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हिंदी ब्‍लॉगरों का इस वर्ष का नया गीत - अविनाश वाचस्‍पति मुन्‍नाभाई

आप हिंदी साहित्‍यकारों की सुनो
हिंदी साहित्‍यकार सुनेंगे जरूर
हिंदी ब्‍लॉगरों की

चाहे पुकारो उन्‍हें हिंदी ब्‍लॉगर
या समूचे अंतर्जाल के चिट्ठाकार
सब सबकी सुनेंगे

पाठक, लेखक और प्रकाशक
इतना तो तय है कि होगा फायदा
नीतियों की उन्‍नति का कायदा

पी एम मोदी ने भी है फरमाया
विकास हरेक अपेक्‍िशत ने पाया
इसमें न कोई भ्रम अौर माया

चलो भूटान मिलो भूटान
वहीं मिल जुल मन करेंगे
अल्‍पाहार अौर  भोजन

अभिव्‍यक्ति अनुभूति का लिखेंगे
रोज नव नूतन इतिहास
क्रांति का बिगुल बजायेंगे

रोज लिखेंगे इबारत नयी
झण्‍डा हिंदी ब्‍लॉंगिंग का
परचम मनभावन फहराएंगे।

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पीके बिना पिए के कथासूत्र


पी के सिर्फ एक फिल्‍म का नाम भर नहीं है बल्कि समाज में फैली हुई कुरीतियों पर तीखी और गहरी चोट करती है और चोट ऐसी जो समाज के खोट को उजागर करता चलता है। धर्मगुरूओं के तथाकथित भगवानों और उन्‍हें अपने शिंकजे में कसे हुए उनके मैनेजरों के आम भोली पब्लिक से धन वसूलने के धंधे को देखने और उनसे बचने को मजबूर करती है पर बच नहीं पाती है, जितना बचने की कोशिश करती है, उतना अधिक उसमें उलझती जाती है।
जिस प्रकार धर्म के ठेकेदार विभिन्‍न लुभावने प्रतीकों के माध्‍यम से अपनी जड़ों को मजबूती से जमाए बैठे हैं, उसी के सदृश पी के नाम एक ऐसा प्रतीक है जिसकी अन्‍य मिसाल न समाज में और न दुनियाभर में मिलती है। एलियन फिल्‍म का आधार है जिसकी धुरी पर पूरी फिल्‍म घूमती है पर जितना जनता जानती है उससे अधिक न तो बताती है और न निर्देशक, पटकथा कहानी लेखक कल्‍पना के धागों में कुशलता से पिरोकर परदे पर पेश कर पाते हैं। एलियन की अब तक परदे की सभी फिल्‍मों से रोचक और कॉमेडी से भरपूर फिल्‍म बनी है।
पृथ्‍वी और अंतरिक्ष के अन्‍य सितारों की साम्‍यताओं को अनजाने ही फिल्‍म में दिखा दिया गया है कि गोल का मतलब गोल होता है। भाषा और बोली भी कुछ अहमियत रखती है जो कि जमीन पर इशारों के जरिए अपने अलग अर्थ देती है। रिमोट, टेपरिकार्डर, ट्रांजिस्‍टर, कपडे, नंगेपन का स्‍थाई भाव अपने में समेटे हुए है। झूठ का कोई वजूद उपर नहीं है, उपर मतलब अच्‍छाईयों का भंडार और नीचे झूठ, कुरीतियों, काले धन और भगवान को बेचने का व्‍यापार। उपर कोई भगवान नहीं और नीचे कोई ऐसा नहीं जो परेशान नहीं। उपर वाले तकनीकी तौर पर हमसे बहुत आगे और हम उनके पासंग भी नहीं ठहरते हैं। वहां वह सर्वज्ञ है और आत्‍मा का मौजूदा स्‍वरूप परमात्‍मा से साम्‍यता रखता है।
धरती पर भगवान धन कमाने भर का औजार भर है, कोई मिट्टी के छोटे से लेकर विशालकाय भगवान और तपस्विी जैसे उनके विचारों का ढोल पीटकर घर और तिजोरी भरता है। फिल्‍म में सीन दर सीन पब्लिक के ठहाके गूंजते रहते हैं। आनंद पब्लिक का जनभाव बन गया है। फिल्‍म की सफलता के लिए जरूरी सभी मसाले भरे हुए हैं। फिल्‍म सफल है और करोडों का धंधा कर रही है। निर्माता से लेकर कलाकारों तक की झोली नोटों से लबालब भर रही है। फिल्‍म की सफलता ने सफल होने के सारे पैमाने बदल दिए हैं। सफल होना हरेक फिल्‍म और घटना के लिए अलग है।
अलगाव का सूत्र इस फिल्‍म में लगाव का वायस बना है। आत्‍मा से परमात्‍मा और शिव से शंकर की यात्रा यूं तो सच लगती है परंतु सच है क्‍या इसे कौन भला आदमी जानता है। लगने को तो इंसान को हरेक भगवान सच स्‍वरूप ही नजर आता है पर सच का नाता किससे कितना गहरा है, इसे कौन समझ पाता है या समझा पाता है। जो जिससे जितना जुड़ जाए उसके लिए वही सच है। जिस प्रकार आत्‍मा अजर अमर और सत्‍य है उसी प्रकार एक सच्‍चाई परमात्‍मा है। जबकि ईमानदारी से बढ़कर भला कौन है, ईमानदार सदा सनातन सत्‍य है, इसे जान समझ लेना चाहिए।
-    अविनाश वाचस्‍पति
-साहित्‍यकार सदन, 195 पहली मंजिल, सन्‍त नगर, ईस्‍ट ऑफ कैलाश के पास, नई दिल्‍ली 110065 फोन 01141707686/08750321868 ई मेलnukkadh@gmail.com
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व्‍यंग्‍य भूषण सम्‍मान लेने चला भूटान - अविनाश वाचस्‍पति

