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'बिग बॉस' में जाने का कोई फायदा नहीं हुआ : नुक्‍कड़ के लेखक असीम त्रिवेदी



दैनिक नवभारत टाइम्‍स के हैलो दिल्‍ली के पेज 3 पर असीम त्रिवेदी ने जो कहा
अगर पूरा नहीं पढ़ पा रहे हैं तो आज दिनांक 9 नवम्‍बर 2012 का नवभारत टाइम्‍स खरीदकर पूरा पढ़ सकते हैं।
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साड्डा हक : दिल्‍ली में वोट देने तो अवश्‍य जाइए, चाहे बिना दिए कारण लिखकर वापिस आइए

नवभारत टाइम्‍स 15 अप्रैल 2012

एक अधिकार और
मिल गया है
प्रयोग कीजिए

न पसंद हो कोई
तो बतला दीजिए
साड्डा हक

दिल्‍ली वाले
कर सकते हैं
इस्‍तेमाल

न हो पसंद कोई
तो न हड़पने दें माल
वरना बाद में रहेगा
मन में मलाल

अभी वोट न देकर
और लिखकर
कर दीजिए
उनके गाल लाल।
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अन्‍ना हजारे को राखी सावंत ने भारतवर्ष का असली मर्द माना


उल्‍टे पांव दौड़ लगाकर साबित करने की मंशा से सराबोर है। भ से भ्रष्‍टाचार के मुकाबले में भूतनी के उल्‍टे पांव देखकर ही अगर भ्रष्‍टाचार से छुटकारा मिल जाता है तो सौदा महंगा नहीं है। वैसे यह भी हो सकता है कि वे अन्‍ना की मर्दानगी को अब भी जांचना चाह रही हों कि कहीं वे भूत-भूतनियों से डरते तो नहीं हैं, तो उन्‍हें इतना जान लेना चाहिए कि जो भ्रष्‍टाचार की खिलाफत करने से नहीं डरा, वो भला इन नजर न आने वाले, ऊधमियों से क्‍या डरेगा। वे कितनी ही शैतानी ताकतें क्‍यों न हों, वे आजकल के भ्रष्‍टाचार विरोधी सत्‍तासीन नेताओं से तो उन्‍नीस ही बैठेंगी।
इससे राखी सावंत की उस दीवानगी का भी पता चलता है कि वे सदा सुर्खियों में बने रहने की चाहत से लवरेज रहती हैं और कोई मौका नहीं चूकती हैं।  ......... पूरा पढ़ने और राय जाहिर करने के लिए क्लिक कीजिए
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नवभारत टाइम्‍स ई पेपर के चिट्ठों की चर्चा अगले सोमवार के लिए मुल्‍तवी कर दी गई है

यह मर्जी मेरी नहीं
उन सबकी है
जिन्‍होंने नहीं बनाए
हैं अपने ब्‍लॉग
नवभारत टाइम्‍स ब्‍लॉग
ई पेपर की वेबसाइट पर।

वेबसाइट पर क्लिक करें
और बना लें
अपने अपने ब्‍लॉग
फिर देखेंगे वे जो सपना
वो सच होगा।

उनके ब्‍लॉग की होगी चर्चा
उनके विचारों का भी बनेगा पर्चा
उस पर्चे को भी सभी पढ़ेंगे
मोड़कर उसे जेब में
नहीं रख सकेंगे

कितना अच्‍छा लगेगा
अब तक पढ़ते रहे हैं आप
और अब लिखने लगेंगे।

आप ब्‍लॉग बनाएं
और उसकी सूचना
nukkadh@gmail.com पर
तुरंत भिजवाएं।

सबसे पहले मिलेगी बधाई
फिर हम ही खिलाएंगे मिठाई।
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कौन हैं इंटरनेट पर कमेंट करने वाले : संजय कुंदन

ब्‍लॉगजनहिताय नवभारत टाइम्‍स दैनिक में आज दिनांक 15 जुलाई 2010 को प्रकाशित लेख साभार।
इंटरनेट ने जब से मध्यवर्गीय घरों में अपनी जगह बनाई है, तब से संवाद और बहस-मुबाहिसे का एक नया सिलसिला शुरू हो गया है। पहली
 बार पता चल रहा है कि लोगों के मन के कोनों में कितनी बातें दबी पड़ी थीं। अब परतें खुल रही हैं, तो बहुत सारा स्याह-सफेद सामने आने लगा है और समाज की फांकें भी पहले से कहीं ज्यादा उजागर होने लगी हैं। साइबर संसार में विचारों की जनतांत्रिकता का हमारे कुछ बौद्धिक चाहे जितना राग अलापें, पर सच यह है कि इस पर अपनी बात नियमित रूप से कहने वालों का एक बड़ा तबका स्वभाव से ही गैर जनतांत्रिक और रूढ़िवादी है। यह कैसी विडंबना है कि मूल रूप से जनतांत्रिक संभावनाओं वाला यह मीडियम गैरजनतांत्रिक तत्वों के ज्यादा काम आ रहा है। 

