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छिपाती थी बुखारों को जो मेहमां कोई आ जाए : मातृ दिवस पर एक गीत




मां सव्यसाची स्वर्गीया प्रमिला देवी


वही क्यों कर सुलगती है वही क्यों कर झुलसती है ?
रात-दिन काम कर खटती, फ़िर भी नित हुलसती है . 
न खुल के रो सके न हंस सके पल --पल पे बंदिश है 
हमारे देश की नारी, लिहाफ़ों में सुबगती है ! 

वही तुम हो कि जिसने नाम उसको आग दे डाला
वही हम हैं कि जिनने उसको हर इक काम दे डाला
सदा शीतल ही रहती है भीतर से सुलगती वो..!
कभी पूछो ज़रा खुद से वही क्यों कर झुलसती है.?
कविता उपलब्ध है 
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सर्वदा उदार प्रेयसी है वो..!!



छवि: साभार-बीबीएन
 मृत्यु तुमसे भेंट तय है. तुम से  इनकी उनकी सबकी   भेंट भी तय है. काल के अंधेरे वाले भाग में छिप कर बैठी है अनवरत लावण्या  तुम्हारी प्रतीक्षा है मुझे. अवशेष जीवन के निर्जन प्रदेश में अकेला पथचारी यायावर मन सहज किसी पर विश्वास नहीं कर पाता. सब कुछ उबाऊ जूना सा पुराना सा लगता है. 
                मदालस-अभिसारिका यानी मृत्यु सामने होती हो तो सब के सब सही सही  और बेबाक़ी से बयां हो जाता है. कुछ तो तुम्हारे सौंदर्य से घबरा जाते हैं.. हतप्रभ से अवाक अनचेते हो जाते हैं. उसके आलिंगन से बचने बलात कोशिशों में व्यस्त बेचारे क्या जाने कि जब मृत्यु आसक्त हो तब स्वयं विधाता भी असहाय होता है..कुछ न कर सकने की स्थिति में होता है  सुन नहीं पाता रिरियाती-याचना भरी आवाज़ों को . सच्चा प्रेमी कभी भी मृत्यु से भयातुर नहीं होता न ही बचाव के लिये विधाता को पुकारता है. बस  नि:शब्द बैठा अपलक  पास आते तुम्हारे मदिर लावण्य को निहारता है.और जब क़रीब आती है तो बस कुछ खो कर बहुत कुछ पाने का एहसास करता हो जाता है बेसुध.. अभिसाररत..
 आगे बांचिये मिसफ़िट पर
     
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लोकतंत्र को आलोक तंत्र बनाने की कवायद


लोकतंत्र को 
आलोक-तंत्र बनाने की कवायद करता.
भारत पैंसठ साल का  बुड्ढा..  हो गया..
अपनी पुरानी यादों में खो गया.......!!
दीवारों पर कांपते हाथों से लिख रहा था 
"आलोक-तंत्र"
लोग भी आये आगे 
बूढ़े का मज़ाक  उड़ा कर भागे..!!
कुछ खड़े रहे मूक दर्शक बन ..!
कुछ गा रहे थे बस हम ही हम..!! 

कोलाहल तेज़ हुआ फ़िर बेतहाशा 
हर ओर नज़र छाने लगी निराशा !
सबकी अलग थलग थी भाषा-
कांप रही थी बच्चों की जिग्यासा !!
कल क्या होगा.. सोच रहे थे बच्चे 
एक बूड़ा़ बोला :-"भागो किसी लंगड़े की पीठ पे लद के ही "
जान बचाओ.. छिप छिपाकर.. 
हमें नहीं चाहिये न्याय
क्या करेंगें स्विस का पैसा लेकर 
फ़हराने दो उनको तिरंगा ये
है उनका
संवैधानिक अधिकार...
रामदेव..अन्ना... सब कर रहे
शब्दों का व्यापार..
अरे छोड़ो न यार
फ़िज़ूल में मत करो वक्त बरबाद..
गूंगे फ़रियादीयो कैसे बोलोगे
बहरी व्यवस्था की भी तो कोई मज़बूरी है
वो कानों से देखेगी...!!
सदन में चीत्कारेंते हैं..
हमारे लिये हां..ये वही लोग हैं जो
सड़क पर दुत्कारतें हैं...
पूरे तो होने दो पांच साल
बदल देना
इस बरगद की छाल...
अभी चलो घर चलतें हैं..
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नेता जी ज़िंदाबाद ! नेता जी ज़िंदाबाद !!


