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सिल्क जो डर्टी नहीं है !

वास्तव में फिल्म में लगातार मर्दवादी और भूखे चेहरों पर 'सिल्क' दनादन तमाचे जड़ रही थी और उसका कृत्य कहीं से भी मुँह-छिपाऊ नहीं लगा.हम पुरुषों की मानसिकता और सोच अपने तईं और स्त्री के तईं बिलकुल अलग होती है.हम अपने व्यक्तिगत जीवन में उसे बतौर आदर्श कल्पित करते हैं और मौज,मज़े के लिए दूसरे हैं न.क्या मनोरंजन करने वाले ऐसे लोग दूसरी दुनिया से आयेंगे ? हमने उसके तमाचे को कई बार महसूस किया और फिल्म के अंत में वह सारा जोश,कुत्सित भावना हवा हो चुकी थी,हम जी भरकर रो भी नहीं  पा  रहे थे क्योंकि 'सिल्क' जैसी स्त्रियों के लिए झूठी,दोहरी मर्दवादी सोच ज़िम्मेदार जो है. हमें अपने से ही 'घिन' सी आने लगी.क्या ऐसा ही हमारा मर्द-समाज है जो सोचता कुछ है,लिखता कुछ है,दीखता कुछ है,करता कुछ है ?

मेरे लिए 'डर्टी पिक्चर' गन्दी और मनोरंजक नहीं रही,इस फिल्म ने हमारा,आपका बहुत कुछ उघाड़ दिया है !



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स्त्री महज़ बलात्कार की खबर है क्या ?

अभी एक खबर आई है  कि  सन्यासी से राजनेता और फिर सन्यासी बने स्वामी चिन्मयानन्द महाराज पर एक स्त्री के साथ बलात्कार का आरोपी बनाया  गया है.ऐसा आरोप चस्पा करने वाली उनकी ही पूर्व शिष्या और स्वनामधन्या चिदार्पिता जी हैं जो हाल-फिलहाल तक स्वामीजी के साथ तन,मन,धन अर्पित किये रहीं .

यहाँ यह बात गौर करने वाली है कि स्वामीजी उनके लिए अब बलात्कारी और आततायी हो गए जब स्वामीजी सत्ता-सुख से रहित हैं और न आगे इसकी कोई सम्भावना दिखती है.उन महोदया   की तहरीर ,बतौर एक स्त्री  , दर्ज करने में राज्य सरकार को गज़ब की सहूलियत दिखाई दी और उसने फुर्ती से वह काम कर लिया ,जिसके लिए आम आदमी महीनों धक्के खाता है.

हम यहाँ पर आरोपों की सत्यता पर नहीं बल्कि उसके होने और प्रयोजन के निहितार्थ पर बात कर रहे हैं.हो सकता है स्वामीजी बहुत रंगीले हो गए हों क्योंकि कुछ दिन वे  नेताओं की संगत में तो रहे ही हैं,पर यह सब जो हो रहा है उससे स्त्रीजाति या नारी का कोई लेना-देना नहीं है.यह विशुद्ध व्यावसायिक,राजनैतिक और घटिया-स्तर का प्रपंच है.खेद इस बात का है कि ऐसे सनसनीखेज मसालों की दरकार आज के मीडिया  को और राजनीति ,दोनों को है.

राजनीति से हमें कोई शिकायत नहीं है क्योंकि उनकी रोजी-रोटी अब ऐसे ही चल और बच रही है.एक स्त्री को अपने स्त्रीत्व को दाँव में लगाना तब नहीं अखरा जब सब-कुछ जानते,भोगते उसने इत्ते साल सत्ता और समृद्धि की मलाई काटी.एक सुबह उठकर अचानक उसे इल्हाम होता है कि  उसके साथ जोर-ज़बरदस्ती की गई है.अचानक वह भोग्या से पीड़िता बन जाती है और हमारे समाज के कुछ बेरोजगार ,तख्तियों पर स्याह और रंगीन हर्फों में लिखे हुए पाखंड को सरे-आम कर देते  हैं. कोई स्त्री जब तक सुख भोगती रहे ,किसी  को साधन बनाये रहे ,खुद साधन बनी रही,तब तक उसका स्त्रीत्व क्या ज़मींदोज़ था? उसे सहने के अलावा कहने का समय ही न मिला,कितना हास्यास्पद और बेहूदा लगता है ?

इसी तरह कई साल पहले का एक वाकया याद आता है जब भारतीय मौसम विभाग के तत्कालीन निदेशक पर उनके  साथ रहने वाली स्त्री ने आरोप लगाया था कि वे उसे पिछले दस सालों से भोग रहे थे.क्या उसे भी उन दस सालों में कभी भी बाहर निकलने  या कुछ कहने का मौका नहीं मिला था.स्त्री का तो कुछ हो न हो,आरोपी का तो सब-कुछ (परिवार,रोज़गार) चौपट हो जाता है.