हर कोई प्रकाशक 
इससे पहले प्रिंट माध्यम की अपनी सीमाएं थीं। लिखित विचार व्यक्त करने में भाषा की कुछ अनिवार्यताएं थीं, उन्हें बीच में संशोधित-नियंत्रित किए जाने की गुंजाइश थी। अब यह गुंजाइश न के बराबर है। इंटरनेट ने अब बीच के वाहक की भूमिका लगभग समाप्त कर दी है। अब हर व्यक्ति प्रकाशक है। कोई भी घर बैठे अपने विचार लाखों लोगों को संप्रेषित कर सकता है। वह चाहे तो अपनी पहचान भी छुपा सकता है। उसे खोज पाना आसान नहीं। हर कोई बेधड़क बोल रहा है। औपचारिकताओं का लबादा उतर चुका है, इसलिए भीतर का सब कुछ उसी रूप में सामने आ गया है, जिस रूप में वह है। जिस तरह पहले लोग अखबारों में पत्र लिखते थे, उसी तरह अब अखबारों के इंटरनेट एडिशन पर अपनी राय देने लगे हैं। संपादकीय से लेकर खबरों, लेखों तक पर तत्काल प्रतिक्रिया दी जाती है। कुछ स्वतंत्र वेबसाइटों पर भी इसी तरह के कमेंट किए जाते हैं। 

आक्रामक और उतावले 
इन कमेंट करने वालों पर नजर डालें तो कुछ चीजें साफ होती हैं। अब कुछ नामों को साफ तौर पर चिह्नित किया जा सकता है। ऐसा लगता है कि ये काफी सचेत ढंग से प्रतिक्रिया देने का काम कर रहे हैं। इनमें से कुछ अपना पता अमेरिका या दुबई बताते हैं। इनकी नियमितता देखकर सचमुच हैरत होती है। लेकिन जरा इनके दूसरे पहलुओं पर भी गौर करें। ये जिस तरह की भाषा में बात करते हैं, उससे कतई नहीं लगता कि ये बहुत ज्यादा शिक्षित और परिपक्व लोग हैं। इनमें काफी आक्रामकता और उतावलापन नजर आता है। ऐसा लगता है कि ये पूरा लेख पढ़ने का कष्ट कभी नहीं उठाते और उसे सरसरी तौर पर देखकर झट अपनी राय जाहिर कर देते हैं। लेकिन इनके कंसर्न क्या हैं, बहुत आसानी से समझ में आ जाता है। यह तबका सबसे पहले तो घोर स्त्री विरोधी है। यह उस रूढ़िवादी दृष्टिकोण का समर्थक नजर आता है कि स्त्रियों को अपनी 'हद' में रहना चाहिए। जैसे छेड़खानी या बलात्कार की खबरों पर अफसोस जताने के तुरंत बाद ये लोग यह कहना नहीं भूलते कि लड़कियां अपनी मर्यादा भूलेंगी तो उनके साथ यह सब होगा ही। प्रेम, विवाह, तलाक, लिव- इन रिलेशन आदि पर यह तबका घोर पुरुषवादी तरीके से सोचता है। ऐसा लगता है कि खाप पंचायतों के प्रतिनिधि कंप्यूटर लेकर बैठ गए हों। फिल्म अभिनेत्री खुशबू के विवाह पूर्व सेक्स संबंधी बयान पर ऑनलाइन प्रतिक्रियाओं को देखें तो बहुत कुछ साफ होता है। ऐसे लेखों को यह तबका बिल्कुल पसंद नहीं करता जिनमें स्त्री को जीवन के हर स्तर पर स्वतंत्रता देने की बात कही गई हो या पुरुष के पाखंड पर प्रहार किया गया हो। ऐसे मामलों में तो ये गाली-गलौज पर उतर आते हैं। कई बार तो लेखक पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने के साथ उसे धमकी भी दी जाती है। 

स्त्री विरोधी होने के साथ यह वर्ग घोर अल्पसंख्यक विरोधी भी है। ज्योंही मुसलमानों से जुड़ी कोई बात आती है, यह घोर सांप्रदायिक भाषा में बात करने लगता है। किसी आतंकवादी के पकड़े जाने की खबर या आतंकवाद से जुड़े लेखों के तथ्यों को समझने के बजाय यह सपाट तरीके से इस तरह के कमेंट करता है कि सारे मुसलमान आतंकवादी है और उन्हें सबक सिखाया जाना चाहिए, भारत को पाकिस्तान पर हमला कर देना चाहिए, आदि-आदि। इन लोगों को यह मंजूर नहीं कि धर्म या संस्कृति पर आलोचनात्मक ढंग से बात की जाए। ज्यों ही मिथकों या पौराणिक पात्रों को लेकर कोई नया विश्लेषण सामने आता है या विमर्श शुरू होता है, यह तबका हथियार लेकर मैदान में कूद जाता है। इन मुद्दों पर चीजों को तार्किक ढंग से रखने की बजाय यह सीधे तेजाबी भाषा पर उतर आता है। 

