संवाद | राजेंद्र यादव-अशोक वाजपेयी

संवाद राजेंद्र यादव-अशोक वाजपेयी

3 टिप्‍पणियां:

  1. बहस पढ़ कर निराशा हुई । वही पुराना राग । साहित्य को इतने खेमों , वर्गों में बाँट दिया है की डर है कहीं पाठकों का भी बटवारा न हो जाय। संभवत यही कारण है की पिछले ६० वर्षों के साहित्य से आम जन का परिचय बहुत कम है।

    जवाब देंहटाएं
  2. लिंक पर जाकर देखा, अच्छा लेख और अच्छी पेशकश। लेकिन हो सके तो लिंक देने के बजाय यहीं पोस्ट करें तो अच्छा हो।

    जवाब देंहटाएं

आपके आने के लिए धन्यवाद
लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

 
Copyright (c) 2009-2012. नुक्कड़ All Rights Reserved | Managed by: Shah Nawaz