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हिन्दी ब्लागिंग का इतिहास और प्रवृत्तियों पर लोगों की पैनी नजर है..

आवश्यकता, उपयोगिता, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय दुनिया से सैकण्डों में अपनी बात के जरिए जुड़ने वालों की बढ़ती संख्या को देखते हुये आज ब्लॉगिंग जैसे द्रतगामी संचार माध्यम को  पॉचवा स्तम्भ माना जाने लगा है। कोई इसे  वैकल्पिक मीडिया तो कोई न्यू मीडिया की संज्ञा से नवाजने लगा है । हलांकि  हिन्दी ब्लॉगिंग का इतिहास महज ८ वर्ष का ही है मगर इसकी पैठ और प्रवृत्तियों पर लोगों की पैनी नजर है...

हिन्दी ब्लागिंग का इतिहास और प्रवृतियों पर डा. अरविन्द मिश्र की वेबाक राय आज सृजनगाथा पर प्रकाशित हुई है ....पढ़ने के लिए यहाँ किलिक करें



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रामलीला नहीं, हां ! पुलिसलीला जरूर है

इस लाठीचार्ज के असली हकदार तो वे कालेधनधारक थे, पर भला कभी कोई खुद को भी मारने-पीटने की सुपारी खा सकता है, चाहे वो सुपारी सेवन का नशे की हद तक लती हो। पर यह दुलत्‍ती भी उसे माफिक ही आती है। इस घटना से यह भी साबित हो गया है कि मौत का एक दिन पहले से तय है और इसमें किसी तरह की फेरबदल करना संभव नहीं है। कांग्रेस की मति की गति दुर्गति की ओर अग्रसर है। कहा जा रहा है कि लाठियां पुलिस ने नहीं बरसाईं तो हम यह मान लेते हैं कि वे आसमान से एकाएक कूद पड़ी थीं और सच्‍चाई की राह पर चलने वालों पर टूट पड़ी थीं। लाठियां पुलिस की हथियार हैं, ......  यदि ये पंक्तियां और विचार पसंद आए हों और पूरा पढ़ना चाहते हों तो यहां पर क्लिक कीजिएगा
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कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स की ओपनिंग की पूर्व संध्‍या पर जनसत्‍ता कहता है कि अविनाश वाचस्‍पति ने ...

http://www.srijangatha.com/Vyangya1-24Sep_2k10
खेल और खिलवाड़

आपका क्‍या विचार है
चल रहे हैं ओपनिंग में
वैसे पैसे खत्‍म हो चुके हैं
खेल शुरू पैसे हजम।
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हिन्दी यूएनओ की भाषा बने - अनिरूद्ध जगन्नाथ (राष्ट्रपति, मारीशस)

रायपुरमारीशस के राष्ट्रपति श्री अनिरूद्ध जगन्नाथ ने कहा कि छत्तीसगढ़, भारत की साहित्यिक संस्था सृजन सम्मान द्वारा विश्वभर में हिन्दी के प्रचार-प्रसार, साहित्यकारों का सम्मान एवं हिन्दी की जो सेवा की जा रही है वह प्रशंसनीय है। उन्होंने कहा कि हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषाओं में सम्मिलित करने का प्रयास करना अच्छी बात है। यह विचार उन्होंने भारत के छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर की राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक संस्था सृजन सम्मान द्वारा आयोजित साहित्यिक भ्रमण के अंतर्गत संस्था के राष्ट्रीय महासचिव एवं यात्रा संयोजक द्वय जयप्रकाश मानस एवं एच.एस.टाकुर के नेतृत्व में मारीशस पहुँचे यात्रा समूह के सदस्यों के साथ आयोजित एक बैठक में व्यक्त किए। उन्होंने संस्था द्वारा किए जा रहे कार्यों पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए मारीशस की अर्थव्यवस्था एवं उपलब्ध सुविधाओं के बारे में भी सदस्यों से बातचीत की। इस अवसर पर मारीशस की प्रथम महिला श्रीमती सरोजनी जगन्नाथ विशेष रूप से उपस्थित थी।

