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"विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य" और "यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी 2012"




`यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी 2012' और ग्रंथ का प्रकाशन :  (डॉ.) कविता वाचक्नवी 

विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य' और "यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी 2012"
- डॉ. कविता वाचक्नवी


आज का सुप्रभात दरवाजे पर तेज खटखटाए जाने पर टूटी नींद से हुआ ।

 डाक में हिन्दी बुक सेंटर से अभी अभी कुछ ही दिन पूर्व प्रकाशित -  " विदेशी भाषा के रूप में हिन्दी शिक्षण : परिदृश्य : संगोष्ठी समग्र "  ग्रंथ की लेखकीय प्रति मिली है। 

यह ग्रंथ प्रोफेसर श्रीश चंद्र जैसवाल जी के सम्पादन में छपा है और स्पेन के वय्यादोलिद विश्वविद्यालय में हुई यूरोपीय हिन्दी संगोष्ठी (15-17 मार्च 2012)    में  प्रस्तुत किए गए सभी शोध पत्रों का संकलन है। 

पूरा ग्रंथ आर्ट पेपर जैसे कागज़ पर छपा है। ग्रंथ के स्वत्वाधिकार हिन्दी विभाग, विदेश मंत्रालय के पास सुरक्षित हैं। 

कुल 32 आलेख इसमें संकलित हैं।  लेखों का क्रम सत्रवार रखा गया है।
मेरे आलेख " भाषा प्रकार्यों के अधुनातन संदर्भ और हिन्दी " को पृष्ठ  46 से 51 पर पढ़ा जा सकता है।


प्रकाशक का पूरा पता है  -

हिन्दी बुक सेंटर 
4/5-बी, आसफ अली रोड, नई दिल्ली 110 002 


सम्मिलित लेखक हैं -

सर्वश्री


  • उदय नारायण सिंह (विश्वभारती शांति निकेतन )
  • अफजाल अहमद (Lisboa)
  • अलका आत्रेय चूडाल (ऑस्ट्रिया)
  • आलेसांद्रा कोंसोलारो (इटली)
  • यूस्तीना कुरोव्स्का (बॉन, जर्मनी)
  • महेंद्र किशोर वर्मा (यॉर्क)
  • रमेश चन्द्र शाह (बेल्जियम)
  • ऐश्वर्ज कुमार (केंब्रिज )
  • गेनादी श्लोम्पेर (इज़राईल)
  • हर्मन वान ऑल्फेन (अमेरिका)
  • कविता वाचक्नवी (लंदन )
  • अरुण प्रकाश मिश्रा (स्लोवेनिया)
  • बिलजाना ज़्रनिक (क्रोएशिया )
  • दानूता स्ताशिक (पोलैंड )
  • हैंज़ वेर्नर वैस्लर (उपासला, स्वीडन )
  • इंदिरा गाज़िएवा (मॉस्को)
  • लुदमीला खोखलोवा (मॉस्को)
  • सबीना पोपर्लान (बुखारेस्ट, रोमानिया )
  • विजया सती (बुदापैस्ट)
  • मोहन कान्त गौतम (नीदरलैंड)
  • जगन्नाथ वी. आर. (वर्धा )
  • वैश्ना नारंग (दिल्ली)
  • कैलाश नारायण तिवारी (पोलैंड )
  • नवीन चंद्र लोहानी (स्विट्जरलैंड)
  • एस. वी. एस. एस. नारायण राजू (बुल्गारिया)
  • तात्याना औरन्स्कया (हैम्बर्ग, जर्मनी)
  • शिव कुमार सिंह (लिस्बन, पुर्तगाल )
  • दीप्ति गोलानी (बार्सेलोना, स्पेन)
  • श्रीश चंद्र जैसवाल (वय्यादोलिद, स्पेन)
  • अशोक चक्रधर (दिल्ली)
  • विभूति नारायण राय (वर्धा)
  • पूनम जुनेजा (मॉरीशस)


स्पेन संगोष्ठी के बारे में अधिक जानने व चित्रों के लिए निम्नलिखित लिंक्स क्लिक कर देखें - 


योरोपीय हिन्दी कॉन्फ्रेंस 2012
यूरोपीय हिन्दी कॉन्फ्रेंस 2012, स्पेन से लौटकर 
यूरोपीय हिन्दी कॉन्फ्रेंस और स्पेन : जैसा मैंने देखा 
यूरोपीय हिंदी संगोष्ठी,स्पेन, 2012 :समग्र रिपोर्ट व विवरण

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हिन्‍दी दिवस पर हिन्‍दी में ही हंसना अच्‍छा लगता है


