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चूनाव की नाव, पब्लिक का लक : दैनिक जनवाणी 8 अप्रैल 2014 अंक में संपादकीय पेज पर तीखी नजर स्‍तंभ में प्रकाशित


देश में 10 अप्रैल 14 को चुनाव संपन्‍न होने हैं या बड़े अथवा फिल्‍मी पर्दे पर लड़ाई भिड़ाई का दृश्‍य फिल्‍माया जा रहा है। इस संबंध में प्रचार और प्रसार की भाषा तो यही बतला रही है कि किसी फीचर फिल्‍म के संवाद सुनाई दे रहे हों जबकि इसे परदे पर देखने पर ऐसा नहीं लगेगा। परदे पर तो इन सबके चुनकर आने के बाद जूते, चप्‍पल, माइक, घूंसे, लातों की जोर आजमायश इन्‍हें यश दिलवाने में अहम् भूमिका दिलाते हैं। इन अनूठे पलों के जीवंत दृश्‍य छोटे परदे पर दिखलाए जा  हैं।  जिनके जाल में  पब्लिक उलझ-उलझ जाती है और अपने वोट को किसी न किसी सपने दिखाने वाले को सौंप आती है। जबकि वह जानती है कि दोनों ने ही नफरत वाली राजनीति की है और उसी की ताकत के बल पर फिर से सत्‍ता  हथियाने को तैयार बैठे हैं।
किसी पार्टी के पद पर आने के लिए फॉर्म भरकर दाखिल दफ्तर के लिए खड़ा होना तो ऐसे कहा जाता है मानो कोई शिशु पहली बार कोशिश करके खड़ा हो गया हो।  टिकट लेने को लाईसेंस लेने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा जा सकता है। वोट अपने पक्ष में डलवाने की कोशिशों को लड़ना और दारू तथा नकदी के वितरण की  भिड़ाई कहकर चुनाव की सारी व्‍याकरण ही बदल दी जाती है। चुनाव की नई व्‍याकरण सचमुच में ही  बहुत मौजूं है।  आप इसी के मजे में इतराते रहते हैं और इतराने के नशे की गिरफ्त में अपना वोट इसलिए इन्‍हें सौंप आते हैं क्‍योंकि इन्‍हें तो किसी न किसी को देना ही है और यह सामने आकर लुभाने वाले को बेहिचक दे आते हैं।
किसी के विजयी होने को कीमतें गिरने के संदर्भ में देखा जाता है। जबकि हारने को किसी जमानत जब्‍त नहीं हुई और इतने सारे वोट मिले हैं। सिर्फ कुछ सौ, हजार या लाख वोटों की कमी को ऐसे माना जाता है, जैसे कुछ सौ पैसों की बात हो रही हो।

आओ चुनाव में खड़े हो जाएं में अपनी कल्‍पना की ताकत का रुतबा दिखलाकर देखिए कितना मनोरंजक व मनभावन चित्र सामने ले आते हैं। इसी प्रकार चुनाव लड़ना सोचने विचारने पर दिलखुश कर देता है। मानो चुनाव न होकर डब्‍ल्‍यू डब्‍ल्‍यू एफ की ड्रॉमेटिक कॉमेडी युद्ध चल रहा हो। युद्ध में भी आनंद लूटना इस खेल की विशेषता है।अइस प्रकार पूरे चुनाव का व्‍याकरण एक हंसी मजाक बनकर रह गया है। यह हंसी मजाक राजू श्रीवास्‍तव, सुनील पाल,बनवारी झोल जैसे कॉमेडियन्‍स का खिलौना बन गया है। जिनका पेशा  पब्लिक को हंसा हंसाकर नोट कमाना है। आजकल हास्‍य कविता हास्‍यास्‍पद कविता बन गई है जबकि हास्‍यास्‍पद कविता मनोरंजक कॉमेडी प्रदर्शन। पर इनके दर्शन आंखें नहीं,  कान करते हैं। चुनाव वह नाव है जो आम पब्लिक का लक बन गया है। जिसने पब्लिक और सरकार को लूट लिया है, वह लकी। जो नहीं लूट पाया,वह बिना उछलने वाला मंकी। मंकी वह जो अपने मन की की यानी चाबी का मालिक हो। इसलिए आज सभी चाहते हैं कि चुनाव की नाव में विजयी होकर मन की सागर से बाहर निकलकर अपना पूरा का पूरा भुवन सुधार लें। पर इसके लिए काला धन चाहिए, जिन चेहरों पर स्याह रंग की बरसात हुई, वह दिन में स्‍वप्‍न देखते हैं, दिन के अपनी मर्जी के रंग के होते हैं। चाहो तो उन्‍हें काले रंग में देख लो,वरना वह रंगीन तो बनायेंगें ही  मस्ती भरी निंदियाई आंखों को। इन्‍हें देखने के लिए धन नहीं खर्च होता पर इनका निर्माण, निर्देशन आपकी कल्‍पना की ताकत, रचना की तार्किकता, सच्‍चाई की डराने वाली अभिव्‍यक्तियां, अनुभूति बनाकर दिखलाती हैं। इसलिए हम सब मस्‍त रहे हैं।  मंकी वही जो मन की जादू की की यानी चाबी कब्‍जाकर व्‍यस्‍त और मस्‍त रहे। इन दिनों जादू की छड़ी की नहीं, जादू की चाबी का काला जादू उम्‍मीदवारों  के फेस पर मारा जा रहा है। वह करें भी तो क्‍या, क्‍योंकि ऐसा मौका दोबारा तो मिलने से रहा।
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चुनाव और हम ब्‍लॉगर्स की जिम्‍मेदारी