तृतीय अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन बाली (इंडोनेशिया) में
बैठक के आरंभ में जयप्रकाश मानस ने पुस्तकें भेंटकर राष्ट्रपति का स्वागत किया। अपने स्वागत उद्बोधन में मानस ने व्यस्तता के बावजूद भारतीय साहित्यकारों के दल को समय देने के लिए राष्ट्रपति के प्रति आभार व्यक्त करते हुए संस्था के उद्देश्यों पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि संस्था के माध्यम से मारीशस में द्वितीय हिन्दी सम्मेलन का आयोजन किया गया। गतवर्ष पहला अंतरराष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन थाईलैंड में किया गया था । हिन्दी दिवस के अवसर पर मारीशस के 7 वरिष्ठ साहित्यकारों का सम्मान भी किया गया। उन्होंने राष्ट्रपति को अवगत कराया कि भविष्य में हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषाओं में सम्मिलित किए जाने का प्रयास जारी है और इस सिलसिले में अगले साल इंडोनेशिया (बाली) में तृतीय अंतरराष्ट्रीय हिन्दी साहित्य सम्मेलन करने का निर्णय लिया गया है।
राष्ट्रपति भवन में साहित्यकारों का दल
इस अवसर पर छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति मंत्री बृजमोहन अग्रवाल का एक पत्र एवं बस्तर के कलाकारों द्वारा निर्मित धातु शिल्प भी राष्ट्रपति को सौंपा गया। इसके अलावा अनेक साहित्यकारों ने अपनी पुस्तकें तथा फ़िलाटेलिक सोसायटी ऑफ इंडिया की छत्तीसगढ़ इकाई की ओर से भारत के साहित्यकारों एवं अगले माह आयोजित होने वाले राष्ट्रमंडल खेलों पर केन्द्रित भारतीय डाक टिकटों के दो एलबम भेंट किए गए। तत्पश्चात राष्ट्रपति के साथ सदस्यों का एक फ़ोटो सत्र का आयोजन किया गया। जिसमें प्रथम महिला एवं बड़ी संख्या में मारीशस के शिक्षाविद एवं साहित्यकार भी सम्मिलित थे। राष्ट्रपति भवन की ओर से सदस्यों के लिए स्वल्पाहार का आयोजन भी किया गया था।

उल्लेखनीय है कि साहित्यिक संस्था सृजन सम्मान द्वारा संस्था के महासचिव जयप्रकाश मानस के नेतृत्व में विश्व हिन्दी दिवस के अवसर पर 10 से 18 सितम्बर तक मारीशस का साहित्यिक, सांस्कृतिक पर्यटन अध्ययन कार्यक्रम का आयोजन किया गया। जिसमें देशभर के 61 सदस्यों ने भाग लिया।
हिन्दी का संसार एवं संसार की हिन्दी विषय पर संगोष्ठी
भ्रमण के दौरान मारीशस सरकार द्वारा गठित सांस्कृतिक प्रतिष्ठान हिन्दी स्पीकिंग यूनियन द्वारा हिन्दी दिवस पर हिन्दी का संसार एवं संसार की हिन्दी विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। प्रथम सत्र के मुख्य अतिथि थे हिन्दी के वरिष्ठ उपन्यासकार अभिमन्यु अनत और अध्यक्षता की जयप्रकाश मानस ने । द्वितीय सत्र में कृतियों का विमोचन एवं मॉरीशस के साहित्यकारों का अंलकरण कार्यक्रम आयोजित था । इस सत्र के मुख्य अतिथि थे - मारीशस के संस्कृति एवं कला मंत्री श्री मुखेश्वर शोन्नी ।

