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पागल आदमी -अविनाश वाचस्‍पति (कविता)

पागल आदमी

तुमने मुझे आदमी माना
सुकूं है मुझे
पागल ही सही
पर कुत्‍ता तो नहीं कहा
पागल कुत्‍ते से
डरते हैं सब
आदमी पागल हो
तो उसे ले जाते हैं
पागलखाने में पागलखिलाने
पागल खाना खिलाना
बराबर है
पान खाने अथवा खिलाने के
ऐसा मैंने कहा नहीं है
सुना है मैंने पर ऐसा ही।

हां, मैं पागल हूं
मुझे आज मालूम हुआ
कि आदमी भी हूं मैं
आदमी न होता तो
पागल कोई और होता
या आदमी कोई ओर
पागल होना, आदमी होना
पागल जानवर होने से
बेहतर है
यह मैं आज जान गया हूं।
मैं खुद हैरान हूं
कि इतना सब बीता मेरे साथ
पर मैं जानवर क्‍यों न हुआ
क्‍यों मुझमें इंसानियत जिंदा है
वह न होती तो
न जाने कब का
बन गया होता जानवर
पर मेरा माहौल ही
नहीं रहा जानवराना
नहीं चाहा कभी मैंने
कि रोग ऐसा लगे
कि बनूं मैं जानवर
या भीतर का जानवर जाग उठे
जानवरत्‍व सबके भीतर होता है
कोई उन्‍हें दफन कर देते हैं
कुछ उन्‍हें उजागर करके
फन फना उठते हैं
मैं फनफनाया नहीं
मैं बजबजाया नहीं
क्‍योंकि
मैं पागल आदमी हूं।
पागल जानवर नहीं
पागल पक्षी भी नहीं
उल्‍लू, कौआ, गिद्ध
न पक्षी, न जानवर
सिर्फ आदमी
आदमी पागल हो तो
सिर्फ इतना अंतर पड़ता है
कोई उसे पागल आदमी
कह देता है पूरी ताकत से
और अपना गुस्‍सा उबाल देता है
उड़ा देता है भाप बनाकर।
पर मैं न अपने पर
न अपने रोग पर
काबू रख रखा
और बेकाबू हुआ
बेकाबू हद दर्जे तक
सिर्फ उतना ही
कि सब तोड़ फोड़़ डालूं
खुद को फेंक दूं
चौथी मंजिल से
सीधे नीचे सड़क पर।
मुझे चिंता रही सबकी
मोह ममता में उलझा रहा
और मैं पागल हो गया
पागल वह अच्‍छा जो
रहे काबू में
गुस्‍सा उसे अधिक देर
अपनी गिरफ्त में
न गिरफ्तार रख सके।
मैं गिरफ्तार हुआ
कैदी तो तुम भी बने
पर तुम छोटी जेल के
मैं तिहाड़ का
तिहाड़ का कैदी
बनकर रह गया मैं
आजन्‍म सजा हुई मुझे
मैं रोग भुगत रहा हूं
तुम छोटे जेल के
छोटे कैदी
बाहर आ गए
पर मैं आ न सका
न ममता, न मोह की कैद से बाहर
न रोग से बाहर
कहा है किसी कवि ने
बाहर भीतर एक समाना
पर मैं ने बाहर से
और न भीतर से
एक बना रह सका
पर अनेक हुआ नहीं
नेक बना रहा।
इतनी तसल्‍ली काफी है
मेरे जीने के लिए
कि तुम छोटे हो
और मैं बढ़ा
नहीं बन सका पेड़
बढ़कर तो क्‍या हुआ
बढ़ा तो रहा मैं
बढ़ रहा हूं मैं
पेड़ की तरह न सही
पर पेड़ के तने की तरह
तन तो रहा हूं मैं
पत्‍तों के माफिक
रह न सका मुलायम।
मैं जो एक पागल हूं
सिर्फ पागल नहीं
पागल आदमी हूं।
-    अविनाश वाचस्‍पति
-



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नुक्कड़ बन गया इंडिया गेट !




