क्या अखबार वालों को मूल पोस्ट में हेर-फेर करना चाहिए ???????

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  • प्रमोद ताम्बट
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  • आज राष्ट्रीय जागरण ने मेरे ब्लॉग व्यंग्य से मेरी पोस्ट बाए बाजू वालों का हश्र  अपने ब्लॉग कॉलम फिर से में ली है, मैंने पाया है कि उन्होंने पोस्ट में अपनी मर्ज़ी से थोड़ा बहुत हेर—फेर किया है। मैं नुक्कड़ के माध्यम से इस प्रश्न को उठाना चाहता हूँ कि अखबार वाले हमारी पोस्टे बिना किया सूचना, जानकारी, अनुमति के छापतें हैं मानदेय भी नहीं देते हैं, तब उन्हें क्या मूल पोस्ट में ऐसा हेर फेर करना चाहिए ???????
    राष्ट्रीय जागरण की यह गड़बड़ी जनसंदेश टाइम्स लखनऊ में प्रकाशित मूल लेख से मिलान कर पकड़ी जा सकती है। मैं अखबारों की इस प्रवृत्ति का घोर विरोध करता हूँ और आशा करता हूँ कि और ब्लॉगर्स व लेखक भी करेंगे।

    प्रमोद ताम्बट

    भोपाल
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    http://www.facebook.com/profile.php?id=1102162444

    19 टिप्‍पणियां:

    1. आप सीरियस है मुक़दमा करें... नहीं तो कोई फर्क नहीं पडने वाला..

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    2. प्रमोद भाई ,
      पहले ये स्पष्ट करें कि क्या इस बदलाव के कारण आपके व्यंग्य के मूल उद्देश्य प्रभावित हुआ है , या सिर्फ़ शब्दों का हेरफ़ेर किया गया है . दोनों वर्जन की प्रति मुझे मेल करें तो शायद इसका कानूनी पहलू बता सकूं । वैसे मेरे साथ बरसों पहले एक इससे भी बडा कमाल हुआ था । मेरा एक आलेख जो कि एक समाचार पत्र में पहले ही मेरे नाम से छप चुका था उसके लगभग छ;महीने के बाद राष्ट्रीय सहारा के एक खुद को मित्र बताने वाले अखबारी लाल जी ने अपने नाम से ही छाप लिया । चाहा तो था कि बस निपटा डालूं पहली बार ही , लेकिन फ़िर जाने क्या सोच कर गुजर जाने दिया , अर्से बाद मिले मित्र तो बंगले झांकने लगे और नज़रें भी न मिला सके

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    3. अजय भाई आपने किसी नेत्र चिकित्‍सक से जांच करवा लेनी चाहिए थी कि कहीं वे मित्र भेंगे न हो गए हों, मतलब कहीं पे निगाहें और कहीं पे निशाना वाली इस्‍टाईल।

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    4. बंधु अजय कुमार जी,
      दो जेपीजी भेज रहा हूँ, जनसंदेश टाइम्स वाले में मेरा मूल व्यंग्य जैसा का तैसा है जबकि दैनिक जागरण में हेर—फेर किया गया है। जागरण ने छटवी लाइन में तौर तरीकों को सही बता कर मेरे मंतव्य को ही बदल दिया है। और भी आगे परिवर्तन है परन्तु जैसा कि आपने नुक्कड़ के कमेन्ट में जानना चाहा है कि इससे मूल उद्देश्य प्रभावित हुआ है या नहीं, इसका प्रश्न ही क्या उठना चाहिए, कोई अप्रिय चीज़ संपादित कर निकाल देना एक बात होती है परन्तु हेर—फेर करना एकदम दूसरी बात होती है। समाचार पत्र को यदि कुछ पैरा ठीक नहीं लगे हो तो वे पोस्ट को ले ही क्यों रहे हैं, कोई उन्हें हाथ जोड़कर निवेदन तो कर नहीं रहा कि भाई हमारी पोस्ट अखबार में छापने की मेहरबानी करो। बहरहाल, वे अखबार वाले है, ताकतवर है, उनका कुछ बिगड़ना तो है नहीं परन्तु मैं सोचता हूँ मैं संपादक को व्यक्तिगत रूप से पत्र अवश्य लिखूँगा।