मॉरीशस के 7 साहित्यकारों को सृजनश्री अंलकरण
इस अवसर पर सृजन-सम्मान द्वारा वहाँ के वरिष्ठ 7 साहित्यकारों को सृजन-श्री अंलकरण से अलंकृत किया गया । सम्मानित साहित्यकारों को शॉल, श्रीफल, प्रतीक चिन्ह एवं प्रशस्ति पत्र भेंट कर सम्मान किया गया। जिसमें उपन्यास के लिए मारीशस के श्री अभिमन्यु अनत, कहानी के लिए प्रकारेश धुरंधर, नाटक के लिए महेश राम जीयावन, कविता के लिए पूजा नंद नेमा, महिला विमर्श के लिए भानुमति नागदान, हिन्दी सेवा के लिए स्व.मुनेश्वर लाल चिन्तामणी के अलावा महात्मा गांधी संस्थान के वरिष्ठ व्याख्याता एवं कार्यक्रम के संयोजक विनय गोदारी को सृजन श्री सम्मान से विभूषित किया गया। संगोष्ठी में भारत से मारीशस पहुँचे अनेक साहित्यकारों की पुस्तकों, पत्रिकाओं एवं गीतों के कैसेटों का विमोचन भी किया गया। इसके अलावा सदस्यों ने महात्मा गांधी संस्थान का भ्रमण किया। संस्थान के विभागाध्यक्ष एवं अन्य प्राध्यापकों ने प्रतिष्ठान की गतिविधियों की जानकारी दी। साथ ही प्रतिष्ठान द्वारा संचालित हिन्दी प्रचार अभियान के अंतर्गत नुक्कड़ नाटक का अवलोकन किया।


इस सांस्कृतिक अध्ययन दल में यात्रा संयोजक जयप्रकाश मानस एवं एच.एस.ठाकुर सहित छत्तीसगढ़ शासन के संस्कृति विभाग के संचालक राजीव श्रीवास्तव, राम पटवा, डॉ.सुधीर शर्मा, डॉ.जे.आर.सोनी, डॉ.महेन्द्र ठाकुर, दीपक पाचपोर, सुरेश तिवारी, चेतन भारती, संजीव ठाकुर, डॉ.निरुपमा शर्मा, डॉ.सीमा श्रीवास्तव, लतिका भावे, शकुन्तला तरार, अरूणा चौहान,अरविन्द मिश्रा, कुमेश कुमार जैन, नागेन्द्र दुबे, टामन सिंह सोनवानी, श्रीमती पदमनी सिंह, अभिषेक सोनवानी, ललित गणवीर, श्रीमती गणवीर, जी.एस.बाम्बरा, श्रीमती आर.बाम्बरा, प्रतापचंद पारख, सत्यपाल,  श्रीकांत अग्रवाल, रमाकांत अग्रवाल, बिलासपुर के राजेश सोन्थलिया, रायगढ़ के सत्यदेव शर्मा, संजय तिवारी, उसत राम, भीखलाल पटेल,  सुरेश पंडा, सुरेश छत्री, श्रीमती क्षत्री, अर्जुन दास, देवानी,  एम.आर.ठाकुर, समुन्द सिंह, मिश्री लाल पाण्डे, राजेश तिवारी, सरायपाली के मीनकेतन दास, नागपुर महाराष्ट्र के भाषाविद डॉ.रामप्रकाश सक्सेना, हनुमन्त ठाकरे, नागेन्द्र अन्नाराव, रामदेव खुशहाल राव, बंडोपाद्ये यशवंत, नरेन्द्र दंडारे, उत्तराखण्ड नैनीताल के दिवाकर भट्ट, मध्यप्रदेश भोपाल के  डी.पी.सक्सेना, मधु सक्सेना, प्रकाशचंद तापड़े, अरूणा तापड़े एवं सृजन-सम्मान के यात्रा-पार्टनर क्रियेटिव ट्रेव्हलर्स के प्रमुख विकास मल्होत्रा आदि सम्मिलित थे।
(मारीशस से लौटकर हीरामन सिंह ठाकुर)
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सुनिए--“कविता क्या, कविता क्यों ?” विषय पर व्याख्यान-भाग 2