समय:-1980-81 के एक दिन की दोपहर
स्थान:-मुहल्लों में बसे शहर  जबलपुर का एक मुहल्ला 
                            नेता जी ज़िंदाबाद ! नेता जी ज़िंदाबाद !! ये ही आवाज़े मुहल्ले को आवाज़ों से भर रहे थे. कंजा भूरी सहित न जाने कित्ते शोहदों ने नेता जी को कंधे पर बारी बारी से ढोया.   पार्षदी का चुनाव जीतने के बाद हज़ूर मुहल्ले में पहली बार पधारे थे. यूं तो रात को भी आये , ऐसा सुना ऐसा कोई कह रहा था पर आज़ का आना उनका बिलकुल अलग तरीके का था. हर घर की देहरी पे राम जुहार करते कराते नेता जी को बाबूजी ने आशीर्वाद दिया –“बेटा, महेंद खूब तरक्की करो मुहल्ले की भी तरक्क़ी करो”
जी बाबूजी ... कह कर तपाक से बाबूजी के चरण छुए उसने .
बाजू वाले घर से ठाकुर राजू की अम्मा निकली :-“देख महेन, अब सारी नाली और कुलिया साफ़ होना चईये अब समझा तू ”
“हओ-अम्मा, जे तो ठीक है, पर तुम सब भी सुबह सफ़ाई वाले अक्कू को बोल दिया करो न माने तो बताना ”
राजू की अम्मा – ”ससुरा हमाई सुने तब न, अब तो तुम मुहल्ले के नेता बन गये हो, जो चाहोगे वो हो जायेगा”
महेन:-“अम्मा, बताओ क्या करूं.. ”
राजू की अम्मा गम्भीर होके बोली :-“ मैं कुछ नहीं मुहल्ले की नाली साफ़ करवान तुम्हारा काम समझे पार्षद हो गये हो मुंह चलाओ कि हो गया काम ”
     राजू की अम्मा की बात सुन कर मेरे बराबर खड़ा कंटर राजू एक आंख दबा के बोला:- राजू की अम्मा तो महेन को मुंह चला के नाली साफ़ करने की कह रई है बताओ पप्पू महेन कोई....? हा हा हा
        भारतीय प्रजातंत्र में नेता को आम वोटर आल-माईटी मानता है . ये सच है पर एक भय मुझे तभी से सालने लगा था कि जिस दिन जन नायक खुद को आल-माईटी मानने लगेगा उस दिन देश का क्या होगा ?
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समय:-साल 2010 के एक दिन की दोपहर
स्थान:-मुहल्लों में बसे शहर  जबलपुर का एक मुहल्ला 
                    तीस बरस बाद नेताजी बीस से पचास के हो गये हैं शरीर का भार पचास से एक सौ के ऊपर , हारते जीतते अब शायद किसी पद पर मनोनीत हुए मुहल्ले में अपनी सत्ता में पकड़ दिखाने आए. गेदे के फ़ूलों से सर-ओ-पा लदे महेंद इस बार बाबूजी को सिर्फ़ दूर से नमस्ते किया . राजू की अम्मा बोली :- कौन, बेटा महेन, का बन गये अब तुम, अरे देखो नाली साफ़ अब भी नईं होती. अरे तुम इधर तुम मूं (मुंह)चलाओ उधर नाली साफ़ .
महेन:- अरे अम्मा, अब हम भोपाल देखते हैं जे काम तुम पार्षद से कहो.
      अम्मा असमंजस से महेन की बात समझने की कोशिश कर रही थी कि महेंन आगे बढ़ गया काफ़िले के साथ. पता नहीं मुझे क्यों लग रहा है वो महेन पार्षद नहीं अर्थी से उठी चलती फ़िरती भीम काय गेंदे से लदी ... है
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ललित जी डर के आगे जीत है