      प्रमोद ताम्बट
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    5. प्रमोद ताम्बट जी,

      आपकी व्यथा को मैं समझ सकता हूं...अपनी रचना से खिलवाड़ किया जाए तो क्या बीतती है, ये कहने की बात नहीं...

      मैंने अपनी एक पोस्ट को तोड़-मरोड़ कर अखबार में पोस्ट छापे जाने का मुद्दा पिछले महीने तेरह तारीख को उठाया
      था...ये रहा लिंक...

      ब्लॉगरों से अख़बारों की चोट्टागिरी...खुशदीप



      इस मुद्दे पर वैसे ब्लॉगरों की ही राय नहीं मिलती...लेकिन मैंने जिस अखबार ने ऐसा किया था उसके खिलाफ क़ानूनी कार्रवाई शुरू कर दी है...देखिए क्या होता है...इन्स्टेंट रिएक्शन तो ये है कि मेरी पोस्ट को उस अखबार ने छापना बंद कर दिया है...जिसका मुझे कोई मलाल नहीं है...लेकिन मैं इस लड़ाई को अंज़ाम तक ले जाकर ही छोड़ूंगा...जो भी नतीजा आएगा शायद उससे सभी ब्लॉगरों को लाभ मिले...

      जय हिंद...

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    6. बात एक..... अखबार को ऐसा नहीं करना चाहिए... बात दो... यदि करना जरुरी है तो लेखक से अनुमति लेनी चाहिए...... बाकी समरथ को नहीं दोष गोसाईं ....

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    7. एक तो चोरी और फिर चोरी के माल में मिलावट, दो अपराध। पर आप चोरी के खिलाफ आवाज न उठाएंगे, अपराधी का हौसले बुलंद न होंगे।

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    8. अखबार वाले हमारी पोस्टे बिना किया सूचना, जानकारी, अनुमति के छापतें हैं मानदेय भी नहीं देते हैं,
      .
      यह हमारी कमी है. अखबार वालों को तो पका पकाया खान मिल जाता है, परोसने के लिए. उनकी नौकरी है. हम हैं की अखबार मैं खबर अपने लेख़ की छपते ही खुश हो के दूसरों को सुनाते हैं क्यूंकि हम खुद अखबार को ब्लॉग से अधिक अहम समझते हैं .होना तो यह चाइये की अखबार वालों से सवाल करें भी आपने बिना आज्ञा कैसे ले लिया मेरा लेख़?

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    9. आय थिंक आप मुकद्दमा तो प्रस्तुत करो ही। कोई तो करे। नहीं तो देखिये ये दुष्ट मीडिया एक दिन ब्लॉग को बरबाद कर डालेगा।

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    10. बंधुओं,
      मुझे लगता है ऐसे मामलों में अकेला चना भाड़ फोड़ने जाएगा तो बात बनेगी नहीं। ब्लॉगर्स को राष्ट्रीय स्तर का एक ऐसा संगठन चाहिए जो ब्लागिंग संबंधी तमाम गतिविधियों के अलावा ऐसे मामलों पर भी नज़र रखे। एक मजबूत संगठन के ओर से जब अखबारों पर इस अन्याय के खिलाफ दबाब बनाया जाएगा तब मुझे लगता है कुछ हो सकेगा।
      वैसे मैंने तो दैनिक जागरण को अपनी शिकायत भेज दी है और मैं प्रेस परिषद के समक्ष भी विस्तार से यह मुद्दा इठाना चाहता हूँ।

      प्रमोद ताम्बट
      भोपाल
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    11. Aapne bilkul sahi kaha... Iske liye ek sangthan banna hi chahiye...