सृजनगाथा के वार्षिकोत्सव पर पधारे हुए अतिथि महानुभावों ने कविता पर अपने व्याख्यान भी दिए, जिसमें डॉ सुशील त्रिवेदी, रमेश नैयर जी, गोविंद लाल वोरा जी, श्री गंगा प्रसाद बरसैया जी का सार गर्भित व्याख्यान हुआ।उसकी रिकार्डिंग लगा रहा हूँ, आप अवश्य सुने जिससे आपको कविता जैसे विषय पर श्रवण लाभ की शत प्रतिशत गारंटी है।


डॉ्क्टर सुशील त्रिवेदी जी




रमेश नैयर जी-वरिष्ठ पत्रकार-साहित्यकार



श्री गोविंद लाल वोरा जी--वरिष्ठ पत्रकार एवं प्रधान संपादक अमृत संदेश



श्री विभाकर जी -- सम्पादक जनसत्ता रायपुर




कल सुनिए अध्यक्ष की आसंदी से - गंगा प्रसाद बरसैंया जी का व्याख्यान

ललित शर्मा
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सुनिए--“कविता क्या, कविता क्यों ?” विषय पर व्याख्यान

राज्य की पहली वेब पत्रिका तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित, साहित्य, संस्कृति, विचार और भाषा की मासिक पोर्टल सृजनगाथा डॉट कॉम के चार वर्ष पूर्ण होने पर चौंथे सृजनगाथा व्याख्यानमाला का आयोजन 6 जुलाई, 2010 दिन मंगलवार को स्थानीय प्रेस क्लब, रायपुर में दोपहर 3 बजे किया गया था। भाई जयप्रकाश रथ (मानस) जी के निमंत्रण पर हम भी शरीक हुए। बहुत अच्छा ही आयोजन था। कविता पर व्याख्यान का आयोजन था। इलाहाबाद से पधारे हुए श्री प्रकाश मिश्र जी ने अपना व्याख्यान पढ़ा एवं कविता पर चर्चा भी हूई। सम्मान समारोह के विषय में कल कुछ पोस्टों से आपको पूरी जानकारी मिल गयी होगी। मैने इस व्याख्यान को रिकार्ड किया है, लेकिन श्री प्रकाश जी माईक को दूर रख कर पढ रहे थे। इसलिए आवाज थोड़ी मंद है। इसे फ़ुल वाल्युम में ही सुने तो अच्छा लगेगा। कविता पर सार गर्भित व्याख्यान आप अवश्य ही सुने, इसमें कविता के सफ़र पर अच्छी चर्चा है।

ब्लाग जगत से छोटे भाई संजीत त्रिपाठी का सम्मान सृजनगाथा टीम ने किया। बहुत खुशी हुई इस कार्यक्रम में उपस्थित हो कर सम्मान समारोह के प्रत्यक्षदर्शी बने। संजीत त्रिपाठी वास्तव में इस सम्मान के हकदार हैं, इन्होने कई वर्ष ब्लागिंग को दिए हैं और शायद छत्तीसगढ के गिने-चुने प्रारंभिक चिट्ठाकारों में से एक हैं। जब व्यक्ति के कार्य का सम्मान होता है तो उसका उत्साह बढता है तथा उसे अहसास होता है कि समाज में दूर बैठा कोई उसके कार्यों का मुल्यांकन भी कर रहा है। इसलिए कार्य ऐसा हो जिसमें समाज का हित हो और भला हो। सृजनगाथा टीम ने ब्लाग जगत से सुपात्र का चयन किया, इसके लिए मैं पूरी टीम को साधुवाद देता हूँ तथा अपेक्षा रखता हूँ कि इस तरह के कार्यक्रम आयोजित होते रहे जिससे ब्लागजगत में भी उत्साह बना रहे। 

