जन्मदिन तो है नहीं भी है
है तो इंदिरा गांधी जी का
नहीं है तो अविनाश वाचस्पति का।
पर जब लिख रहे हैं यहां
तो कुछ तो है खास बात
जिक्र करते हैं यहां।
अविनाश जी गोवा में हैं
नहीं हैं दिल्ली में
विवाह की 25वीं वर्षगांठ है।
करें क्या हम क्या न करें
हम इसी सोच विचार में
बैठे हैं फोन पर दें बधाई।
यह बात हमें
नहीं भाई
इसलिए उन्हीं के नुक्कड़ पर
है यह पोस्ट लगाई।
तो पूछते हैं
हम पहेली आपको यह पहेली समझ में आई
आई तो बतलायें नहीं आई तो बतलायें।
पहेली पूछना
हमारा कर्म है
उत्तर देना आप सबका धर्म है
इस धर्म कर्म में छिपा एक मर्म है।

जिसकी रही प्रतीक्षा
वो दिन भी आ गया
बाल दिवस से अच्छा
कोई अवसर होगा क्या
नुक्कड़ सर्वोत्तम बाल कविता सम्मान
के लिए चयन किया गया है
सुधीर सक्सेना 'सुधि'का उनकी बाल कविता
ऐसे भी दिन आएं
के लिए
बधाई।
विस्तृत रिपोर्ट बाद में प्रस्तुत की जाएगी।
आप तो कविता का आनंद लीजिए
और सुधीर जी को मन से बधाई दीजिए।
ऐसे भी दिन आएंजी करता है मित्रो
फिर से ऐसे भी दिन आएं-
डगमग चलता
बचपन लौटे
जामुन तोड़ने जाऊं.
लाठी लेकर माली भागे
लेकिन हाथ न आऊं.
घर पर आ नित
करें शिकायत
पडोसी काका-ताऊ.
मीठी झिड़की दें दादाजी
मां से थप्पड़ खाऊं.
नहीं करेगा अब शैतानी
दादीजी समझाएं.
दिन भर गाल फुलाए बैठूं
अकडू और इतराऊं.
लौटें शाम को पापा तो
टसुए खूब बहाऊँ.
खाएं तरस, पर्स संग लेकर
वे 'बज्जी' ले जाएं.
ऐसे भी दिन आएं!
पोस्ट पढ़ने के लिये नीचे संबंधित बॉक्स के लिंक पर चटका लगायें -