 
 
 











 
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प्रिय छोटे भाई और हिंदी के ख्‍यातिप्राप्‍त चिट्ठाकार अजय झा के शीघ्र स्‍वस्‍थ होने के लिए शुभकामनाएं

हर दिल अज़ीज़ अजय झा
 बकौल श्री पद्म सिंह जी


अजय झा से मिल कर आया .... सो रहे थे... तबीयत बहुत खराब लग रही थी ... पंद्रह दिन से पीलिया था... टेस्ट मे लीवर मे पस आ जाने से स्थिति खराब हो गयी है ... डाक्टर ने छह से सात हफ्ते के लिए बेड पर रहने की संभावना व्यक्त की है और फिलहाल 48 घण्टे तक स्थिति बेहतर होने की उम्मीद करनी चाहिए... पहले दवाओं से ही स्थिति नियंत्रण मे करने की कोशिश की जा रही है ॥

शीघ्र स्‍वस्‍थ होने के लिए आशीर्वाद
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जिन हिन्‍दी ब्‍लॉगरों की पुस्‍तकें प्रकाशित हुई हैं, वे जुगाड़ भिड़ाएं

कहां भिड़ाना है जुगाड़
नभाटा की इमेज पर
करके क्लिक पढ़ लें
और
करें तद्नुसार कार्रवाई।

सजग रहना जरूरी है
तभी पुस्‍तकें बिकेंगी
सुन रहे हो
मोहल्‍लालाइव
पुस्‍तकें सिर्फ दुकानों
पर ही नहीं बिकती हैं

यहां पर भी भिड़ानी पड़ती है जुगाड़
नहीं तो इकट्ठा होता है खूब कबाड़
प्रकाशित पुस्‍तकों का।

चाहते तो बचे रहना
तो कार्रवाई जरूर करना।

आप क्‍यों हंस रहे हैं
आपकी भी तो पुस्‍तक हुई है प्रकाशित
उसको भी सबमिट करना
मेरी तरफ मत देखिए
हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग : अभिव्‍यक्ति की नई क्रांति
2011 में हुई है प्रकाशित
और राजभाषा विभाग ने मांगी हैं
2010 में छपित।

पढ़ रहे हो पंकज सुबीर
पढ़ रहे हो समीर भाई
याद दिला रहा हूं
अयन प्रकाशन को
और शैलेश भारतवासी को भी।

फिर मत कहिएगा
कि बतलाया नहीं
चेताया नहीं
सो रहे थे हम
जगाया नहीं।
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पहचानो भई पहचानो : हम तीनों को पहचानो :कहां हैं हिंदी ब्‍लॉगर


मृदुभाषी हंसमुख

धनी हैं खुशमिजाजी के

कौन,

हम तो रहेंगे मौन

आप ही बतलायेंगे

हिंदी भवन कहां है

क्‍यों चर्चा में है

इन दिनों हिंदी ब्‍लॉगरों में

लगने वाला है महामेला

हिंदी ब्‍लॉगरों का


होने वाला है लोकार्पण

पुस्‍तक का

पुस्‍तक जो पहली है

नहीं पहेली है

हिंदी ब्‍लॉगिंग

अभिव्‍यक्ति की नई क्रांति

नाम है जिसका

सिखाएगी ब्‍लॉगिंग


पहले इस बात पर आते हैं

शनिवार 30 अप्रैल 2011 को

जब आयेंगे

तब मिलना चाहेंगे

उनसे जिनकी फोटो है


कार्यक्रम तो खूब सारे हैं

हिंदी साहित्‍य निकेतन

परिकल्‍पना समूह

नुक्‍कड़ डॉट कॉम

और डायमंड बुक्‍स

मिलेंगे ब्‍लॉगरों को पुरस्‍कार

खूब सारे ब्‍लॉगर होंगे

खूब सारी चर्चा होगी


देश से तो आयेंगे

विदेश से भी आयेंगे

इन्‍हें नहीं पहचान पाये

तो और किसको पहचानेंगे।


फोटो किसने खींची है

और मैं कौन हूं

ब्‍लॉग कौन सा मेरा है

जो बतलाएगा

सच्‍चा मित्र मेरा है।

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क्या जुआ हैं आज पुरस्कार

दो बरस पहले एक अलबेले नवेले पुरस्कार के साथ भारी भरकम राशि की घोषणा की गई। वोटिंग भी हुई। वोटों का डिब्बा लबालब भर गया। लगा कि पुरस्कार देने ही होंगे, पचास हजार कम नहीं होते। सो आनन फानन में रद्द कर दिए गए। पचास हजार का लाभ हो गया, पचास हजार देने नहीं पड़े, पूरे एक लाख की कमाई। सच है कि हिंदी ब्लॉगिंग में भरपूर कमाई है।  न देने का हल्ला मचने पर खूब प्रतिक्रियाएं आने लगीं और अलबेले पुरस्कार प्रदायक ने मौका ताड़ते ही कि मेरी पोस्ट, टिप्पणी व्यवस्था में अव्यवस्था फैल रही है, चिल्लाते हुए पुरस्कार निरस्त कर दिए। मतलब पब्लिसिटी भी ले ली और कानी कौड़ी का भी खर्च नहीं। मुफ्त के आम, गुठली भी मिलीं बिना दाम।

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