तबियत कुछ नरम है, मौसमी सर्दी बुखार ने घेर लिया है, इसलिए कम ही लिखा है,एक बार पुन: साधुवाद के श्री प्रकाश मिश्र जी व्याख्यान प्रस्तुत कर रहा हूँ। अगली पोस्ट में कार्यक्रम के अध्यक्ष गंगा प्रसाद बरसैंया जी का भाषण प्रस्तुत किया जाएगा।--ललित शर्मा

कविता क्या, कविता क्यों--श्री प्रकाश मिश्र- पहला भाग




कविता क्या, कविता क्यों--श्री प्रकाश मिश्र- अंतिम भाग

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सृजनगाथा में हिंदी ब्लोगिंग की व्यापक और विस्तृत चर्चा




आज जिस प्रकार हिंदी ब्लॉगर साधन और सूचना की न्यूनता के बावजूद समाज और देश के हित में एक व्यापक जन चेतना को विकसित करने में सफल हो रहे हैं वह कम संतोष की बात नहीं है । अपने सामाजिक सरोकारों को व्यक्त करने की प्रतिबद्धता के कारण आज हिंदी के कतिपय ब्लोग्स समानांतर मीडिया की दृष्टि से समाज में सार्थक भूमिका निभाने में सफल रहे हैं । हिन्दी को अंतर्राष्ट्रीय स्वरुप देने में हर उस ब्लॉगर की महत्वपूर्ण भूमिका है जो बेहतर प्रस्तुतिकरण, गंभीर चिंतन, समसामयिक विषयों पर सूक्ष्मदृष्टि, सृजनात्मकता, समाज की कुसंगतियों पर प्रहार और साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के माध्यम से अपनी बात रखने में सफल हो रहे हैं। ब्लॉग लेखन और वाचन के लिए सबसे सुखद पहलू तो यह है कि हिन्दी में बेहतर ब्लॉग लेखन की शुरुआत हो चुकी है जो हिंदी समाज के लिए शुभ संकेत का द्योतक है । वैसे वर्ष-2009 हिंदी ब्लॉगिंग के लिए व्यापक विस्तार और बृहद प्रभामंडल विकसित करने का महत्वपूर्ण वर्ष रहा है , जबकि वर्ष-2010 अपने समापन तक हिंदी ब्लॉगिंग को एक नया आयाम देने में सफल होगा ऐसी उम्मीद की जा रही है.........।



हिंदी चिट्ठाकारी पर मेरे इस विहंगम आलेख को सृजनगाथा ने अपने ताज़ा जून-२०१० अंक में मूल्यांकन स्तंभ के अंतर्गत प्रकाशित किया है, इस आलेख में वर्ष-२००९ के जून-जुलाई तक अस्तित्व में आ चुके   महत्वपूर्ण  हिंदी चिट्ठों की चर्चा हुई है।   इस महत्वपूर्ण और विश्लेषणपरक   आलेख को एक बार अवश्य पढ़ें , क्योंकि यह आलेख नहीं हिंदी ब्लोगिंग का जीवंत दस्तावेज है -

सृजनगाथा में प्रकाशित इस आलेख के लिए यहाँ किलिक करे
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मँहगाई है जहाँ, आन-बान-शान है वहाँ