इंटरनेट हिंदू 
इंटरनेट पर राय रखने वाले लोग मोटे तौर पर दो तरह के हैं- एक तो वे हिंदूवादी जो योजनाबद्ध तरीके से अपना कैंपेन चला रहे हैं। अभी कुछ दिनों पहले एक कम चर्चित हिंदूवादी पत्रिका में ऐसे तत्वों को 'इंटरनेट हिंदू' कहा गया था और इस बात पर खुशी प्रकट की गई थी कि इन लोगों ने हिंदुओं का पक्ष रखने के लिए इंटरनेट माध्यम का बखूबी इस्तेमाल किया है। ये किन हिंदुओं का पक्ष रख रहे हैं, स्पष्ट है। लेकिन बिल्कुल इन्हीं की भाषा बोलने वाला एक दूसरा वर्ग भी है जो किसी योजना के तहत ऐसा नहीं कर रहा। वह एक सचेत पाठक के तौर पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहा है लेकिन इस क्रम में उसकी पोल खुल रही है। यह खाता-पीता आत्ममुग्ध मध्य वर्ग है जो उदारीकरण के दौर में संपन्न हुआ है। ऊपर से आधुनिक दिखने वाला यह तबका विचार के स्तर पर बेहद पोंगा है। इस वर्ग को देखकर अंदाजा लगाया जा सकता है कि हिंदीभाषी इलाकों में आर्थिक समृद्धि जरूर आई है, लेकिन यहां समाज का जनतंत्रीकरण अब भी नहीं हो सका है। लेकिन सचाई यह है कि यही वर्ग देश के नीति-निर्माण को सबसे ज्यादा प्रभावित करता है। सारी विकास प्रक्रिया इसी के इर्द-गिर्द घूम रही है। इंटरनेट ने विचार के क्षेत्र में व्याप्त एक गहरे संकट का संकेत किया है। क्या हम उसे समझेंगे?
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कारें भी करती हैं खुदकुशी (अविनाश वाचस्‍पति)

सावधान रहिए और
रहिए सदा सतर्क
लापरवाही मत कीजिए
नहीं तो होगी कार गर्क।


जानने के लिए
सुरक्षा उपाय
इमेज पर करें क्लिक
और पूरा पढ़ जायें
जरूर अपनायें।

नवभारत टाइम्‍स से साभार
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फेसबुक पर रहें सावधान : इसे अवश्‍य पढि़एगा पढ़ने में कोई लापरवाही मत करिएगा (अविनाश वाचस्‍पति)


विश्राम मत करें
रहें सावधान और
सतर्क
मत पूछें कोई तर्क
बस सावधान रहें
सतर्क रहें

इमेज पर करें क्लिक
और जान लें जानकारी
फेसबुक और आपके कंप्‍यूटर की जान
के लिए आ रही है बहुत भयानक महामारी
पर इसमें मत बनने दें बीमारी
और सावधान रहें।

इस पोस्‍ट के लिंक को
अपने मित्रों और दुश्‍मनों को भी भेजें
क्‍योंकि मित्र तो मित्र ही रहेंगे
पर आप सावधान करेंगे अपने दुश्‍मनों को
तो उनके मन को जीतने में भी हो जाएंगे कामयाब
तरीका होगा यह नायाब।

आज के दैनिक नवभारत टाइम्‍स से इमेज और समाचार जनहित में साभार।
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शब्‍दों का सफर : अजित वडनेरकर : आज नवभारत टाइम्‍स में

शब्‍दों का सफर
अजित वडनेरकर
मौजूद हैं आज
नवभारत टाइम्‍स पर।

जिसे बता रहे हैं
अनुराग अन्‍वेषी
शब्‍दों की खिचड़ी
वो वास्‍तव में है
पुलाव सुगंधमय।

अजित वडनेरकर के शब्‍दों का सफर
निराला है आला है
शब्‍दों ने सबको भीतर तक रंग डाला है
यह रंग है शब्‍दों का
जो तरंग का सफर बन
रोज निखर रहा है।

अजित जी वाकई विश्‍वजीत बनेंगे
उनके शब्‍दों के रंग
रंग सबके बनेंगें
फूल खिलेंगे
हंसी खिलखिलाएगी
भूख लगेगी दिमाग में
तो दिमाग में
शब्‍द खपाई भी होगी।

भारी भरकम शब्‍द
अपने मायने
पर मायने सच्‍चे अर्थों में
अजित जी निखारेंगे
शब्‍दों की नई दुनिया रच डाली है
अर्थ सबका ढूंढ निकालेंगे।

हम सब मोहित हैं
वे शब्‍दों का सच्‍चा अर्थ हैं
इस अर्थ पर अजित वडनेरकर
सदा सार्थक हैं।

पर आपको
क्‍या जचता है
बतायें हमें
तो जानें सभी
पर अभी
के अभी।
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मोबाइल डांस मांगे रे...

मोबाइल डांस मांगे रे...

नवभारत टाइम्‍स दैनिक के ऑनलाईन संस्‍करण में प्रकाशित उपर दिए गए शीर्षक पर क्लिक करिए और आनंद लीजिए।
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