिल जाती
हर सूनीसी दोपहरमे
मेरी संसोंमें भर जाती,
कितना याद दिला जाती ,
नन्ही लडकी सामने आती
जिसे आरज़ू थी बडे होनेके
जब दिन छोटे लगते थे,
जब परछाई लम्बी होती थी,
यें यादे कैसी होती?
कडी धूपमे ताजी रहती है !
ये कैसे नही सूखती?
ये कैसे नही मुरझाती ?
ये क्या चमत्कार है?
पर ठीक ही है जोभी है,
चाहे वो रुला जाती है,
दिलको सुकूनभी पहुँचाती,
बांते पुरानी होकेभी,
लगती हैं कलहीकी
जब पीली तसवीरें,
मेरे सीनेसे चिपकती हैं,
जब होठोंपे मुस्कान खिलती है
जब आँखें रिमझिम झरती हैं
जो खो गया, ढूँढे नही मिलेगा,
बात पतेकी मुझहीसे कहती हैं ....

शमा
('झरोखे-बचपन के' इस रचना के रचयिता को समर्पित ! जानती हूँ, बेहद अदना-सी व्‍यक्ति की, साधारण-सी रचना है.....फिर भी... )

शराबियों की लेटा लाटी (अविनाश वाचस्‍पति)

हंसते रहो हंसाते रहो
http://hansterahohansateraho.blogspot.com/2009/07/blog-post_04.html
नुक्‍कड़ वाले भी वंचित न रहें

Friday, July 3, 2009

झरोखे ..बचपन के

संवरता रहा निखरता रहा मैं,
समयचक्र के संग सदा चलता रहा मैं,
मगर जब कभी बीते पल को निहारा,
सहमने लगा, मचलता रहा मैं.

सहारा जो कल थे कहाँ अब गये वो ,
ये उलझन बड़ी है सुलझती नहीं,
हर एक पल संवारे कहाँ,खो गये वो
ये कहता रहा, खुद से सुनता रहा मैं,

वो दादी के किस्से वो बाबा की बातें,
पुराने हुए पर रही बात बाकी,
हर पल, दो पल जि‍तने भी पल थे,
गुजरते गये बस रही याद बाकी,

उन्ही चन्द लम्हों को फिर से ,
पिरोया तो दिल के झरोखे से आवाज़ आई,
अधूरी कहानी के वो लफ़्ज अंतिम,
बढ़ाते ही रहना सुनो मेरे भाई,

ये मीठी सी चुभती ‍जो दस्तक हुई ,
किया गौर देखा मेरे यार भाई,
वो कहते थे ऐ दोस्त पूरा करो,
जो बचपन में हमने कहानी बनाई,

अचानक तभी दिल के दो तार झूमे ,
लगा जैसे दादी की आवाज़ आई,
अरे मेरे बच्चे ये क्या कर रहा तू,
अभी तक तूने ना वो मंजिल पाई,

संभलके भी चलना न तुझको आया
कदम से कदम मिलाकर चलो,
करो याद चलना संभल कर के बेटा,
जो उंगली पकड़ कर के हमने सिखाई,

ये शिकवे थे उनके जो साहस लगे,
मगर मैं बहुत दूर तक आ चुका था,
वो बचपन की बातें नयी फिर हुईं ,
जवानी की दहलीज़ पर जब रुका था,

जो रुक कर चला तो लगा मुझको ऐसे ,
यही सब सहारा हमारे लिए
वो यारो के सपनों से है राह जाती,
बने जो किनारा हमारे लिए,

हो ख्वाब सच जो हमने था देखा,
वो संकट भी चाहे हो जितना बड़ा,
बचपन के सपने भी होते हैं सच ,
जो हिम्मत से करने को खुद हूं अड़ा,

कहानी कहानी में मंज़िल मिली थी,
हक़ीक़त में भी उसको पा कर रहूँगा ,
दुआओं से यारों की मुश्किल हटेगी,
सपना एक हक़ीक़त बना कर रहूँगा ,

मैं सपना हक़ीक़त बना कर रहूँगा.

बरखा रानी....!

"बरखा रानी ! आओ ना, आ जाओना, इतना भी तरसाओ ना, ...के इंतज़ार है एक 'शम्म' को तुम्हारा...के इंतज़ार है, इस क़ुदरत के हर पौधे, हर बूटेको, तुम्हारा... के तुमबिन सरजन हार कौन है इनका?के तुमबिन पालन हार कौन है इनका?"

चंद रोज़ पूर्व, अपने "बागवानी" ब्लॉग पे कुछ लिखा तथा अंत में "बरखा रानी से " ये दरख्वास्त की...उसी शाम वो हाज़िर हो गयीं...माहौल धुला और क़ुदरत ने एक पन्ने का जामा पहना !
आमंत्रण है आप सभीको उस ब्लॉग पे...ये ब्लॉग, केवल मालूमात नही है, ज़िंदगी के प्रती, यादों से घिरा नज़रिया है...
एक साल पहले " बागवानी की एक शाम " ये आलेख लिखा था..इत्तेफाक़न वो पर्यावरण दिवस था..अन्य पौधों के अलावा, एक चम्पे की डाल भी लगाई थी, जिसपे पहली बार ४/५ दिन पूर्व फूल खिले !

इन दो शामों में एक दिलको कचोट ने वाला फ़र्क़ है...जिसे आप मेरे आलेख मे ही पढ़ें...जो,

http://shamasansmaran.blogspot.com

इस ब्लॉग पेभी डाल दिया...डाले बिना रहा नही गया....

http://shama-baagwaanee.blogspot.com
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