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.मेरे जीवन की एक रोमांचकारी घटना - अविनाश वाचस्‍पति मुन्‍नाभाई


रात के तीन बजे हैं। एकाएक महसूस होता है कि मेरा एक मित्र गिरधारीलाल शर्मा मेरे सिरहाने की ओर से अपने एक सा‍थी के साथ निकला है। वह बाहर दरवाजे की ओर नहीं गया है। मैं उठकर ड्राईंग रूम की तरफ उठकर जाता हूं पर वह दिखाई नहीं देता। सब दरवाजे बंद हैं। सीसीटीवी के कैमरे में उसके जाने को महसूस करना चाहता हूं पर असफल रहता हूं। धीरे धीरे सब याद आने लगा है जब वह दिखाई दिया उस समय मैं नींद में था। उसके जाने को ढूंढते समय मैं नींद से बाहर आ चुका था पर दोनों के बीच के अंतर को जाने क्यूं महसूस नहीं कर पा रहा था। बाहर भीतर सब एक हो गया। मानो दूध में पानी मिला दिया गया हो। बाद में बाहर बालकनी तक उसे और उसके साथी को ढूंढने गया। असल में उससे मिलने की चाह इसलिए मन में रही क्यों कि वह विदेशी मामलों के मंत्रालय कार्यालय में काम करता था और संभवत- तीन साल के लिए बाहर जाता था पर ऐसा पहली बार हुआ था कि वह गया और उसने मुझे सूचना तक नहीं दी। मैं अपनी बीमारी में व्यस्त रहा। हां, यह जरूर मालूम चला था कि वह अमेरिका या अफ्रीका देश में कहीं गया था। पर उसके बाद जो नींद टूटी तो आई नहीं और मैं जागता रहा। अगली रात फिर वह आया समय लगभग वही पर तब तक मुझे नींद नहीं आई। इस बार वे दोनों बाथरूम के भीतर उस ओर से आते दिखलाई दिए, जहां पर दीवार है। मैंने उठकर उसे तलाशने की कोशिश की पर असफल रहा। बाहर आकर देखा कि मुख्य दरवाजा बंद था। घर के अन्य सब सदस्य सो रहे थे पर मेरी आंखों में नींद कहां। मैंने अपने बड़े बेटे को जगाया और उससे इसका जिक्र किया। असल में मेरे मन में ऐसा महसूस हुआ कि उसके साथ अवश्य ही कोई घटना हुई है और वह मुझे बतलाना चाहता है पर उसका कोई संपर्क सूत्र उस समय मेरे पास नहीं था। इसके बाद न जाने क्यों मुझे बहुत क्रोध आया और मैंने अपनी धर्मपत्नी तक को अपशब्द कहे और जिस जिसने मुझे शांत करने की कोशिश की मेरे गुस्से का शिकार बना। यह गुस्सा भी अधिकतम तीन मिनिट का रहा जैसा कि आमतौर पर रहता है उसके बाद मुझे अपने उपर पछतावा भी हुआ। मेरी इकलौती बेटी और उसकी सहेली अपने कमरे में थे पर उनके बाहर आते ही मेरा गुस्सा उसकी सहेली पर चला गया और मैंने अपने घर की मूल्यीवान वस्तुओं को तोडना शुरू कर दिया । मेरे बेटे ने बामुश्किल मुझे शांत कराया यह गुस्सा तीन से लेकर सात मिनिट तक अवश्य रहा होगा। इसे भूकम्प मतलब शारीरिक जलजला कहा जा सकता है। असल में मुझे जब नींद आई होगी मुझे मालूम नहीं चला और वह दिखाई दिया। बाद का वाक्या होने तक मैं नींद से बाहर आ चुका था। न जाने मुझे ऐसा क्यों अहसास होने लगा कि उसके साथ जरूर ही कोई दुर्घटना हुई है और वह मुझे अपने साथ लेने आया था। जबकि बाद में जांच पड़ताल करने पर ऐसा कुछ नहीं मिला। बाद में मैंने उसके घर फोन किया तो मालूम हुआ कि उसका बड़ा बेटा इंडिया में है और छोटा उसके साथ गया था। पिता तथा पुत्र दोनों सोशल मीडिया के जरिए संपर्क में नहीं थे। जबकि आज कोई ऐसा मिले तो हैरानी होती है क्यों कि यह युग तकनीक का काफी उन्नत युग है और प्रगति हो रही है पर मेरे मित्र के पास मोबाइल फोन तक नहीं है। मालूम नहीं कि यह उसका पैसे को बचाने के कारण है अथवा अन्यं कोई वजह। कई बरस पहले जब उसकी पत्नी का निधन हुआ था तब वह डीटीसी में कार्यरत था और उसकी पत्नीी विदेशी मामलों के मंत्रालय में। उसके कार्यालय में उसकी नियुक्ति अनुकंपा के आधार पर की गई थी।

 जारी ......
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चला गया हूं मैं, नजर फिर भी आऊंगा मैं, सोशल मीडिया अब मेरा ठिकाना है : अलबेला खत्री

ठिकाने बदल जाते हैं
ठिठक जाते हैं दौड़ने वाले
जीतने वाले, जिताने वाले
फिर भी सब मतवाले हैं
खुद को जिंदा मारे हैं
 
