
मीडिया के बदलते स्वरुप और उसकी भूमिका पर स्व.‘प्रभाष जोशी’ से 2007में इंटरव्यू लिया था। मीडिया मंत्र का पहला इंटरव्यू। पहली मुलाकात में हमलोगों से ऐसे मिले जैसे वर्षों से जानते हैं। बड़ी आत्मीयता और सहजता से मिले। गंभीरता से हमारी बात सुनी। हमारी हिम्मत बढाई और पत्रिका के लिए शुभकामना दी। प्रभाष जोशी जी का जाना हम जैसे युवा पत्रकारों के लिए भी एक गहरा सदमा है. मेरे लिए बहुत खास थे. मेरी पत्रिका मीडिया मंत्र का विमोचन उनके ही शुभ हाथों से हुआ था. उनसे मुलाकात कम होती थी लेकिन हमेशा उन्हें अपने करीब महसूस करता था. मीडिया मंत्र को लेकर जब भी कोई बड़ा संकट पैदा होता था तो बरबस उनकी बात याद आ जाती थी कि जब तक रगड़ाई नहीं होती तबतक चमक नहीं आती. उनकी यह बात हमेशा संघर्ष के लिए प्रेरित करती रहती है।
सवाल : मीडिया क्या है?जो भी कुछ संचार के लायक है, उसको लोगों तक पहुँचाना चाहिए। मीडिया की मूल प्रेरणा यही है। सूचना में तथ्यों की तरफ ज्यादा ध्यान दिया जाना चाहिए बजाय दूसरी बातों के । जब आप तथ्य बता देंगे तो इसके आधार पर राय बनाई जा सकती है। "टी।आर.पी. के खेल को मैं पत्रकारिता नहीं मानता। जिसे जो दिखाना है वो दिखाए और हमें भी यह समझ लेना चाहिए कि वो मनोरंजन कर रहे हैं। यदि रास्ते में बैठकर कोई मदारी डमरू बजाते हुए बंदरिया नचा रहा तो उसको ये करने दीजिए, उसे ये हक है पर जिसे खबर देखनी होगी वह वहाँ नहीं जाएगा।"
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प्रभाष जोशी जी के निधन की खबर दिल्ली से प्रकाशित होने वाले एक तथाकथित राष्ट्रीय अखबार में नहीं छपी. इतनी कटुता...? इतनी घृणा...? अरे भाई, आदमी हमेशा के लिए चल बसा. अब तो दुराग्रह से मुक्त हो जाओ सम्पादकजी...अपनी इसी ओछी मानसिकता के कारण कुछ संपादक मालिक के अच्छे नौकर तो बने रहते है लेकिन वे पत्रकारिता के कलंक ही माने जाते है. प्रभाष जोशी का अचानक ऐसे चला जाना उन लोगों के लिए दुखद घटना है जो पत्रकारिता को मिशन की तरह लेते थे और वैसा व्यवहार भी करते थे। जोशी जी के जाने के वाद अब लम्बे समय तक दूसरा प्रभाष जोशी पैदा नहीं होगा। राजेंद्र माथुर जी के जाने के बाद प्रभाष जोशी ने उनके रिक्त स्थान को जैसे भर दिया था। एक नए तेवर, नई दृष्टि के साथ हिंदी पत्रकारिता को उन्होंने एक ऐसा मोड़ दिया, जैसा पहले किसी ने नहीं दिया था।
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आज सुबह आघात पहुंचाने वाली यह खबर मिली कि जानमाने पत्रकार प्रभाष जोशी का कल रात दिल का दौरा पड़ने से निधन हो गया। हिन्दी पत्रकारिता के लिए यह सचमुच बहुत बड़ी क्षति है। जनसत्ता और प्रभाष जोशी अस्सी और नब्बे के दशक में एक दूसरे के पयार्य थे। पूरे अखबार में उनके लेखन की झलक दिखाई देती थी।
उनका साप्ताहिक कालम कागद कारे बहुत लोकप्रिय था और मुझे तो बहुत पसंद था। बावजूद इसके कि कई बार उसमें वे बहुत अतिरेक में लिख जाते थे। क्रिकेट के वे दीवाने थे। भले ही हमने कोई मैच टीवी पर पूरा देखा हो,पर अगले दिन अखबार में उनके द्वारा लिखा आंखों देखा हाल पढ़ना अलग आनंद देता था। सचिन उनके लिए भगवान से कम नहीं थे। सचिन के खिलाफ सुनना उन्हें ऐसा लगता था जैसे कोई उनके बेटे की आलोचना कर रहा हो। कुछ महीने पहले भोपाल में माधवराव सप्रे संग्रहालय के एक आयोजन में उनसे रूबरू मिलने का मौका मिला था। अपने लेखन की तरह वे उतने ही सहज लगे।
यह दुखद संयोग ही है कि कल रात जब आस्ट्रेलिया के खिलाफ हारे हुए मैच में सचिन तेंदुलकर ने 175 रन बनाए, उसके कुछ घंटे बाद ही प्रभाष जी ने अंतिम सांस लीं। कल के मैच में सचिन तेंदुलकर अपनी ख्याति के उलट बेहद खराब शाट खेलकर आउट हुए। नतीजा, भारत की बाकी टीम दबाव नहीं सह पाई और तीन रन से हार गई। देश भर के क्रिकेटप्रेमी यह मैच देख रहे थे। मेरा मानना है कि निश्चित रूप से प्रभाषजी भी यह मैच देख रहे होंगे। ( या मैच की खबर किसी न किसी रूप में उन तक पहुंच रही होगी।) कहीं सचिन का इस तरह आउट होना और लक्ष्य के इतने करीब पहुंचकर भारत का हार जाना ही प्रभाष जी के दिल के दौरे का कारण तो नहीं बना?
बहरहाल प्रभाष जी, उनकी पत्रकारिता और उनके क्रिकेट प्रेम को सलाम।
0 राजेश उत्साही
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