सृजनगाथा अंगस्‍त अंक में प्रकाशित व्‍यंग्‍य

मँहगाई है जहाँ, आन-बान-शान है वहाँ

मेरे सुबह सैरिया मित्र पवन चंदन आज एक लंबे अरसे बाद मिले थे इसलिए मूड में थे। दो घंटे चली धुँआधार बारिशने समूची दिल्ली को धो दिया। पर उन्हें एक अज़ब ग्लो दिया। आज जब वे सैर पर क़दम बढ़ा रहे थे तो महँगाई की तरह तेज़ी दिखा रहे थे। वे बिजली-सी द्रुत गति से बोलते जा रहे थे। बिजली और पानी को ब्रेक तो लगता है पर मेरे मित्र अनब्रेकेवल हो गए और इससे महँगाई का जो मनमोहना, मनमोहक़ चित्र उन्होंने खींचा उससे आप भी आनंद विभोर हो लो। कहने लगे कि महँगाई की महिमा अपरंपार है। इससे भी बहुतों को प्यार है, दुलार है। महँगाई कहती है मत शर्मा रे, तू जम कर कमा रे। अंधाधुंध जुटा और संतान तेरी देगी सब कुछ लुटा। एक कवि की पंक्तियाँ हैं कि चढ़ जाओ चढ़ जाओ महँगाई की तरह, क्यों शरमाते हो लुगाई की तरह। कवि की इन चंद लाईनों में बहुत कुछ बल्कि सब कुछ कह दिया गया है।



वैसे महिला और महँगाई सिंह राशि हैं। सिंह की शक्ति से सभी परिचित हैं। इनकी महिमा बखानने के लिए इतना ही काफी है। कॉफी के रेट चाय से अधिक चढ़ चुके हैं। जितने ढोल महिलाओं के बजते हैं - घर, दफ़्तर और दुकान में, उससे ज़्यादा बजते हैं महँगाई के श्मशान में। मुर्दे जो लकड़ी ख़रीदते हैं, वे गीली भी हैं और महँगी भी। वैसे मुरदे लकड़ी नहीं ख़रीदते। मुर्दों के लिए लकड़ियाँ ख़रीदी जाती हैं उनके हितचिंतकों द्वारा। महँगा हो चाहे सस्ता बिल वही चुकाते है। यह वो महंगी चीज़ है जो मरने के बाद फ्री मिलती है, जितनी ज़्यादा हो उतनी आसानी से बॉडी जलती है। जलाने वाले भी सोचते हैं कि पचास या सौ किलो ज़्यादा ख़रीद लेंगे तो श्मशान से ज़ल्दी किनारा हो लेंगे। उतनी ज़ल्दी चिता की गर्मी से मुक्ति मिलेगी। वो अलग बात है बिल की चिंता सिर पर सवार मिलेगी।



महिला भक्ति और महँगाई की शक्ति छिपाए नहीं छिपती। इसकी धुन मन में ही है बजती। जो ज़ोर से शोर मचाते हैं, वे मुख्यमंत्री की नसीहत पाते हैं। मुख्यमंत्री भी महिला हैं। बस खैर यह रही है कि उनका नाम 'म' से नहीं शुरू हुआ है। उससे क्या फ़र्क पड़ता है, मुख्यमंत्री न सही, प्रधानमंत्री ही सही - वे मनमोहन भी हैं और महँगाई मोहन भी हैं। सुनने में आ रहा है कि यह वही छूट है कि महँगाई सबको रही दिनदहाड़े लूट है। यह एक ऐसी लूट है कि जिसकी रपट भी पुलिस में नहीं लिखाई जा सकती।



हमें तो लूट लिया गोरे-गोरे गालों ने, काले काले बालों ने, की जगह नए गानों की रचना में गीतकार व्यस्त हैं हमें तो लूट लिया महँगाई बालों ने, फिर भी रपट न लिखी पुलिस वाले सालों ने। वैसे इस लाईन में संशोधन ज़रूरी है क्योंकि सब जानते हैं कि पुलिस वाले साले नहीं, मामे होते हैं और मामू ही बनाते हैं। वे अगर साले होते तो महँगाई के ऐसे रिसाले नहीं होते। उनके घर में वैसे भी महँगाई का प्रवेश वर्जित है। जनता जानती है कि वे मूल भी नहीं चुकाते, इसलिए महँगाई उनसे बचती है, वे महँगाई से क्यों बचें ? एक पुलिस और दूसरे नेता - महँगाई इन्हें छूभर नहीं जाती और महिलाएँ बच नहीं पातीं। कितने ही किस्से चैनलों पर सरे दिन और पूरी रात ज़ोर शोर से दिखाए जा रहे हैं।दर्शक देखने को विवष हैं। यह ऐसी विवषता है कि बिना विष के बरबस पूरी हो रही है। यह नहीं देखे तो सास बहू के एकता वाले किस्से मज़बूरन देखने पड़ेंगे, अब चाहे मज़ा आए या न आए। उन किस्सों में महिलाएँ हैं पर महँगाई नहीं है।



