स्वयं चार क़दम स्वतः चल नहीं पाने वाले व्यक्ति के सन्दर्भ में शायद अगर कोई कहे कि ये व्यक्ति पर्वतों से प्रेम करने वाला तथा कई बार विश्व की सबसे ऊंची छोटी माउंट एवेरेस्ट को फ़तेह अपने साहस के दम पे करने का प्रयास कर चुका है, सहसा यकीन नहीं होता कि अरे ! ये मगन बिस्सा हैं.मगन बिस्सा जी का नाम माउन्ट ट्रेनिग का राजस्थान में ही नहीं, पूरे भारत वर्ष में किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है. जिन्होंने सर्वप्रथम एवेरेस्ट फ़तेह का प्रयास 'सुश्री बछेन्द्रीपाल' के साथ ही किया था. जब वे पहली भारतीय एवेरेस्ट फ़तेह महिला बनी थी, खैर ये भाग्य की बात है कि जब भी उन्होंने एवेरेस्ट की शिखा को चूमने से कुछ मीटर दूर रहते तभी उनका भाग्य उनसे रूठ जाता. मसलन एक बार अपने साथी की oxygen ख़त्म हो जाने पर स्वयं का सिलेंडर उसे दे दिया और वे इस अभाव में नहीं जा पाए तो एक बार चोटी पर से पाँव फिसलने से पाँव में फ्रेक्चर हो जाने के कारण स्वर्णिम गाथा नहीं लिख पाए, और ऐसा कई बार हुवा कि कोई ना कोई दुर्घटना घटती रही.
देश-विदेश के ऊंचे-ऊंचे पर्वतों, चिकनी चट्टानों पे अठखेलियाँ करने वाले हँसते-हँसते उनके सीने पे चढ़ भारतीय पताका फहराने वाले बीसा जी अपने पेट की आँतों की समस्यों से दो-दो हाथ कर रहे हैं.
मगन जी पिछले कई महीनो से दिल्ली में अपना इलाज़ करा कर हाल ही में बीकानेर लौटे हैं. जो-जो अंत ख़राब लगी, ऑपरेशन से उसे काट दिया है. फौलादी शख्स हजारों मीटर की कहत्तानो, पहाड़ों से सिमट कर चंद फुट के ऊंचे पलंग को मात्र आश्रय बना लिया फौलादी इरादों वाला सिमट गया कमरे तक.
मेरा परम सौभाग्य है कि उनके सानिध्य में मैंने माउन्ट आबू में Rock climbing का बेसिक कोर्स किया. सह्रदय मगन जी जानने का अवसर मिला. कठोर पत्थरों को चीरनेवाले का ह्रदय बेहद कोमल देखा.
अदम्य साहस वाले कार्य बिस्सा जी का पूरा परिवार समर्पित है. धर्मपत्नी डॉ. सुषमा बिस्सा भी कठोर चट्टानों को अपने ममतामई हाथों से मोम सा बना देती हैं.
प्रार्थना है कि मगन जी शीघ्र स्वस्थ हों, फिर शिखाओं को चूमे. अंत में यही कहूँगा
"लांघने हैं ऊंचे पर्वत
नापनी हैं दूरिया
गर ठहर गए तुम
क्या कहेगी वादियाँ"
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नापनी हैं दूरिया
गर ठहर गए तुम
क्या कहेगी वादियाँ"
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