" जबलपुरिया दबंगई -हजूर जापान की सुनामी से विचलित होकर आप कुछ अधिक व्यग्र नज़र आ रहे हैं. हम तो फ़गुआहट से प्रभावित अपने मत दाताओं यानी माननीय सुधि पाठकों भावना की कदर करते हुए चाह रहे थे कि वार्ता कुण्ठा जन्य परिस्थियों की वज़ह से अवरुद्ध न हो. आपने हमारी सद भावना को सर्वथा ग़लत दिशा दी...! आप भी क्या कर सकते हैं विजया-सेवनोपरांत ऐसा ही लिखा जाता है. 
"विजया को ऐसो नशा हो गये लबरा मौन
पत्नि से पूछे पति:-"हम आपके कौन..?"
ललित जी डर के आगे जीत है भई ..!!
मुझे "मूंछ उमेठन चुनौती से भय नहीं याद रखिये यह भी कि खरा आदमीं हूं कुम्हड़े का फ़ूल नहीं जो तर्जनी देख के डर जाऊं ! जब से होश सम्हाला है जूझता ही आया हूं किंतु आपकी पीडा मैं समझ सकता हूं आप ने आक्रोशवश जो भी लिखा उसे नज़र अंदाज़ करते हुए मैं सम्पूर्ण स्थितियों से पर्दा उठा देना चाहता हूं ताकि आप जैसे मित्र से मेरा जुड़ाव सतत रहे
पूरा आलेख मिसफ़िट पर देखिये 
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अलबेला खत्री लाइव फ़्राम जबलपुर

सूरत से सिंगरौली व्हाया जबलपुर जाते समय जबलपुरियों हत्थे चढ़ गये राज़ दुलारे अलबेला के साथ आज न कल देर रात तक फ़ागुन की  आहट का स्वागत किया  गया बिल्लोरे निवास पर डाक्टर विजय तिवारी "किसलय" बवाल ,और हमने यक़ीं न हीं तो देख लीजिये और पढ़ भी लीजिये यहां सचित्र समाचार मिसफ़िट पर
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मेरा गधा, और मैं.......!!


   मेरा गधा, और मैं हम दौनों की स्थिति एक सी ही है अब करें तो क्या ? न करें तो क्या...? सोचा जो भी सब मालिक के हवाले कर देतें हैं उसकी जो मरजी आवे कराए न हो मर्जी तो  न कराए. ज़्यादा दिमाग लगा के भी कौन सा  पुरस्कार मिलना है. मिलना उनको है जो उसके लायक होते हैं भतीजी आस्था को उसकी सहेली का एस एम एस मिला "अगर दुनियां में ईमानदार एवं मेहनतियों की इज्ज़त होती तो सबसे इज्ज़तदार प्राणी होता." सच यही है . आज के दौर में   इंसान और गधे की ज़िंदगी एक साथ प्रविष्ट हो रहे  साम्यवाद की आहट  से महसूस की जा सकती है. यकीन हो या न हो.यकीन न हो तो गधे से पूछ लीजिये. रात भर कलम घसीटी करने के बाद भी कोई फ़ायदा नहीं  एक गधे को भी क्या मिलता है कुम्हार की गालियाँ, या बैसाख नन्दन होने की तोहमत,.जिस दिन से  अपने राम के बुरे दिन शुरू हुए उसी दिन से मोहल्ले के हर आम और ख़ास के बीच हमको लेके सवाल उठते-उठाते रहे हैं . सुना था कि कुत्ता एक ऐसा जीव होता है कि स्वर्गारोहण में साथ रहा है किन्तु आजकल के मेरे पालित कुत्ते  पता नहीं किधर गम हो गए !  ! इन पे भरोसा कैसे और कित्ता करें ? बुरे दिन में हमारे पालतू ही सबसे पहले हमारे लिए मरहम की ज़गह बदनामी दिया घर-घर रख-रखा आते हैं. पर अपने राम का गधा...? वो तो गधा ही ठहरा अपने जगजाहिर अतीत और स्वप्नहीन भविष्य के गणित से दूर अपने साथ है. अपने कुकर्म इतने हैं कि मैं और मेरा गधा जीवन को वैराग्य भाव से ही जीतें हैं न तो उसे धरती  का मोह है और न ही मुझे ही स्वर्ग से कोई आसक्ति . अब आप ही बताएं आज की ज़िंदगी से बढकर भी कोई नरक है कहीं.  हम दौनो की स्थित एक सी है जावेंगे तो बेहतर स्थिति में ही जावेंगे न ?    