हिन्‍दी की हंसी

हम हिंदी की ताकत कम होने और उसका असर कम होने का रोना साल भर रोते हैं तथा आजादी के बाद से लगातार रो रहे हैंवो मुझे तो बिल्‍कुल ठीक नहीं लगता है। आप सरकारी फाईलों, प्राइवेट पत्र-व्‍यवहार कार्यकलापोंदुकानोंदफ्तरों के साइन बोर्ड हिंदी में करके कौन सी मंजिल को पाना चाह रहे हैं। इतने सारे हिंदी अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन होता है। आखिर वो सब बाद में रद्दी बनकर कबाड़ में ही तो जाती हैं और सरकारी फाईलों और दस्‍तावेजों का निपटान एक पूरी रस्‍म अदायगी और औपचारिकताओं के बीच उन्‍हें फूंक कर किया जाता है।
अब आप चाह रहे हैं कि हिंदी में खूब काम होपुस्‍तकों का भी प्रकाशन हो और बाद में वे रद्दी के भाव बिकें या थोक खरीद के बाद लाईब्रेरियों में सड़ती रहें। तो इससे आप हिंदी समाज को क्‍या देना चाह रहे हैं और क्‍या दे पा रहे हैं। आप हिंदी में बोल रहे हैंबातचीत कर रहे हैं और आप यह जानते हैं कि हिंदी का सर्वाधिक प्रयोग बातचीत इत्‍यादि में खूब धड़ल्‍ले से किया जाता है और फिर उस बातचीत के कबाड़ में पहुंचने का खतरा भी नहीं रहता है। इस तरह से अनपढ़ और लिखना न जानने वाला भी हिंदी के समुचित विकास में सक्रिय सहयोग कर रहा है। आप उसके कार्यों और उसकी उपलब्धियों  और सक्रियता को किसी गिनती में नहीं गिन रहे हैं। आपको रेलोंहवाई जहाजोंसड़कदफ्तरों में सर्वाधिक प्रतिशत हिंदी में बात करने वालों का मिलता हैकभी कभार ही कुछ लोग अंग्रेजी में लड़ाई करते दिखलाई देते हैं लेकिन जब वे गाली गुच्‍चा करते हैं तो हिंदी का ही प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी में गाली देने में वो बात ही नहीं है जो हिंदी में सहज ही आती है। फिर भी आप हिदी के प्रचार प्रसार को लेकर न जाने क्‍यों चिंतित हैं।
आपने पुरस्‍कार बांटने हैं तो हिंदी में बातचीत करने वालों को एकदम मौके पर पकड़कर पुरस्‍कृत कर दीजिए। जैसे आप सिगरेट पीने अथवा ट्रैफिक नियम तोड़ने वालों के चालान करते हैं,, फिर देखिए आपका हिंदी के उत्‍थान में लगा पैसा हिंदी के विकास में किस बेतरह बढ़ोतरी करता है। आपके इस क्रांतिकारी कदम से उन पब्लिक स्‍कूलों में भी जागृति आएगी जिन्‍होंने हिंदी में बात करने को दंडनीय अपराध बनाकर रखा हुआ है। पुरस्‍कार और नकद पुरस्‍कार का लालच इंसान से जो न करवाए थोड़ा है और यह कदम हिंदी की बढ़ोतरी में सहायक होगा। कई नए नए कीर्तिमान बनेंगे। इसे भ्रष्‍टाचार भी नहीं कहा जा सकता क्‍योंकि यह तो भाषाई विकास के महत्‍वपूर्ण प्रयासों में शामिल किया जाएगा।
इसी प्रकार कोई किसी से अंग्रेजी में बात करे और सामने वाला हिंदी में जवाब दे तो उसे विशेष तौर पर सम्‍मानित किया जाना चाहिए। जिससे अंग्रेजी बोलने वाले को अपनी मूर्खता का अहसास हो और अगली बार से वो भी हिंदी में बात करता मिले। इस बार हिंदी में बात करने की पहल भी उसी की ओर से की गई होगी। मैंने तो महसूस किया है कि इंसान अपनी बात सामने वाले तक पहुंचाने के लिए किसी भी भाषा में बात करे परंतु वे सदैव हंसते खिलखिलाते सदा हिंदी में ही नजर आते हैं। मुस्‍कराते भी सभी हिंदी में ही हैं और ऐसी मुस्‍कराहट बहुत भली लगती है। हंसना खिलखिलाना प्रफुल्‍लता इत्‍यादि हिंदी में ही होते हैं और अच्‍छे लगते हैं जबकि कोई उदास होरो रहा हो तो उसके चहरे से साफ झलक जाता है कि इसकी यह हरकत अंग्रेजी में हैउसके चेहरे से ऐसा ही बोध होता है।
तो फिर एक हिंदी आंदोलन चलाने के लिए इस हिंदी दिवस पर संकल्‍प लीजिए कि भ्रष्‍टाचार मिटाने की तर्ज पर हिंदी अपनाने के लिए उपर्युक्‍त और अन्‍य कारगर उपायों पर चिंतन और अमल आज से ही सरकारी और गैर सरकारी कार्यालय करना शुरू कर देंगे और हम सब अपने प्राणपण से इसमें भरपूर सहयोग देंगे।
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एक हिन्‍दी ब्‍लॉग ने खुदकुशी कर ली