वैसे महँगाई की तुक शहनाई से मिलती है पर शहनाई बजने के बाद महँगाई ही खलती है। इसी की वजह से दो प्यार करने वालों की उम्र ढलती है। मेरे एक कवि मित्र का तो यहाँ तक कहना है कि जहाँ-जहाँ महँगाई जाएगी वहाँ वहाँ गरीबी भरपूर छाएगी। पर मेरी श्रीमती जी की सोच इससे बिल्कुल उलट है, चिरकुट है - जहाँ जहाँ महँगाई जाएगी, वहाँ वहाँ से ग़रीबी भाग जाएगी। जो महँगा बेचेगा, मुनाफाखोरी करेगा, दाम सोलह गुने वसूलेगा, भला वहाँ गरीबी का क्या काम ? वहाँ तो लक्ष्मी बंद दरवाज़ों में भी बलात् घुसी चली आएगी। उसकी खन खन खनक कानों में मिश्री घोल देगी। छन छन छनक मुँह में स्वर रस की फुहार देगी।



महँगाई के चढ़ने से इस बार नया इतिहास बना है। इधर महँगाई बढ़ रही है उधर शेयर बाज़ार की नानी मर रही है। सेंसेक्स रोज बिना सेक्स के दिखाई दे रहा है। महँगाई की तुक बेवफाई से भी ज़ोरदार ढंग से मिलती है, पर बेवफाई सिर्फ़ गरीब के पल्ले ही पड़ती है।



अपने कवि के विचारों का मैं समर्थक हूँ क्योंकि महँगाई और ग़रीबी का चोली-दामन का साथ है। जहाँ-जहाँ पर होगी महँगाई वहाँ वहाँ पर गरीबी भी अवश्य पड़ेगी दिखाई। वो फ़िल्मी गाना है न, तू जहाँ-जहाँ रहेगा, मेरा साया साथ होगा। तो जहाँ पर होगी महँगाई, वहीं से ग़रीबी की आवाज़ आई। बहुत ज़ोर से आएगी। सिर्फ़ साया ही नहीं, सुरसा के मुँह की तरह सब्जियाँ, दाल, चावल, तेल, सभी अपनी बढ़ती क़ीमतों का ढिंढोरा पीट रही हैं। आपके कान भी इन्हें अवश्य महसूस कर रहे होंगे। महसूस तो ज़ेब भी कर रही होगी। ज़ेब के साथ पेट को न पता चले, ऐसा तो हो ही नहीं सकता। सबको पता है, पर सब मज़बूर हैं। अब मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी नहीं, मनमोहन सिंह है। है कोई शक ?



महँगाई के सुर में सुर मुख्यमंत्री मिला रही हैं। महँगाई की दमदार पैरवी कर रही हैं। वे अभी भी महँगाई के चतुर्मुखी विकास से संतुष्ट नहीं हैं। उनके अनुसार महँगाई का सोलहमुखी और यह भी कम लगे तो चौंसठमुखी विकास आज के भारत की आवश्यकता है। आप चाहे चीखो-चिल्लाओ चाहे जितना, परंतु महँगाई का विकास नहीं है रुकना। रुकेगा भी कैसे और रोकेगा भी कौन, इन्हें सिंह राशि का जबरदस्त समर्थन मिला हुआ है। दिल्ली की सिंहनी मुख्यमंत्री का वरद हस्त और भारत के सिंह प्रधानमंत्री का आषीर्वाद इनके साथ है। है किसकी ताकत भला जो इसको रोके। वो ख़ुद ही नहीं रुक जाएगा। इतनी क्लास ली जाएगी कि महँगाई के आगे झुक झुक जाएगा, महिला के आगे तो वैसे भी झुका ही हुआ है। अभी तक गरदन में जो बल पड़ा है, वो ऐंठ नहीं जा पा रही है। ऐंठन इतनी कि सबको नजर आ रही है। लेकिन उसके खिलाफ कोई आवाज नहीं उठाई जा रही है, और जो चंद आवाजें उठती भी हैं तो उन्हें तूती नहीं मिलती, अपनी आवाज नक्कारखाने में गुंजाने के लिए। और गूंज भी गई तो बेअसर ही रहेगी।