चुनाव एक यज्ञ
(सामयिक चर्चा)

चुनाव एक यज्ञ है। इस यज्ञ में वो सब लोग जो वोट देने के अधिकारी हैं, यज्ञ करने वाले हैं और जो अभी वोट देने की उम्र तक नहीं पहुचे हैं वे यज्ञ में सम्मिलित ऐसे सदस्‍य हैं जो इससे ज्ञानार्जन और पुण्‍य दोनों अर्जित कर रहे हैं।

आज किसको वोट दिया जाए और किसको न दिया जाए, ये एक यक्ष प्रश्‍न बन गया है। हम कोई सीधा सादा फार्मूला नहीं लगा सकते कि जो ऐसा है उसको वोट दो और जो ऐसा नहीं है उसको वोट न दो। जो इस पार्टी का है उसको वोट दो और जो उस पार्टी का नहीं है उसको वोट न दो। आज का यह सबसे बड़ा बहस का मुद्दा है कि हम किस प्रत्‍याशी को जिताएं।

हम सभी ब्‍लॉगर्स की भी यह नैतिक जिम्‍मेदारी है कि इस यज्ञ में शरीक हों और इस बहस को निर्णायक मोड़ तक पहुंचाये कि आखिर हम किस तरह के लोगों को चुनकर लोकसभा में भेजें। क्‍योंकि एक गलत चुना हुआ नुमाइंदा सदन में कितना व्‍यवधान पैदा करता है, एक बेईमान मंत्री (
सुखराम जैसे लोगों को याद करो) देश को कितना बड़ा नुकसान पहुचाता है इस का लेखा जोखा करना आसान नही है। यहां तक कि सदन के लिए चुने हुए व्‍यक्ति द्वारा दिए हुए एक एक बयान, एक एक स्‍टेटमेंट के अपने मायने होते हैं और अगर वो गलत हैं, मूर्खतापूर्ण हैं, गैर जिम्‍मेदाराना हैं तो पूरे देश का और समाज का अतिशय अहित होता है।

पिछले सदन के कार्य काल में, हम सभी ने यह जरूर महसूस किया होगा कि सदन के समय की खूब बर्बादी हुई है, सदन बहुत ही कम समय के लिए चला है (पिछले सदनों की अपेक्षा बहुत कम समय तक चला है) और सदन में गंभीर से गंभीर विषयों पर चर्चा या विचार विमर्श बौद्धिक स्‍तर पर नहीं हुआ है। खाली सहमति और असहमति के नारे लगाए गए हैं। कार्यवाही में बाधा पहुचाई गई है। और कई बार तो ऐसा लगा है कि पूरे सदन को गुमराह करने की कोशिश की गई है।

सदन कोई बच्‍चों के खेल का मैदान नहीं है। कुछ विवेकशील लोगों ने यह सोचा कि यदि सदन की कार्यवाही का टी वी पर जीवंत प्रसारण किया जाएगा तो शायद सदन के सदस्‍यों को इस बात का डर रहेगा कि हमें पूरा देश देख रहा है लेकिन यहां तो हालत ये हो गई कि किसी बेशर्म का लोगों ने एक बार कपड़ा उतार दिया तो अब वो कपड़ा ही नहीं पहनना चाहता। हां, सदन में जो शर्मदार सदस्‍य हैं, वे विचारे या तो चुप बैठे रहते हैं या आंखें बंद किए रहते हैं।