अभी अभी विश्‍वस्‍त सूत्रों से खबर मिली है कि हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत के एक मशहूर ब्‍लॉग ने खुदकुशी कर ली है। ब्‍लॉग की पोस्‍ट में कहा गया है कि यह खुदकुशी वो खुदखुशी से कर रहा है। इस हादसे के लिए उसका ब्‍लॉगर जिम्‍मेदार नहीं है।
गूगल पुलिस ने इस संबंध में जो वक्‍तव्‍य दिया है, वो वास्‍तव में हैरान करने वाला है। वक्‍तव्‍य में कहा गया है कि ब्‍लॉग चाहे तो भी स्‍वयं खुदकुशी नहीं कर सकता है। इसमें जरूर उस ब्‍लॉगर का षडयंत्र शामिल है, जिसने उस ब्‍लॉग का निर्माण किया था।
यह भी बतलाया गया है कि टिप्‍पणियों की कम संख्‍या के मद्देनजर ब्‍लॉग ने यह आत्‍मघाती कदम उठाया है।
इससे उन ब्‍लॉगों के ब्‍लॉगर डरे हुए हैं, जिनके ब्‍लॉगों पर कम टिप्‍पणियां या बिल्‍कुल टिप्‍पणियां नहीं आती हैं।
कुछ ब्‍लॉगरों ने तो इस दुर्घटना के लिए ब्‍लॉगवाणी और चिट्ठाजगत को जिम्‍मेदार ठहराया है। उन्‍होंने कहा है कि अगर दोनों एग्रीगेटर बंद न होते तो ब्‍लॉग को खुदकुशी के लिए ऐसा गैर-जिम्‍मेदाराना कदम नहीं उठाना पड़ता।
कुल मिलाकर स्थिति भी सोचनीय है कि क्‍यों गूगल उस ब्‍लॉग को जीवनदान दे देता है। उस पर ऐलोवेरा की पोस्‍ट लगाने से ब्‍लॉग में प्राण वापिस लौट सकते हैं।
इस हादसे पर कनाडा स्थित उड़नतश्‍तरी ब्‍लॉग के मॉडरेटर ने कहा है कि वे तो सदा से ही टिप्‍पणियां बिना किसी भेद भाव के देते  रहे हैं, उन्‍हें पहले से ही अंदेशा था, कि ब्‍लॉग जगत में कभी कुछ ऐसा घट सकता है। सामूहिक ब्‍लॉग नुक्‍कड़ ने इस घटना/दुर्घटना की जिम्‍मेदारी तो सब ब्‍लॉगरों को सूचित करने की जिम्‍मेदारी तो ली है परंतु उसका नाम बतलाने से पहले ही ठिठक गया है। अब आप बतलायें कि वो ब्‍लॉग कौन सा है, उस ब्‍लॉगर का क्‍या नाम है ?
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हिन्दी यूएनओ की भाषा बने - अनिरूद्ध जगन्नाथ (राष्ट्रपति, मारीशस)

रायपुरमारीशस के राष्ट्रपति श्री अनिरूद्ध जगन्नाथ ने कहा कि छत्तीसगढ़, भारत की साहित्यिक संस्था सृजन सम्मान द्वारा विश्वभर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार, साहित्यकारों का सम्मान एवं हिन्दी की जो सेवा की जा रही है वह प्रशंसनीय है। उन्होंने कहा कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषाओं में सम्मिलित करने का प्रयास करना अच्छी बात है। यह विचार उन्होंने भारत के छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक संस्था सृजन सम्मान द्वारा आयोजित साहित्यिक भ्रमण के अंतर्गत संस्था के राष्ट्रीय महासचिव एवं यात्रा संयोजक द्वय जयप्रकाश मानस एवं एच.एस.टाकुर के नेतृत्व में मारीशस पहुँचे यात्रा समूह के सदस्यों के साथ आयोजित एक बैठक में व्यक्त किए। उन्होंने संस्था द्वारा किए जा रहे कार्यों पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए मारीशस की अर्थव्यवस्था एवं उपलब्ध सुविधाओं के बारे में भी सदस्यों से बातचीत की। इस अवसर पर मारीशस की प्रथम महिला श्रीमती सरोजनी जगन्नाथ विशेष रूप से उपस्थित थी।

तृतीय अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन बाली (इंडोनेशिया) में
बैठक के आरंभ में जयप्रकाश मानस ने पुस्तकें भेंटकर राष्ट्रपति का स्वागत किया। अपने स्वागत उद्बोधन में मानस ने व्यस्तता के बावजूद भारतीय साहित्यकारों के दल को समय देने के लिए राष्ट्रपति के प्रति आभार व्यक्त करते हुए संस्था के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्था के माध्यम से मारीशस में द्वितीय हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया गया। गतवर्ष पहला अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन थाईलैंड में किया गया था । हिन्दी दिवस के अवसर पर मारीशस के 7 वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान भी किया गया। उन्होंने राष्ट्रपति को अवगत कराया कि भविष्य में हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषाओं में सम्मिलित किए जाने का प्रयास जारी है और इस सिलसिले में अगले साल इंडोनेशिया (बाली) में तृतीय अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन करने का निर्णय लिया गया है।
राष्ट्रपति भवन में साहित्यकारों का दल
इस अवसर पर छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का एक पत्र एवं बस्तर के कलाकारों द्वारा निर्मित धातु शिल्प भी राष्ट्रपति को सौंपा गया। इसके अलावा अनेक साहित्यकारों ने अपनी पुस्तकें तथा फ़िलाटेलिक सोसायटी ऑफ इंडिया की छत्तीसगढ़ इकाई की ओर से भारत के साहित्यकारों एवं अगले माह आयोजित होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों पर केन्द्रित भारतीय डाक टिकटों के दो एलबम भेंट किए गए। तत्पश्चात राष्ट्रपति के साथ सदस्यों का एक फ़ोटो सत्र का आयोजन किया गया। जिसमें प्रथम महिला एवं बड़ी संख्या में मारीशस के शिक्षाविद एवं साहित्यकार भी सम्मिलित थे। राष्ट्रपति भवन की ओर से सदस्यों के लिए स्वल्पाहार का आयोजन भी किया गया था।