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    12. हम सब इसका घोर विरोध करते है और मेरे साथ तो पता नही क्या क्या चल रहा है………लोग मेरी रचनाये चुरा कर अपने संकलन मे छपवाने की तैयारी मे है और बिना बताये बिना अनुमति के मेरी पोस्ट छाप रहे है पिछले 3 साल से मगर कोई खबर नही ये तो मुझे अभी 5-7 दिन से पता चला है ……………अब बताइये क्या करूँ ? मै भी आपकी नाव मे ही सवार हूँ।

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    13. प्रमोद जी सुझाव मानने योग्य है।

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    14. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
      प्रस्तुति भी कल के चर्चा मंच का आकर्षण बनी है
      कल (16-5-2011) के चर्चा मंच पर अपनी पोस्ट
      देखियेगा और अपने विचारों से चर्चामंच पर आकर
      अवगत कराइयेगा और हमारा हौसला बढाइयेगा।

      http://charchamanch.blogspot.com/

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    15. अखबार वालों की यह हरकत गलत है निंदनीय है

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    16. सब टिप्पणियों से सहमत हूँ और ताकतवर है तो क्या हमारा माल चोरी करेंगे. मैं अपने पत्रकारिता के अनुभव से कह रहा हूँ कि-कई बार संपादक इस चोरी की जानकारी नहीं होती है, लेकिन कम से कम लेखक को सूचना देना और अनुमति लेनी चाहिए.अपने पत्रकारों दी जाने वाली राशी का कम से कम 50 प्रतिशत तो देना ही चाहिए. जब विज्ञापन के रेट कम से कम 100 प्रति वर्ग सेंटी मीटर ले रहे हो तब दो रूपये प्रति वर्ग सेंटी मीटर कोई ज्यादा तो नहीं. वैसे संचार माध्यमों की दुनिया में संपादक अगर एक ईमेल भेजकर अनुमति मांग ले. तब छोटा नहीं हो जाएगा.फिर हो सकता है कि-लेखक बिना किसी चार्जिंग लिये ही अनुमति प्रदान कर दें. श्री दिनेश राय द्विवेदी जी के विचारों को मानते हुए अपना विरोध जरुर जताना चाहिए. वैसे हम इतना अच्छा लिखते ही नहीं है, जो हमारा लेख कोई चुरा सकें.इसलिए हम फ़िलहाल बचे हुए है और भविष्य गर्भ में है.

      कोशिश करें-तब ब्लाग भी "मीडिया" बन सकता है क्या है आपकी विचारधारा?यह टी.आर.पी जो संस्थाएं तय करती हैं, वे उन्हीं व्यावसायिक घरानों के दिमाग की उपज हैं. जो प्रत्यक्ष तौर पर मनुष्य का शोषण करती हैं. इस लिहाज से टी.वी. चैनल भी परोक्ष रूप से जनता के शोषण के हथियार हैं, वैसे ही जैसे ज्यादातर बड़े अखबार. ये प्रसार माध्यम हैं जो विकृत होकर कंपनियों और रसूखवाले लोगों की गतिविधियों को समाचार बनाकर परोस रहे हैं.?

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    17. यार खुशी मनाओ कि तुम्हारा यह ब्लाग छप गया । यह दुर्भाग्य है इस तरह का भी राष्ट्रीय स्तर पर छपता है ।

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    18. यह लेखकों के साथ ज्यादती है. यह मानदेय नहीं देते हैं साथ साथ सरकार से लाखों का विज्ञापन भी लेते हैं तथा और सुबिधायें भी जिनकी पूरी जानकारी मुझे नहीं है, मगर सुविधाएँ लेते हैं. इसकी जानकारी भी प्राप्त कीजिए. इसका विरोध हरएक स्तर पर होना चाहिए.

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    आपके आने के लिए धन्यवाद
    लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

     
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