मालूम है उन्‍हें
जानते हैं वह
लटके हुए हैं सबके पैर
उस कब्र पर
जो चाहे अनखुदी है
दिखाई नहीं देती है
पर मौजूद है।
 
यह मौजूदगी
इंसान की है
इंसानियत की
भी हो सकती है
नहीं भी
यह सबके अपने
अपने निजी अनुभव हैं।
 
सांसों का मीटर
नहीं  आता नजर
पर चलता रहता है
रुकने पर भी
नहीं होता आभास
पर मीटर तो मीटर है
वही बनता किलोमीटर
उसका जीवन कोश है
कोष कब रिक्‍त हो जाए
न तुम जानते हो
न मुन्‍ना(अविनाश वाचस्‍पति)  
न अन्‍य कोई।
 
यही कोश निरंकुश लगता है
पर इस पर भी किसी का अंकुश
कसा तो जाता है
जब गहरे से कसता है
न तब और न जब धीरे से
कसने पर पीड़ा होती है।
 
जीवन को ढूंढा है पीड़ा मे
तुझमें ढूंढूंगा पीड़ा
पीड़ा जो सच है
पीड़ा ही दर्द है
सच मानो मित्रो मेरे
पीड़ा ही सच्‍चा जीवन है।
 
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दर्द जीवन है या जीवन का गीत है

क्‍यों जी रहा हूं मैं
किसके लिए जी रहा हूं मैं
अपने लिए तो नहीं
अपने दर्द के लिए
फिर क्‍यों जिऊं
खुदगर्जी जिला रही है
दर्द ही पिला रही है।

बहुत खुदगर्ज हूं मैं
अपना दर्द किसी को देता नहीं हूं
सच्‍चाई यह नहीं है
सच तो यह है कि
दर्द कोई लेता ही नहीं है
ले भी क्‍यों
सबके पास अपने अपने दर्द हैं
सबको पसंद अपने अपने दर्द हैं
दर्द हैं सबके पास
सब ही तो मर्द हैं ।

खुशियां किसी की लेता नहीं हूं
फिर भी जीता यहीं हूं
सब कुछ हार कर।

चलूं मौत के पहाड़ पर
वहां जहां चिल्‍ला रहा है जीवन
फिर भी पसरा है सूनापन
नहीं अपनापन
सब बेगानापन
बेसंगीत है
यह जीवन भी भला
कोई गीत है ?
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झॉपड़्पट्टी का कुत्ता करोड़्पति.

क्या बक्वास है. जिसे देखो वो आस्कर जीतने के नशे मॅ इस कदर चूर है कि बेहोशी के आलम से बाहर आना ही नही चाहता. देश का बुद्धिजीवी बहुत खुश है. देश का ऐसा युवा बेहद प्रफुल्लित है जो विवेकहीन है. पूरा देश थोथे मजे मॅ मग्न है. अरे कितनी शर्म की बात है कि कोई धारावी मॅ रहने वाले को कुत्ता बताकर उनके जीवन स्तर पर कोई चलचित्र बनाता है. सारी दुनिया के सामने दिखाता है और यह कहता है कि " ये देखो... भारत मॅ क्या हालात है...और वहाँ के लोग कुत्ते जैसा (पश्चिमी मानदण्ड के अनुसार) जीवन जीते हुये भी करोड़पति कैसे बन जाता है." छी: कितने मूर्ख है हम सब कि उनके इस महिमामण्ड़ित उत्सव मॅ हुये अपने इस अपमान पर कितने प्रसन्नचित है???? अरे मेरे देश के लोगो समझो... यह पुरस्कार उस निर्देशक को मिला है जो यह बता सका कि भारत मॅ झॉपड़ी मॅ रहने वाला कुत्ता कैसे बनकर रहता है...उस कलाकार को कोई पुरस्कार नही जिसने उस कुत्ते का किरदार निभाया...क्या यह विचार करने के लिये बाध्य नही करता....?

क्या रहमान ने कभी इससे बहतर कोई संगीत नही गढा??? क्या गुलज़ार साहब ने इससे बहतर कोई गीत नही लिखा??? क्या कोई दे सकता है इन सवालॉ के जवाब??? दे तो सब सकते है...पर देना नही चाहते.

क्या "तारे ज़मीं पर" फिल्म किसी लिहाज़ से घटिया थी??? हाँ एक तल पर वो उचित नही थी...कि उस का निर्देशन किसी अमेरोकन या फिर किसी अंग्रेज़ ने नही किया था. जबकि तारे ज़मीं पर ने जिस मानवीय भाव को छूआ वो अपने आपमॅ एक अनूठा विषय है... लेकिन आस्कर के लिये वह योग्यता के किसी पयदान पर नही टिकी क्यॉकि वो शुद्ध रूप से भारतीय निर्माण है... और पश्चिम ये कैसे सहन कर ले कि कोई भारतीय कैसे कला का इतना बड़ा सम्मान हासिल करे.

हमे यह बात समझनी चाहिये कि कला, ज्ञान, विज्ञान, कौशल का गुण आदि विधाऑ मॅ हम से अधिक समृद्ध सकल विश्व मॅ कोई नही है. और हमॅ अपने देश के सम्मान की रक्षा करनी चाहिये और अपना विरोध दर्ज करना चाहियेअ.
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