उल्लेखनीय है कि साहित्यिक संस्था सृजन सम्मान द्वारा संस्था के महासचिव जयप्रकाश मानस के नेतृत्व में विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर 10 से 18 सितम्बर तक मारीशस का साहित्यिक, सांस्कृतिक पर्यटन अध्ययन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें देशभर के 61 सदस्यों ने भाग लिया।
हिन्दी का संसार एवं संसार की हिन्दी विषय पर संगोष्ठी
भ्रमण के दौरान मारीशस सरकार द्वारा गठित सांस्कृतिक प्रतिष्ठान हिन्दी स्पीकिंग यूनियन द्वारा हिन्दी दिवस पर हिन्दी का संसार एवं संसार की हिन्दी विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। प्रथम सत्र के मुख्य अतिथि थे हिन्दी के वरिष्ठ उपन्यासकार अभिमन्यु अनत और अध्यक्षता की जयप्रकाश मानस ने । द्वितीय सत्र में कृतियों का विमोचन एवं मॉरीशस के साहित्यकारों का अंलकरण कार्यक्रम आयोजित था । इस सत्र के मुख्य अतिथि थे - मारीशस के संस्कृति एवं कला मंत्री श्री मुखेश्वर शोन्नी ।

मॉरीशस के 7 साहित्यकारों को सृजनश्री अंलकरण
इस अवसर पर सृजन-सम्मान द्वारा वहाँ के वरिष्ठ 7 साहित्यकारों को सृजन-श्री अंलकरण से अलंकृत किया गया । सम्मानित साहित्यकारों को शॉल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह एवं प्रशस्ति पत्र भेंट कर सम्मान किया गया। जिसमें उपन्यास के लिए मारीशस के श्री अभिमन्यु अनत, कहानी के लिए प्रकारेश धुरंधर, नाटक के लिए महेश राम जीयावन, कविता के लिए पूजा नंद नेमा, महिला विमर्श के लिए भानुमति नागदान, हिन्दी सेवा के लिए स्व.मुनेश्वर लाल चिन्तामणी के अलावा महात्मा गांधी संस्थान के वरिष्ठ व्याख्याता एवं कार्यक्रम के संयोजक विनय गोदारी को सृजन श्री सम्मान से विभूषित किया गया। संगोष्ठी में भारत से मारीशस पहुँचे अनेक साहित्यकारों की पुस्तकों, पत्रिकाओं एवं गीतों के कैसेटों का विमोचन भी किया गया। इसके अलावा सदस्यों ने महात्मा गांधी संस्थान का भ्रमण किया। संस्थान के विभागाध्यक्ष एवं अन्य प्राध्यापकों ने प्रतिष्ठान की गतिविधियों की जानकारी दी। साथ ही प्रतिष्ठान द्वारा संचालित हिन्दी प्रचार अभियान के अंतर्गत नुक्कड़ नाटक का अवलोकन किया।


इस सांस्कृतिक अध्ययन दल में यात्रा संयोजक जयप्रकाश मानस एवं एच.एस.ठाकुर सहित छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति विभाग के संचालक राजीव श्रीवास्तव, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, डॉ.महेन्द्र ठाकुर, दीपक पाचपोर, सुरेश तिवारी, चेतन भारती, संजीव ठाकुर, डॉ.निरुपमा शर्मा, डॉ.सीमा श्रीवास्तव, लतिका भावे, शकुन्तला तरार, अरूणा चौहान,अरविन्द मिश्रा, कुमेश कुमार जैन, नागेन्द्र दुबे, टामन सिंह सोनवानी, श्रीमती पदमनी सिंह, अभिषेक सोनवानी, ललित गणवीर, श्रीमती गणवीर, जी.एस.बाम्बरा, श्रीमती आर.बाम्बरा, प्रतापचंद पारख, सत्यपाल,  श्रीकांत अग्रवाल, रमाकांत अग्रवाल, बिलासपुर के राजेश सोन्थलिया, रायगढ़ के सत्यदेव शर्मा, संजय तिवारी, उसत राम, भीखलाल पटेल,  सुरेश पंडा, सुरेश छत्री, श्रीमती क्षत्री, अर्जुन दास, देवानी,  एम.आर.ठाकुर, समुन्द सिंह, मिश्री लाल पाण्डे, राजेश तिवारी, सरायपाली के मीनकेतन दास, नागपुर महाराष्ट्र के भाषाविद डॉ.रामप्रकाश सक्सेना, हनुमन्त ठाकरे, नागेन्द्र अन्नाराव, रामदेव खुशहाल राव, बंडोपाद्ये यशवंत, नरेन्द्र दंडारे, उत्तराखण्ड नैनीताल के दिवाकर भट्ट, मध्यप्रदेश भोपाल के  डी.पी.सक्सेना, मधु सक्सेना, प्रकाशचंद तापड़े, अरूणा तापड़े एवं सृजन-सम्मान के यात्रा-पार्टनर क्रियेटिव ट्रेव्हलर्स के प्रमुख विकास मल्होत्रा आदि सम्मिलित थे।
(मारीशस से लौटकर हीरामन सिंह ठाकुर)
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ब्लॉगिंग करने पर ब्लॉगरों पर टैक्स लगेगा ? अब सर पर बैठेगी कार

