सरकार बिना बीमारी के सिर्फ अंदेशे के बूते ही चिकित्सा करने को तैयार हो गई है। पोस्टों और टिप्पणियों में हम चाहे कितना ही शोर मचा लें, आपस में एक दूसरे के सिर फोड़ डालें, बिना किसी बात के एक दूसरे की टांगे खींचने या गला भींचने पर उतारू हो जायें। जरूरत न पड़ने पर भी टांग तोड़ डालने पर तैयार हो जाएं और शब्दों में घमासान ऐसा मचा दें कि विश्वयुद्ध का सा आभास होने लगे। तेरी टिप्पणियां मेरी पोस्ट मिलकर खूब गजब ढाएंगी, पर रेल पटरियों पर जाकर कब्जा करना जाटों के बस का ही करना जाटों के बस का ही .... हालात की संपूर्ण जानकारी के लिए सिर्फ अपने माउस को कष्ट दीजिए
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लंबे अंतराल के बाद एक आलसी फिर से ब्लॉगर परिवार में
कहते हैं "आप राजनीति को छोड़ दें, राजनीति आपको नहीं छोडती". मेरे हिसाब से यह बात ब्लोगिंग पर भी शत-प्रतिशत सही बैठती है. मैंने आलस की वजह से अपने ब्लॉग जेएनयू पर काफी समय से लिखना छोड़ रखा था. ब्लॉग पढता भी नहीं के बराबर था इधर. लगभग नाता टूट ही चला था ब्लोगिंग से.
पर एक बार आप ब्लोगर बन जाएँ, ब्लोगिंग आपके रगों में बैठ जाती है. इस आभासी दुनिया में अपनी बात को रखने का एक अलग ही मोह होता है जो कि आपको बार बार अपनी और खींचता है. बीच-बीच में जब भी इधर आता था. जोश-खरोश से लोगों को ब्लोगिंग करते देखता. एक दूसरे से बहस करते, लड़ते, एक-दूसरे का उत्साह बढाते... कहीं न कहीं एक टीस सी उठती था.. लगता था कुछ छूट रहा है..
पिछले कुछ समय से यह नोस्टाल्जिया कुछ ज्यादा ही बढ़ गया था. सो फिर से ब्लोगिंग शुरू करने की ठानी. जेएनयू में अब हूँ नहीं. दक्षिण कोरिया की सियोल नेशनल यूनिवर्सिटी में अध्ययन कर रहा हूँ. सो पुराने ब्लॉग से हटकर एक नया ब्लॉग बनाने की सोची और एक नया डोमेन खरीदा और नया ब्लॉग बनाया: सुबह की शान्ति के देश में- द कोरियन एक्सपीरिएंस . पहली पोस्ट आज ही लिखी है: ब्लॉगिंग: ये रोग बड़ा है जालिम आपसे स्नेह और उत्साहवर्द्धन की अपेक्षा है..
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