घर तक है नीलाम पड़ा,दारू की ठेकेदारी में,
देखो फिर भी दम भरते हैं, बस झूठी शोहरत के खातिर.
इंसानों से कब का रिश्ता, तोड़ चुके हैं ये साहिब,
इंसानियत कहरते है,बस झूठी शोहरत के खातिर.
लिए गुरूर-अहम सत्ता का,हैवानो से हाथ मिलाते,
हैवानियत से डरते हैं, बस झूठी शोहरत के खातिर.
हरकत गिरी हुई है,जिनकी आदत से लाचार हैं जो,
बड़ी बड़ी बातें करते हैं, बस झूठी शोहरत के खातिर.
रोज ग़रीबों की आहों पर, नाम लिखा होता है जिनका,
मानवता पर वो मरते हैं,बस झूठी शोहरत के खातिर.
गंगाजल को तरस गये, बाबू जी अंतिम वक्त में अपने,
मरघट पर आँसू गिरते हैं,बस झूठी शोहरत के खातिर.