ब्लॉगिंग करना जुर्म तो नहीं होने वाला परन्तु तेजी से इसकी लोकप्रियता के मद्देनजर इसे टैक्स के दायरे में लाने का सरकार ने मन बना लिया है। पर कर का यह कहर सिर्फ हिन्दी ब्लॉगिंग पर ही क्यों, जबकि हिन्दी ब्लॉगिंग तो अभी अपने बचपन में ही है और इससे आय होना भी आरंभ नहीं हुई है।

पता चला है कि सरकार, जिसके जितने ब्लॉग उससे उसी के अनुसार कर लिया जाएगा, की पद्धति के तहत कर वसूलने की तैयारी कर रही है। सरकार को लगता है कि देश को आर्थिक मंदी की मार से बाहर निकालने के लिए यह एक कारगर कदम हो सकता है। इसे लागू करने के लिए सरकार चुनाव के समय दी जाने वाली रियायतों से भी दूर रखेगी क्योंकि ऐसे मामले आचार संहिता के दायरे में बहुत जल्दी आते हैं। यह तो वैसे भी देशहित से जुड़ा हुआ मसला है।

सरकार हिन्दी प्रेमी ब्लॉगरों से ईमानदारी की उम्मीद करती है। उसका मानना है कि जो हिन्दी से सच्चे। मन से प्रेम करता है। हिन्‍दी के लिए तन और धन न्‍यौछावर करने वाला हिन्‍दी सेवी है। वो अपने हिन्दी प्रेम की मिसाल ब्लॉगिंग पर कर चुका कर दे सकता है। ब्लॉगर्स को असुविधा न हो इसके लिए सरकार एक ऑनलाईन खाता शुरू कर रही है।

यह कानून वित्तीय वर्ष 2009-2010 में प्रभावी हो जाएगा। इसके तहत ब्लॉग की लोकप्रियता और प्राप्त टिप्पणियों के अनुसार कर देय होगा। मतलब साफ है कि जिसके जितने अधिक ब्लॉग और जितनी अधिक लोकप्रियता होगी तथा जिस पोस्ट अथवा ब्लॉग पर अधिकाधिक टिप्पणियां पाई जाएंगी, उन्हें उसी हिसाब से अधिक राशि का भुगतान करना होगा।

जिस ब्लाग के जितने अधिक फालोअर्स होंगे, उससे उसी हिसाब से अधिक टैक्स वसूल किया जाएगा क्योंकि यही उनकी लोकप्रियता का पैमाना होता है। वो बात दीगर है कि जो जितने अधिक ब्लागों का फालाओर होगा उसे टैक्स देयता में छूट मिलेगी। परन्तु अधिक टिप्पणी करने वाले ब्लॉ्गरों को इस छूट का लाभ नहीं मिल सकेगा।

ब्लॉगवाणी/चिट्ठाजगत इत्यादि एग्रीगरेटर्स पर पसंद पर क्लिक करने वाले ब्लॉगर्स को प्रति क्लिक के हिसाब से सरकार द्वारा भुगतान भी किया जाएगा। इस नीति का जिन ब्लॉगरों ने स्वालगत किया है वे सभी अंग्रेजी के हैं। परन्तु फंडा यह है कि जिस ब्लॉग की अधिक पसंद क्लिक होंगी उनसे सरकार को टैक्स भी तो अधिक मिलेगा। अब तक अपनी पोस्ट‍ पर ब्लॉगरों द्वारा पसंद चटकाने और टिप्पणी की मांग में मंदी आने की संभावना है। बल्कि टैक्स से बचने के लिए ब्लॉंगर्स एग्रीगरेटर्स की सुविधाएं न लेने पर भी विचार करने लगें और टिप्पणी की सुविधा ही रोक दें तो क्या आश्चर्य ? और अपनी पोस्ट की सूचना ई मेल के जरिए ही देने लगें और टिप्पणियां भी ई मेल पर ही मंगवाएं। जिससे टैक्स से बचाव हो सके।

जो ब्लॉग सिर्फ कविता को समर्पित होंगे अथवा जो ब्लॉंगर अपनी टिप्पणियां कविता में देते हैं उन्हें इस टैक्स से‍ निजात मिल सकेगी। इससे इंटरनेट पर हिन्दी कविता का भविष्य स्वर्णिम होने की आशा जगी है। आपकी इस संबंध में क्या राय है और आप इस करदेयता के पक्ष में हैं तो क्यों और अगर नहीं हैं तो भी क्यों ? अपनी राय जाहिर करें।

