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अरे कोई मुझे भी तो पकड़ो…


लाल बत्ती लगी सरकारी गाड़ियों में बच्चों को स्कूल आते-जाते या मेमसाहबों को बाज़ारबाज़ी करते तो सबने देखा होगा पर बहुत कम लोगों ने ये देखा होगा कि सड़कों पर जो लम्बी-लम्बी कारें चौबीसों घंटे यहां-वहां डोलती फिरती हैं उनमें से लगभग सभी किसी न किसी काम-धंधे के नाम पर ख़रीदी गई होती हैं और उनके ड्राइवर, हवा-पानी, तेल-डीज़ल, धुलाई-सफाई  और यहां तक कि उनके पार्किंग व पंक्चर तक का ख़र्चा भी उसी काम-धंधे के ख़र्चे में दिखाया जाता है. फिर भले ही वह कार किसी भी काम के लिए कहीं भी क्यों ना चलाई जाती हो.

बिजली चोरी करके काम-धंधे चलाना कोई नई बात नहीं है, कुठ ठाड़े लोग तो घर का ए.सी. तक बिजली का मीटर धीमे कर या बंद कर चला लेते हैं. ज़मीन जायदाद की ख़रीद फ़रोख़्त तो होती ही दो हिस्सों में है, एक नंबर के काग़ज बनते हैं, दो नंबर का काम मुस्कुराने से चल जाता है. बिल लेने की सलाह दुकानदार भी तभी देता है जब उसे लगता है कि –‘कल को माल ख़राब निकलने पर बोहनी के टैम ये कहीं माथा-पच्ची करने न आ धमके’. हमारा क्या है, हमें तो बिल लेकर कोई मत्थे मारना है क्या कि नाहक सेल्स-टैक्स (और आजकल वैट) भरते फिरें, फिर इस बात की ही क्या गारंटी है कि दुकानदार ही हमें वही पर्चा देगा जिसका टैक्स भी सरकार को जमा करवा ही देगा वो. वह मुआ भी तो दो नंबर के बिल बनाकर थमा देता है.

जब सरकार तन्ख़्वाह देने से पहले ही मेरी तन्ख़्वाह में से हर महीने टैक्स काट लेती है तो मैं कभी यह कहना नहीं भूलता कि –“जितना मेरा टैक्स कटता इतना तो काम-धंधे वाले सालाना कमाई भी नहीं दिखाते.” हे सरकार मैंने ही तेरा क्या बिगाड़ा है. यह बात अलग है कि सरकारी बाबू तो इस टैक्स कटाई में कुछ नहीं कर सकता पर हां, निजि क्षेत्र में चलने वाले कामकाजी अपने-अपने कर्मचारियों-अधिकारियों को दुनिया भर के वे सभी हथकंडे अपना कर पगार देते हैं कि अपने काम धंधे का तो ख़र्चा बढ़ ही जाए, मातहतों को भी टैक्स-मैनेजमेंट का फ़ायदा हो जाए.

कितना अच्छा लगता है कामचोरी करना, जब कोई देख न रहा हो. लेकिन अब वो दिन भी कहां रहे, जिसे देखो वहीं चोर-उचक्कों के नाम पर क्लोज़ सर्केट टी.वी. लगा कर अपने-अपने बंदों पर नज़र रखने की फ़िराक़ में रहता है. पर पब्लिक डीलिंग बाबू की कुर्सी लंबे-लंबे समय तक खाली दिखना कोई नई बात नहीं है. काउंटर के दूसरी तरफ वाला गंदा सा बाबू पैसा भी नहीं मांगता, काम भी नहीं करता, काम होने भी नहीं देता और बात-बात पर काटने को दौड़ता है, सो अलग. बाबू को इसी हड़काई में ही परमानंद आ जाता है.