व्‍यंग्‍य भूषण
शब्‍दों का आभूषण
कल्पना नहीं परिकल्पना की
सच्‍चाई है
सपना नहीं सच है
मिल रहा है भूटान में
देश के शब्‍द
पा रहे सम्‍मान
विदेश में विचार
भा रहे पाठकों को
चाह बने लेखकों की
राह बने फैन्स की
अब पसंद भूटान की
चलो भूटान
चलें भूटान
काठमांडू पहुंचना
सच न हो सका
भूटान पहुंचना
रुक न सकेगा
रोक न सकेगा कोई
चला भूटान

15 जनवरी 2014 में।
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एकाएक कहां चले गए सुरेश यादव - अविश्‍वसनीय

प्रिय मित्र नहीं रहे। एकदम अविश्‍वसनीय। अभी 30 बरस पहले उनकी कविताओं का पहला संग्रह "उगता अंकुर" आया और कविताओं का नया हालिया कविता सग्रह "चिमनी पर टंगा चा्द"। विश्‍वास नहीं हो रहा है कि "‍चांद चिमनी पर टंगा" रहेगा। भाई सुरेश यादव यूं सहसा साहित्यिक जगत से दूर जाएंगे
अपनी ईमानदारी, कर्मठता, जुझारूपन और जुननी तथा अपनी लगन के धनी, जिनका जीवन वही रहा, संवेदनशील होकर लिखी कविताएं भुलाए नहीं भूली जा सकेंगी और बार-बार उनकी याद दिलाएंगी।
"उनके प्रशंसक मित्रों में भाई सुभ...ाष नीरव, उनकी कविताओं के असंख्‍य दीवाने और मैं ताउम्र भुला नहीं सकेंगे। उनसे जुड़्ी तमाम यादें बारंबार कचोटेंगी।" पिछले सप्‍ताह उनका मेरे आवास पर आना। मेरी मुंबई से 30 दिसम्‍बर 2014 की वापसी पर सुबह उनसे फोन पर बतियाना और उनका यह कहना कि अभी वह एक आवश्‍यक मीटिंग में जा रहे हैं क्‍योकि उन्‍हें देरी पसंद नहीं थी। फिर फोन न आना और एकाएक उनके जाने की हृदय विदारक खबर पढ़कर मन खिन्‍न है परंतु नियति की नीयत पर संदेह नहीं किया जा सकता है। इसलिए सब स्‍वीकार है। इतनी यादें हैं उनसे जुड़्री कि पूरी पुस्‍तक लिखी जा सकती है और लिखूंगा लगातार। हर बार नया जो उनके व्‍यक्तित्‍व की परतें खोलता है। इसी विश्‍वास के साथ .... हर बार लगातार।
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