विदेश में रहकर हिंदी ब्लॉगिंग में जुटे ब्लॉगर प्रसन्न न हों। वे भी भारतीय हिंदी ब्लॉगरों की भांति सन्न हों।
प्रिंट मीडिया के धुरंधरों ने सरकार के इस कदम का सहर्ष स्वागत किया है और प्रिंट मीडिया के दोबारा से फलने फूलने की आशा व्यक्त की है। यही स्थिति चैनलों की भी है। चैनलों की घटती साख और टी आर पी में भी सरकार के इस असरकारी कदम से तेजी आने की उम्मीद की जा रही है।

मेरा भी यह निवेदन है कि जब तक पसंद का कीड़ा टैक्स से बाहर है, आप उसे अपने माउस से हिट कर सकते हैं और कीबोर्ड का प्रयोग करके टिप्पणियों की गति बढ़ा सकते हैं। कल के बारे में कौन जाने ?
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जन्म देने वाली मां हमेशा के लिए विदा- शरद आलोक (अविनाश वाचस्‍पति)

एक मां ने जन्‍म दिया है
एक मां ने मन दिया है
दिए हैं विचार अपरंपार
इस लिंक पर जानें सब।

मां जिसने जन्‍म दिया
भौतिक देह छोड़ गई
पर बसी है
मन में
विचारों में
यादों में
रचनाओं में सारी।

वो जब तक हम हैं
हमारे बच्‍चे हैं
तब तक यहीं रहेंगी
रहेगी बाद में भी याद
उनकी, मां को देख
मां ही याद आती है।

हिन्‍दी भी हमारी मां है
इसकी सेवा कर रहे हैं
इसकी सेवा करते रहेंगे
मां को सच्‍ची श्रद्धांजलि
यही होगी हमारी।

शरद आलोक जी का बल
मां का संबल बना रहे
मां की कमी नहीं हो सकती पूरी
पर हिन्‍दी मां की सेवा वर्षों से
जिस तरह कर रहे हैं शरद आलोक
उसी तरह करते रहें सब
यही है निवेदन सबसे अब।
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"इस प्यार को क्या नाम दूँ"

"इस प्यार को क्या नाम दूँ"

 

***राजीव तनेजा***

"दिल की ये आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले"...

"आखिर तुम्हें आना है...ज़रा देर लगेगी"...

"आज ये सब गाने मुझे बेमानी से लग रहे थे क्योंकि सब कुछ धीरे-धीरे सैटल जो होता जा रहा था"

"आज भी पुराने दिन याद करता हूँ तो सिहर-सिहर उठता हूँ"...

"उफ!..वो दिन भी क्या दिन थे जब मैँ दिन रात इसी सपने में खोया रहता कि... काश..सपने में ही दिख जाए वो मुझे किसी तरह "

"असलियत में तो नामुमकिन सी बात जो लगती थी"..

"उसका चेहरा हमेशा मेरी आँखो के आगे छाया रहता"...

"ज़मीन पर रह कर चाँद को पाने की चाहत थी मेरी"..

"पहली बार बचपन में बडे पर्दे पर ही तो देखा था उसे"..

"सामने ये कौन आया...दिल में हुई हलचल...

देख के बस एक ही झलक...हो गए हम पागल"..

"उफ!..क्या कयामत बरपायी थी उसने अपने पहले ही जलवे में"..

"जिसे देखो...वही शैंटी फ्लैट हुए जा रहा था तो अपुन किस खेत की गाजर मूली थे?"...

"थे तो हम भी हाड माँस के मामुली इंसान ही ना?...

"सो!..कैसे बचे रह्ते उसके मोह पाश से?"

"बस अब ना था दिन को चैन और ना रही रातों की नींद"

"जानता था कि मेरी किस्मत में नहीं है वो"..

"कोई बडा आदमी ही ले जाएगा उसे"

"मेरी किस्मत में तू नहीं शायद...क्यूँ तेरा इंतज़ार करता हूँ...

मैँ तुझे कल भी प्यार करता था...मैँ तुझे अब भी प्यार करता हूँ"

"लोगों से सुना है...किताबों में लिखा है...

सबने यही कहा है कि...नखरे बहुत हैँ स्साली के"..

"खर्चीली इतनी कि पूछो मत"...

"किसी आँडू-बाँडू को पुट्ठे पे हाथ तक नहीं धरने देती है"...

"अब ये बावले क्या जानें कि नखरे तो होने ही हैं....टॉप की आईटम जो ठहरी"...

"अब हर किसी ऐरी-गैरी...नत्थू-खैरी के बस का कहाँ कि वो लटके-झटके दिखाती फिरे"

"नखरे दिखाना भी अदा होती है ...स्टाईल होता है"...

"अब खुमार ऐसा छाया दिल ओ दिमाग पे कि लाख उतारे ना उतरा"

"सबने समझाया कि रहने दे...तेरे बस कि बात नहीं"...

"ऊँचे लोगों की ऊँची पसन्द भला गरीब के घर में एडजस्ट कैसे करेगी?"