एक गार्मेंट एक्सपोर्टर को मैंने बड़ी संजीदगी से कहते सुना कि वो कैसे कपड़े को खींच-खींच कर ही बढ़ा देता है. मैंने पूछा –‘तुम्हें बाज़ार में चीन से डर नहीं लगता ?’ उसने फिर खीस निपोर दी –“हें हें हें अरे हम तो चीन से फिर भी चार हाथ आगे हैं, हम पायजामा भेजते हैं तो वह हाफ़ पेंट तो निकलता है, चीन से पायजामा मंगाने वाले को तो कच्छा ही हाथ लगता है.”

पता नहीं कितने लोग हैं जो फ़ाइव-स्टारों के रेस्टोरेंटों या दारूखानों का भुगतान अपनी टैक्स चुकाई गई कमाई से करते हैं, या फिर दोपहर में विदेशी परफ़्यूम लगी सौ-सौ किलो की महिलाएं जिन बुटीकों में हज़ारों के कपड़े-लत्ते यूं ही ख़रीद मारती हैं, उनमें से कितनी ख़रीदारी का भुगतान टैक्स चुकाई गई कमाई से होता है…

सुना है दूसरों के लिए तो लोकपाल बिल आ रहा है, है कोई माई का लाल जो मेरा भी कुछ बिगाड़ ले. मेरा कुछ नी हो सक्ता.
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बाबा रामदेव का सवालिया अर्थशास्त्र


भ्रष्टाचार व काले धन के पक्ष में निश्चय ही कोई भी नहीं हो सकता.  लेकिन लोकतंत्र में, सुपर लोकतंत्र का जो रास्ता अण्णा हज़ारे की देखा-देखी  बाबा रामदेव ने अपनाया है वह हमें कहां ले जा रहा है अब मुझे भी पता नहीं. सिविल सोसायटी के नाम पर, कल तक की पेज-3 की बैठी-ठाली जनता को अच्छे ‘सोशल वर्क’ का पुख़्ता  हैंडल मिल गया है. हींग लगे न फिटकरी और रंग भी चोखा. किसी के प्रति कोई जवाबदेही नहीं और सभी को हड़काते भी घूमो. ऐसे दूध के धुले लोकपाल न जाने ये लोग मंगल ग्रह से लाएंगे जो संविधान की किसी भी संस्था से ज्यादा अधिकार-प्राप्त होगें….

बाबा रामदेव एक तरफा ट्रैफ़िक है, ये सज्जन केवल बोलते हैं सुनते नहीं. ये मानकर चलते हैं कि बस उनकी सोच ही सही है बाक़ी सब मूर्ख हैं. अब ये भ्रष्टाचार व काले धन का मुद्दे पर एकाधिकार किए बैठे हैं जो इन्हें सत्ता की एकमात्र सीढ़ी दिखाई दे रहा है. बी.जे.पी. की हार से भी इन्होंने कोई सबक़ नहीं सीखा. दूसरी तरफ, लंगोट की ढीली सरकार भी मनौती- मोड में दुम दबाए यहां वहां घूम रही है.

बड़े नोटों का चलन बंद करना ही कोई एकमात्र उपाय नहीं है. काला धन बहुत से दूसरे रास्तों से भी चलायमान रहता है, वे हैं compensatory and complementary over/under invoicing, over/under pricing, exchange in precious metals, stones etc., fudged book entries, paper transactions including shares/derivatives/forward commodity markets etc., payments beyond/across borders, squaring off entries and accounts....and so on.  कोई भी महानगरीय चार्टर्ड एकाउंटेंट, आयकर व enforcement निदेशायलय का अधिकारी ये अच्छे से जानता है. आज जितने भी बड़े बड़े घोटाले सामने आए हैं उनमें से किसी में भी बड़े नोटों का कोई आदान-प्रदान सामने नहीं आया है. जिन केसों में बड़े नोट पकड़े जाते हैं वे कुल ब्लैक अर्थव्यवस्था का मात्र नगण्य हिस्सा है.

