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पर्वतों में रहने वाले 'मगन फिर चूमो शिखाएं'


स्वयं चार क़दम स्वतः चल नहीं पाने वाले व्यक्ति के सन्दर्भ में शायद अगर कोई  कहे कि ये व्यक्ति पर्वतों से प्रेम करने वाला तथा कई बार विश्व की सबसे ऊंची छोटी माउंट एवेरेस्ट को फ़तेह अपने साहस के दम पे करने का प्रयास कर चुका है, सहसा यकीन नहीं होता कि अरे ! ये मगन बिस्सा हैं.
      
मगन बिस्सा जी का नाम माउन्ट ट्रेनिग का राजस्थान में ही नहीं, पूरे भारत वर्ष में किसी परिचय का मोहताज़ नहीं है. जिन्होंने सर्वप्रथम एवेरेस्ट फ़तेह का प्रयास 'सुश्री बछेन्द्रीपाल' के साथ ही किया था. जब वे पहली भारतीय एवेरेस्ट फ़तेह महिला बनी थी, खैर ये भाग्य की बात है कि जब भी उन्होंने एवेरेस्ट की शिखा को चूमने से कुछ मीटर दूर रहते तभी उनका भाग्य उनसे रूठ जाता. मसलन एक बार अपने साथी की oxygen ख़त्म हो जाने पर स्वयं का सिलेंडर उसे दे दिया और वे इस अभाव में नहीं जा पाए तो एक बार चोटी पर से पाँव फिसलने से पाँव में फ्रेक्चर हो जाने के कारण स्वर्णिम गाथा नहीं लिख पाए, और ऐसा कई बार हुवा कि कोई ना कोई दुर्घटना घटती रही.
      
देश-विदेश  के ऊंचे-ऊंचे पर्वतों, चिकनी चट्टानों पे अठखेलियाँ करने वाले हँसते-हँसते उनके सीने पे चढ़ भारतीय पताका फहराने वाले बीसा जी अपने पेट की आँतों की समस्यों से दो-दो हाथ कर रहे हैं.
      
मगन जी पिछले कई महीनो से दिल्ली में अपना इलाज़ करा कर हाल ही में बीकानेर लौटे हैं. जो-जो अंत ख़राब लगी, ऑपरेशन से उसे काट दिया है. फौलादी शख्स हजारों मीटर की कहत्तानो, पहाड़ों से सिमट कर चंद फुट के ऊंचे पलंग को मात्र आश्रय बना लिया फौलादी इरादों वाला सिमट गया कमरे तक.
      
मेरा परम सौभाग्य है कि उनके सानिध्य में मैंने माउन्ट आबू में Rock climbing का  बेसिक कोर्स किया. सह्रदय  मगन जी जानने का अवसर मिला. कठोर पत्थरों को चीरनेवाले का ह्रदय बेहद कोमल देखा.
      
अदम्य साहस वाले कार्य बिस्सा जी का पूरा परिवार समर्पित है. धर्मपत्नी डॉसुषमा बिस्सा भी कठोर चट्टानों को अपने ममतामई हाथों से मोम सा बना देती हैं.
      
प्रार्थना है कि मगन जी शीघ्र स्वस्थ हों, फिर शिखाओं को चूमे. अंत में यही कहूँगा
"लांघने हैं ऊंचे पर्वत
नापनी हैं दूरिया
गर ठहर गए तुम
क्या कहेगी वादियाँ"
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इंसानियत अभी जिंदा है