"बडे ही प्यार से ...जतन से रखूँगा"

"सब नखरे सह-सह लूंगा"...

"रूठ गयी तो ...प्यार से...मान मनौवल से मना लूंगा"

"अब किसी और को बसाने की इस दिल ए नादाँ में चाहत ना रही"

"बचपन से दिल में यही इकलौती इच्छा समाई हुई थी कि...एक ना एक दिन उसे लाना ज़रूर है"

"जब जवान हुआ और थोडा बहुत कमाना भी शुरू कर दिया तो...

कईओं ने घर आ-आ के खुद ही कहना शुरू कर दिया कि आप हमारी वाली ले जाएँ"

"मैँ मन ही मन सोचता कि इनकी जूठन?"....

"और!..वो मैँ सम्भालूँ?"

"हुह!..ऐसी होने से तो न होना ही अच्छा है लेकिन कम कमाई होने की वजह से सिवाय चुप लगा के रहने के मेरे पास कोई चारा नहीं होता था"

"अफसोस!..कोई फ्रैश पीस आ के ही राज़ी नहीं था मेरे पास"

"जो भी मिलती ...कोई ना कोई कमी साथ लिए ज़रूर होती"

"किसी का फिगर बेकार तो...

किसी के रंग रूप में दम वाली बात नज़र नहीं आती"

"कोई सूरत-शक्ल से बेकार...

तो कोई नैन-नक्श से कंडम"..

"कोई ज़रूरत से ज़्यादा तगडी तो...

किसी का कमज़ोरी में कोई सानी नहीं"

"कोई मेकअप से लिपी-पुती...

तो कोई मेकअप विहीन अपना दीन चेहरा लिए नज़र आती"

"अपुन ने तो अपने सभी यार-दोस्तों से साफ-साफ कह दिया था कि..

"लाएँगे तो एक्दम सॉलिड पीस ही लाएँगे वर्ना खाली हाथ बैठे रहेंगे"

"अब ये बेकार की '*&ं%$#@'पीस अपने बस की बात नहीं"

"सुना जो रखा था कि सब्र का फल मीठा होता है...

तो सोचा कि क्यों ना सब्र करके भी देख लिया जाए?"

"डायबिटीज़ हुई तो क्या हुआ?"...

"अब!..थोडा बहुत मीठा तो चलता ही है"...

"क्यों?..है कि नहीं?"

"और आखिर हर्ज़ ही क्या है इसमें?"

"क्या मालुम आने वाला कल सुनहरा हो"

"हम होंगे कामयाब एक दिन...हो..हो...मन में है विश्वास...पूरा है विश्वास"

"खैर...हम सब्र करते रहे और वो ऊपर बैठा-बैठा हमारे सब्र का इम्तिहान लेता रहा"...

"पहले तो ये बहाना था जनाब के पास कि मुंडा कमाता नहीं है" ...

"अब तो ठीकठाक कमाने भी लगा हूँ"...

"अब क्या एतराज़ है आपको?"

"स्साला!..जिसे देखो वही अपना घिसा पिटा पुराना माल चेपने की फिराक में तैयार बैठा मिलता था"..

"अब वैसे कहने को तो कई ठीक-ठाक काम चलाऊ अपने रस्ते में आती रही...

टकराती रही लेकिन इस चक्कर में कि सिर्फ और सिर्फ सालिड मॉल पे ही हाथ डालना है"...

"मैँ बेवाकूफ!..सबको रिजैक्ट पे रिजैक्ट करता चला गया"

"यही सोच थी मेरी कि ऊपरवाला रहमदिल है"...

"उसके घर देर है पर अन्धेर नहीं है"

"कोई ना कोई तो उसने मेरे लिए बनाई ही होगी"

"सुन जो रखा था कि जोडियाँ ऊपर से ही बन के आती हैँ"

"तो चलो!...देख लेते हैँ कि कब जागती है अपनी रूठी हुई किस्मत"

"इसी चक्कर में उम्र बढती रही..बढती रही"

"अब तो पडोसियों ने भी टोकना शुरू कर दिया था कि...

अब मज़े नहीं लेगा तो क्या बुढापे में लेगा?"

"बाद में तेरे किसी काम ना आएगी"...

"दूसरे ही मौज उडाएँगे"

"जब कब्र में पैर लटके होंगे तो ला कर क्या धूप-बत्ती करेगा?"

"अगर ढंग की एक नहीं मिलती है तो कामचलाऊ दो ले आओ"एक मज़ाक उडाता हुआ बोला

"आजकल बडी सस्ती मिल रही हैँ नेपाल में और आसाम में"

मुझे गुस्सा आ गया...बोला"नेपाल और आसाम का लोकल माल आप ही को मुबारक हो शर्मा जी"

"अपुन को तो चाहिए..एकदम स्टाईलिश वाला"

"शर्मा जी!...आपसे अपनी तो संभलती नहीं ठीक से और चले हैँ लैक्चर देने दूसरों को"...

"पहले अपना घर तो ठीक करो जा के"

"चिनॉय सेठ!...जिनके घर शीशे के होते हैँ वो दूसरों के घरों पे पत्थर नहीं फैंका करते"

"कुछ इल्म भी है आपको?कि कभी कोई तो कभी कोई आपकी वाली के साथ मौज उडा रहा होता है?"
"कभी चाँदनी चौक तो कभी चॉयना"...