मुख्यमंत्री का शोर मचाना जायज़ है कि शोर मचाया जा रहा है जितना, महँगाई नहीं बढ़ रही है उतना। इसके निहितार्थ हैं कि शोर करो, चाहे चौगुना करो पर महँगाई को भी तो उसी रेशो में बढ़ने दो। महँगाई की उन्नति से जलन क्यों ? सब उन्नति में समभाव बनाये रखना मानव धर्म है, इसका पालन जी जान से किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री के लिए कहा जा रहा है कि न बिजली है न पानी है यह तो राजधानी है, अरे सिर्फ़ राजधानी नहीं महँगाई का किस्सा कहानी है।



महँगाई का जादू रजाई से बाहर निकल सेंसेक्स के सिर पर कुलाँचे मार रहा है। महँगाई से भले आम जनता त्रस्त है पर सटोरिये तो मस्त हैं। उनकी यही मस्ती नेताओं का भला करती है, भला लाभ का दर्पणीय चित्र है और नेताओं का मित्र है। किसी के मस्त होने के लिए किसी का त्रस्त होना भी आवश्यक है, यही प्रकृति का सनातन सत्य है। महँगाई के रंग चटकदार हैं, चमकदार हैं, उजले हैं - नेताओं के धवल वस्त्रों की तरह। महँगाई है वो जीना, जिसकी तरफ़ देखते ही छूटता है गरीबों का पसीना और बहुत कम लोगों को महँगाई नजर आती है एक हसीना। जो मादक है, जिसके पाने पर मोदक वितरण का मन अनायास ही हो आता है।



महँगाई उन्नति का वर्तमान चरित्र है। एक रूपया पाँच रूपया दस रूपया का जमाना नहीं है। जमाना तो सौ रूपया का भी नहीं है। आज जमाना है पाँच सौ के नोट का, एक हज़ार के नोट का। महँगाई इसी तरह बिना शर्माए सोलह दूनी चौंसठ की रफ्तार से बढ़ती चढ़ती रही तो पाँच सौ और एक हज़ार के नोट को चलन से बाहर होने में देर नहीं लगेगी और सरकार को ज़ल्दी ही पाँच हज़ार और दस हज़ार रूपये के नोट जारी करने होंगे। फिर महँगाई की आन बान और शान पर कोई सिरफिरा उँगली नहीं उठा सकेगा, महँगाई भारत की शान होगी और इसी से निकट भविष्य में भारत की पहचान होगी। जिसमें फिलहाल कोई शक नहीं है।
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मंहगाई का चढ़ना और शेयर बाजार का उतरना

सृजनगाथा पर प्रकाशित हिन्‍दी व्‍यंग्‍य मँहगाई है जहाँ, आन-बान-शान है वहाँ
पढि़ए और वे तथ्‍य जानिए जो महंगाई को बढ़ाने और शेयर बाजार को गिराने के लिए जिम्‍मेदार हैं।
यदि आपको ऐसा महसूस होता है कि आपको यह व्‍यंग्‍य पसंद आया है तो ब्‍लागवाणी में पसंद पर अवश्‍य क्लिक करिए और आप इस संबंध में कुछ और कहना भी चाहते हैं तो अपनी टिप्‍पणी भेजिए।
स्‍वागत है।
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