दर-असल ,इस तरह की बातें किसी वर्ग या जाति का प्रतिनिधित्व नहीं करती वरन एक विशेष प्रवृत्ति है जो खतरनाक ढंग से बढ़ रही है और जिसमें सबसे ज्यादा नुकसान स्त्री-जाति का हो रहा है.क्या ऐसे में कोई नारीवादी संगठन आगे आकर सच्चाई को जानने और हर 'ऐरे-गैरे' को स्त्रीत्व का तमगा लेकर उसको तार-तार करने से बचाएगा ? किसी अपराधी को केवल इस नज़रिए से न देखा जाए कि  वह स्त्री है या पुरुष !

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इस समाज में सब नंगे हैं

क्‍या आप सबको पहचानते हैं ?
पहले सिर्फ हमाम में हुआ करते थे
अब हमाम नहीं हैं इसलिए
समाज में चले आए हैं।
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27 वॅ साल मॅ ही दस्तक देने लगता है बिढापा ???

आज देश के एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र मॅ पढा कि वाशिंगटन मॅ छपने वाले अखबार डॆली मेल मॅ यह लेख छपा कि एक जाने-माने रिसर्चर टिमथी साल्टहाउस ने एक 7 वर्षॉ तक 2000 लोगॉ पर शोध किया और यह जानने का प्रयास किया कि आयु के प्रभावी की सबसे कम आयु क्या हो सकती है. उन्हॉने 18 से 60 वर्ष की आयु के लोगॉ से बात की, उनके आंकडे जुटाये. अंतत: परिणाम यह सामने आया कि 27 वर्ष की आयु मे ही हम मॅ से अधिकांश लोगॉ की यादाश्त कमज़ोर होने लगती है. हम चीज़ॅ रखकर असामान्य रूप से भूलना शुरू कर देते हैं जैसे कोई दैनिक उपयोग की वस्तु (चाबी, किताब,घडी या फिर जूते) अपने हाथॉ से रखकर भूलजाना कि हमने कहाँ रखी है.यह शोध स्वस्थ और पढे-लिखे लोगॉ पर हुआ और नतीजे पर पहुँचने मॅ 7 साल लगे.

क्या वाकई ऐसा होता है??


इसके एक्दम उलट भारतीय विचार तो यह कहता है कि 25 वर्षॉ के समय यौवन अपने पूर्ण आवेग मॅ होता है और 40 वर्ष की आयु तक वह शारीरिक रूप से बिलकुल सक्षम होता है. लेकिन यह विचार 25 वर्षॉ तक ब्रह्मचर्य के पालन पर भी बल देता है. ऐसे मॅ यह परिणाम चौंकाने वाला है.

क्या ऐसा तो नहीं कि निरंकुश यौनाचार और भोगवादी मानसिकता का ही परिणाम आज मानव को असमय बुढापे के रूप मॅ हम सब के सामने हो ???
क्या यह सत्य है कि पश्चिम योग की ओर इसी लिये बढ रहा है कि वो जान चुका है कि भोग जीवन के सागर की वो मोटर बोट है जो शरीर को मृत्यु के घाट तक बडी तेजी से ले जाती है???

तो आज कौन सी जीवन पद्धति है जो हमॅ इस अनमोल जीवन को सुफल और सफल रूप मॅ जीने का अवसर दे सकेगी ???



आप की क्या राय है इस विषय मॅ. कृपया टिप्पणी करॅ और मुझे भी जानने का अवसर दॅ.
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महिला दिवस पर ही हाय-हाय क्यों??????? ऐसे कुछ भी न बदलेगा

आजअतंरराष्ट्रीय महिला दिवस है । सबसे पहले सभी को शुभकामनाएं । मैं कुछ ज्यादा नहीं कहने और लिखने वाला नहीं हूँ । बस यही बात जेहन में है कि महिलाओं की दशा समाज में जो भी है क्या आज के ही दिन ज्यादा उबाल मारती है ? या फिर आज के मौके को भुनाना सभी को अच्छा लगता है ? कई पोस्ट आयी हैं अनके विषयों पर । मैंने पढी और अच्छा भी लगा । पर दुखद यह है कि यह सब हकीकत में हो रहा है । समाज में स्त्री की जो दशा है वह सभी जानते हैं । उच्च से निम्म स्तर तक की महिलाएं है उनकी अलग- अलग समस्याएं है । कितनी भारत की ऐसी महिलाएं हैं जो कि ये जानती हैं कि आज कौन सा दिवस है और इसका सही मायनों में क्या अर्थ है ?

आज इस दिवस के उपलक्ष्य में खूब सारे रंगारंग कार्यक्रम जरूर होगें इसके सिवा कुछ भी नहीं । हो सकता है कल ही भूल जायें फिर वही आम जिंदगी । बदलाव कुछ भी नहीं । ऐसे काम नहीं बनने वाला है । महिला दिवस हो या न हो पर जरूरी है कि महिलाओं की दशा और दिशा में कैसे सुधार हो वर्ना मेरे अनुसार इससे महिला उत्थान होने वाल नहीं सिवाय हो हल्ला के अलावा। इसलिए हाय हाय करने का आज कोई खास फायदा न होगा ।
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