"और साहेब हैँ कि इन्हें कोई फिक्र ही नहीं"

"वाह साहेब!..वाह"

"एक-आध को तो मैँने 'बाराटूटी' में भी गुल्छर्रे उडाते देखा था आपकी वाली के साथ"

"सच...इन्हीं आँखो से"

"आप बुज़ुर्ग हैँ...आपकी इज़्ज़त कर रहा हूँ वर्ना कोई और होता तो अभी के अभी मुँह तोड के रख देता"

"मूड खराब हो चला था मेरा"

"लग रहा था कि बिना उसके ही पूरी ज़िन्दगी काटनी पडेगी"

"ये सब ख्यालात दिल में उमड-उमड ही रहे थे कि अखबार में छपे एक इश्तेहार ने सारा मूड एकदम से फ्रैश कर दिया"

"बार-बार उसी सफे को पढे जा रहा था मैँ जिसमें मेरी जॉनेमन का जिक्र था"

"अपनी चमचम कर चमकती किस्मत पे जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था मुझे"

बार-बार खुद को चिकोटी काटता कि...

"या अल्लाह!...क्या ये सच है?"

अब दिल का भंवर झूम-झूम गाने लगा..

"जिसका मुझे था इंतज़ार...वो घडी आ गयी...आ गयी"...

"जिसके लिए था दिल बेकरार...वो घडी आ गयी..आ गयी"

"अब रुका किस कम्भख्त से गया?"...

"सीधा दिया हुआ फोन नम्बर मिलाया और सारी बातचीत करने के बाद बताए गए पते पे जा पहुँचा"

"वो तैयार खडी मानों मेरी ही राह तक रही थी"

"इस प्यार को क्या नाम दूँ?"

"दबे हुए जज़बातों को क्या अल्फाज़ दूँ?"

"शायद...पहली नज़र का पहला वाला प्यार यही था"

"लव ऐट फर्स्ट साईट"...

"जब अपने बारे में सब कुछ तफ्तीश से बताया उन्हें कि...

तनख्वाह के अलावा कितना कमाता हूँ ऊपर से और...

क्या क्या शौक हैँ मेरे वगैरा वगैरा"...

"तो कहीं जा के उन्हें तसल्ली हुई कि यही बन्दा ठीक रहेगा"

"हर किसी राह चलते ऐरे-गैरे नत्थू खैरे के हाथ कैसे थमा देते?"

"पहले भी तो देख चुके थे किसी अनाडी के हाथ में थमा के"...

"दो दिन भी ठीक से सम्भाला नहीं गया था उससे और उल्टे पाँव लौटा दी थी बैरंग "

"अब कहीं जा के तसल्ली हुई दिल को कि अब किसी को फाल्तू बोलने का मौका नहीं मिलेगा"

"यार-दोस्त...पडोसी-रिश्तेदार...सबके मुँह बन्द हो जाएँगे खुद ही"

"बडे कहते फिरते थे कि...राजीव के बस का कुछ नहीं"..

"ऐसे ही वेल्ले हाँकता फिरता है" ..

"ये!..बडा सा...मोटा सा ताला लग जाएगा उनकी लपलपाती ज़बान को "

"अब अपने मुँह से क्या तारीफ करूँ कि...

"दिखने में कैसी है?"

"रंग-रूप कैसा है उसका?"..

"स्टाईल कैसा है उसका?"

"फिगर कैसी है उसकी?"वगैरा...वगैरा"...

"उफ!...कैसे तारीफ करूँ उसकी?"

"रंग-रूप ऐसा कि चाँद भी शर्मा उठे"

"कोमल इतनी कि छू लेने भर से दाग लग जाए"

"बस यूँ समझ लो कि एक दम मक्खन के माफिक चिकनी"

"चाल ऐसी मतवाली कि जब सडक पे निकले तो सब की सब निगाहेँ थम जाएँ"...

"कसा हुआ भरपूर बदन कि बडे-बडे विश्वामित्र ललचा उठें"

"आँखे चौँधिया जाएँ उनकी "

"बोलती बन्द हो उठे "

"उनके जल कर कोयला होने का मंज़र देख ये दिल खुशी से झूम उठता है"

"तारीफ करूँ क्या उसकी...जिसने तुम्हें बनाया...

ये चाँद सा रौशन चेहरा ज़ुल्फों का रंग सुनहरा"...

"ऊप्स!..ये ज़ुल्फें कहाँ से आ गई बीच में?"..

"हैँ ही कहाँ उसके ज़ुल्फें?". ..

"मुझे तो दिखाई ही नहीं दी"

"अब वो ऐसी है...या फिर वो वैसी है...

"मेरे कहने से तो आप मानने से रहे"...

"तो आप खुद ही नज़र उठा कर एक झलक देख क्यों नहीं लेते?...

"आप भी अगर फिदा न हो उठें तो मेरा नाम भी राजीव नहीं"...

bmw

***राजीव तनेजा***

 

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गोपालजी, हिन्‍दीजी, प्रेमजी और श्री व्‍यंग्‍यजी

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