हमें अपने गरिमामय राष्‍ट्र के सदन के लिए जिम्‍मेदार और विवेकशील सदस्‍य चाहिएं। हमारे सोमनाथ दादा ने ठीक ही कहा है कि तुम सब लोग इस बार हार जाओगे। उनका तात्‍पर्य सीधे सीधे सदस्‍यों की गैर जिम्‍मेदाराना हरकतों और सदन के गरिमा को कम करने के कारणों से ही रहा होगा। क्‍योंकि यह श्राप किसी विशेष पार्टी या किसी विशेष सदस्‍य के नहीं ये सिर्फ उन लोगों के लिए है जिन लोगों ने सदन की गरिमा को घटाया है।

अंत में, मैं यही कहूंगा कि हम सब अपने अपने ज्ञान के आधार पर तजुर्बे के आधार पर ऐसे छोटे छोटे सूत्रों का प्रतिपादन करें जिससे हमारे समाज के हर व्‍यक्ति को यह संदेश जाए कि वो किसको वोट दे और किसको वोट न दे।

From the desk of : MAVARK
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चुनावी वॉक

अभी-अभी खबर आई है कि भाजपा नेताओं ने रैंप पर कैट-वॉक का अभ्यास किया. भाजपाइयों को शुरू से ही वॉक से कुछ ज़्यादा ही लगाव रहा है. कुर्सी मिलने से पहले वे ख़ुद वॉक करते हैं, बाद में जनता को वॉक करवाते हैं. अडवानी जी ने एक बार रथ को लेकर भारत का वॉक किया था. उस लम्बी वॉक से उन्हें दिल्ली तक के वॉक में आसानी हो गयी थी. फिर उन्होंने कई कारसेवकों को लेकर अयोध्या-वॉक किया. तब कई रामभक्त इस दुनिया से सीधे दुसरी दुनिया, यानि डायरेक्ट श्रीराम प्रभु के चरणों में वॉक करने चले गए थे .और वाजपेयी जी ने कमल के फूल पर बैठकर दिल्ली की गद्दी की ओर वॉक किया था...................... क्योंकि उस समय भी उनके घुटनों में दर्द होता था.

लेकिन दूसरों कि वॉक भाजपाइयों को कम रास आती है. सोनिया गाँधी की गद्दी तक की, दो कदम की वॉक को रोकने में सुषमा स्वराज ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगा दिया था. उनकी इटालियन किस्म की, तेज गति वाली वॉक से डर कर भाजपा ने वॉकआउट कर दिया था. 'वॉक-वॉक पर लिखा है चलने वाले का नाम' कहावत को चरितार्थ करते हुए मनमोहन ने अपनी मोहिनी-वॉक से सारे देश को मोहित कर दिया. आजकल युवराज की जनता के द्वार-द्वार वाली वॉक ने भाजपाइयों कि नींद उड़ा रखी है. वसुंधरा ने छः बार में वॉक ओके किया लेकिन गुर्जरों को उन्होंने खूब वॉक करवाया. वे बेचारे रेल की पटरी पर कई दिनों तक भूखे-प्यासे वॉक करते रहे लेकिन वो अपने महल से नीचे उतर कर नहीं आईं क्योंकि उनके घर में ही ट्रेडमिल है. महोदय, कैट-वॉक सीखने के कई फ़ायदे भी हैं. जिस तरह से कैट शिकार करने से पहले अपने शिकार से जी भर कर खेलती है, कभी उसकी दुम पर पैर रखती है, कभी थोड़ी दूर भागने देती है और फिर झपट कर उसे मुंह में रखती है उसी तरह से यह मतदाता-रुपी चूहे को कई दिनों तक रिझाएंगे, ढेरों वादे करेंगे और अंत में गप्प से उसके वोट को अपने मुंह में रख लेंगे और पांच साल तक चैन की नींद सो जाएंगे. जब वोटर इनके द्वार पर अपनी फरियाद लेकर जायेगा तो यह कैट की तरह दबे-पांव, पिछले दरवाज़े से वॉक कर जायेंगे.
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आतंक और चुनाव

मुंबई में आतंकवाद ने नया रिकार्ड बनाया है
चैन्नै बरसात के आंसुओं से खूब नहाया है ।

गोवा में अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह की धूम है
जारी चुनावी दौर वोट लूटने की करारी मुहिम है।।
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