लेकिन बाबा रामदेव के सधुक्कड़ी अर्थशास्त्र में, बेबस व दुखी आम आदमी ठीक वैसे ही उम्मीद पालने लगा है, जिस तरह 60 के दशक में हरियाणा में कुछ लोग सता में यह कर आ गए थे कि भाखड़ा-नंगल डैम बनाकर पानी से बिजली तो पंजाब ने सोख ली, तुम्हें तो बस फोका पानी ही मिल रहा है...

यह कोई भावनात्मक मुद्दा ही नहीं है दूसरों की बात सुनने का माद्दा भी होना चाहिये.

-काजल कुमार
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अन्‍ना हजारे हजारों हजार हिन्‍दी ब्‍लॉगर भ्रष्‍टाचार के खिलाफ हैं


भ्रष्टाचार के विरुद्ध
अन्‍ना हजारे के साथ
जो हैं अभी हजारों में
वे हजारों हिन्‍दी ब्‍लॉगर
भ्रष्‍टाचार का करते हैं
प्रबल विरोध।

नहीं बैठे अनशन पर
तो क्‍या है
ब्‍लॉग पर तो हैं मौजूद
और मौजूद हैं फेसबुक पर
और ट्विटर पर भी
कर रहे हैं खटर पटर
भ्रष्‍टाचार ही नहीं
सभी बुराईयों के खिलाफ ।

इनकी खटर पटर
मचाती है खूब तेज हलचल
इससे कांपती सिर्फ
बुराईयां ही नहीं हैं
कांपती है बुरी नीयत
बुरे इंसान की
बुरी सरकार की ।

डोलता नहीं है उसका मन
क्‍योंकि बुरे इंसान का
होता ही नहीं है मन
नहीं तो कब का पहुंचाया होता
उनके पास सम्‍मन।


हिन्‍दी ब्‍लॉगों से
लगने लगा है डर
बुराईयों को
कल जब आया था
तेज भूंकप दिल्‍ली में
तब आपने नहीं पहचाना
पर मैं जान गया हूं
बुराईयां भाग रही थीं
बहुत तेजी से
इकट्ठी होकर सब।

अंधविश्‍वास नहीं है यह
पुख्‍ता सबूत मिले हैं इसके
भूकंप से भी हुई है बात
और उसने स्‍वीकारा है
कि भ्रष्‍टाचार और बुराईयों ने ही
भूकंप को भी हिला कर डराया है।

पर अब भूकंप से भी तेज
भूकंप नहीं
जापान वाली सूनामी
पहुंच रही है दिल्‍ली
अनशन चालू है
सुनामी पहुंच चुकी है
भ्रष्‍टाचार धारकों की
गायब हो गई है नींद ।

उन्‍हें कल रात को मैंने
जंतर मंतर पर
धूनी रमाते देखा
पर उनकी धूनी रमी ही नहीं
तभी तो हजारों हजार की
रम रही है।

भ्रष्‍टाचार घबराया हुआ है
सरकार में है
इसलिए थरथराया हुआ है
मर जाएगा
या पाएगा जीवन
यह सब हमारे आपके
सबके हाथों में है।

हाथों को हाथ न रहने दें
हथियार बना लें
भ्रष्‍टाचार के खिलाफ
जंग का बुलंद स्‍वर लहरा दें
दिखा दें मुट्ठी उसको
भ्रष्‍टाचार कहते हैं जिसको ?

रवीश कुमार साथ हैं
अविनाश दास साथ हैं
रवीन्‍द्र प्रभात लाए
नया सुहाना प्रभात हैं
मैथिली गुप्‍ता की सच्‍ची बात है
ललित शर्मा, पवन चंदन, रविन्‍द्र पुंज
बालेन्‍दु शर्मा, कमल शर्मा, अनिता कुमार
विवेक रस्‍तोगी, अमिताभ श्रीवास्‍तव, अजय कुमार झा
सब साथ सात हैं
अगर आप भी साथ हैं
तो टिप्‍पणी में अपना नाम जोड़ते जाएं
इस कड़ी को शिखर की ओर तुरंत पहुंचायें।
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