                     अब बताइये, अपन कोई युधिष्ठिर महाराज़ थोड़े न हैं जो सदा सच बोलें, धरमराज का ओहदा पाएं ! पाएं भी कैसे सच बोलेंगे तो गधे ही कहलाए न..?

और  ही कहोगे:-"का ज़रुरत थी  इत्ता बोलने की  फंस गए न फ़िज़ूल में ?
अगर हम सही  बोले  तो कोई भी झट से बोल देगा:-"क्या फ़िज़ूल में चिल्लाता गधा कहीं का ,चुपकर"    
                   इस बात को लिख ही रहा था कि एक आकाशवाणी हुई :-"सच..! बोलने का  अधिकार न तो तुझे है न तेरे गदहे को. सो भैया हम खामोशी से  बैठे नज़ारा कर रहे हैं. देख रहे रहें है उनको ही सुन रहें हैं जिनको कुछ भी कहीं भी कभी भी बोलने  का अधिकार है. हमारे मौन में छिपी क्रान्ति को सामझा सकते हो तो समझो. 
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वही क्यों कर सुलगती है ? वही क्यों कर झुलसती है ?



वही तुम हो कि  जिसने नाम उसको आग दे  डाला
वही हम हैं कि  जिनने  उसको हर इक काम दे डाला
सदा शीतल ही रहती है  भीतर से सुलसती वो..!
 
कभी पूछो ज़रा खुद से वही क्यों कर झुलसती है.?

मुझे है याद मेरी मां ने मरते दम सम्हाला है.
ये घर,ये द्वार,ये बैठक और ये जो देवाला  है !
छिपाती थी बुखारों को जो मेहमां कोई आ जाए
कभी इक बार सोचा था कि "बा" ही क्यों झुलसती है ?

तपी वो और कुंदन की चमक हम सबको पहना दी
पास उसके न थे-गहने  मेरी मां , खुद ही गहना थी !
तापसी थी मेरी मां ,नेह की सरिता थी वो अविरल
उसी की याद मे अक्सर  मेरी   आंखैं  छलकतीं हैं.

विदा के वक्त बहनों ने पूजी कोख  माता की
छांह आंचल की पाने जन्म लेता विधाता भी
मेरी जसुदा तेरा कान्हा तड़पता याद में तेरी
उसी की दी हुई धड़कन इस दिल में धड़कती है.

आज़ की रात फ़िर जागा  उसी की याद में लोगो-
तुम्हारी मां तुम्हारे साथ  तो  होगी  इधर  सोचो
कहीं उसको जो छोड़ा हो तो वापस घर  में ले आना
वही तेरी ज़मीं है और  उजला सा फ़लक भी है !
                                      * गिरीश बिल्लोरे मुकुल,जबलपुर

अपने माता-पिता को ओल्ड-एज़-होम भेजने वालों  विनम्र आग्रह करता हूं कि वे अपने आकाश और अपनी ज़मीन को वापस लें आएं


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