आज मैं हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग के गुणीजनो के समक्ष एक जानकारी बांटना चाहता हूं । कई दिनो पहले श्री मदनगोपाल जी लड़ढा ने मुझे आखर कलश में प्रकाशित करने के लिए एक ऐसे अनूठे समाज सेवक के बारे में महत्‍वपूर्ण खबर प्रकाशित करने के लिये भेजी थी, मगर मैं किन्‍हीं तकनीकी समस्‍या के कारण उसको प्रकाशित नहीं कर सका, जिसका मलाल मुझे आज तक है और आगे भी रहेगा । मैं नमन करता हूं श्री मदनगोपाल जी का साथ ही साधुवाद राजस्‍थान पत्रिका का जिन्‍होंने इस खबर को जन-जन तक पहुंचाकर बीकानेर के सूंई गांव के शीशपाल को नए सिरे से जिन्‍दगी शुरू करने का अवसर प्रदान करने में अपना अमूल्‍य योगदान दिया जिसकी बदौलत शीशपाल को राजस्‍थान के माननीय मुख्‍यमंत्री श्री अशोक गहलोत ने मुख्‍यमंत्री सहायता कोष्‍ से दस हजार की मदद की घोषण के साथ बीकानेर के पी.बी.एम. हस्‍पताल में उनके बेहतरीन इलाज की भी हिदायत दी |
       श्री मदन गोपाल लढ़ा जी ने जो खबर मुझ तक पहूंचाई थी वो आज मैं नुक्‍कड के इस पुनीत मंच से आप सब तक पहुंचा रहा हूं, जो इंसानियत की एक जिन्‍दा मिसाल है । और ज्‍यादा कुछ नहीं, बस चाहता हूं कि आप सब अपने शीशुपाल के लिये परम पिता परमेश्‍वर से दुवा करें कि एक बार फिर उनके  कदमों के निशां हमको इंसानियत के उत्‍तंग शिखर तक ले जाने का रास्‍ता दिखाए -:
चट्टानों की होड़ करते हौंसले
(मदन गोपाल लढ़ा)


किसी ने सच ही कहा है कि हौंसले फ़तह की बुनियाद हुआ करते हैं. बीकानेर जिले के सूंई ग्राम का शिशुपाल सिंह इसकी मिसाल है. बुलंद हौंसलों के धनी शिशुपाल सिंह ने अपने जीवन से आदमी के  जीवट को नई परिभाषा दी है. वर्षों पूर्व एक हादसे में रीढ़ की हड्डी टूट जाने के बावजूद उसने अपने मजबूत इरादों को नहीं टूटने दिया. वाकई उसकी जिन्दादिली को सजदा करने को जी करता है.
उत्तर-पश्चिमी राजस्थान के रेतीले धोरों के बीच महाजन से २५ किमी दूर बसे सूंई ग्राम का बासिन्दा शिशुपाल सिंह भरी जवानी में एक खतरनाक हादसे का शिकार हो गया. बीस वर्षों पुरानी बात रही होगीं. गांव मे बिजली चली गई. दो दिनों तक नहीं आई. बिजली महकमे के इकलौते  कर्मचारी के भरोसे दस गांवों की बिजली व्यवस्था का जिम्मा था. एसी स्थिति में गांव के लोग ही फ़्यूज वगैरह डाल कर काम चलाते थे. जब दो दिनों तक विभाग का कोई आदमी बिजली की सुध लेने नहीं आया तो ग्रामीणों के कहने पर शिशुपाल सिंह फ़्यूज लगाने के लिए ट्रांसमीटर पर चढ़ा लेकिन करंट के जोरदार झटके से वह जमीन पर गिर पड़ा व उसकी रीढ़ की हड्डी टूट गई. अब शिशुपाल सिंह की उम्र ६५ वर्ष की है. बीते बीस वर्षों से वह लकडी की खाट पर सीधा लेटा है. खुद करवट बदलना भी संभव नहीं है. यद्यपि इस दुर्घटना ने उसके शरीर  को अपंग बना दिया लेकिन उसके विचार अटल-अडिग है.
खाट पर लेटे-लेटे ही शिशुपाल सिंह ने जीने का एसा मकसद तलाश लिया है जो भले चंगे लोग भी नहीं तलाश पाते. शिशुपाल सिंह ने अपने पास एक लाउडस्पीकर मंगा रखा है जिससे वह रोजाना पूरे गांव को अखबार बांच कर सुनाता है. साधन- सुविधाओं से वंचित इस गांव में ४-५ घरों में अखबार आता है, वह भी ११ बजे आने वाली इकलौती बस में, मगर शिशुपाल सिंह के प्रयासों से पूरा गांव देश-दुनिया की सुर्खियां जान जाता है. अखबार पढ़ने का उसका तरीका भी निराला है. समाचार की हैडिंग पढने के बाद शिशुपाल अपने मौलिक अंदाज में उस पर बेबाक विचार भी प्रकट करता है. तभी तो लोग इस अनोखे समाचार-वाचक के न्यूज बुलेटिन का बेसब्री से इंतजार करते हैं. इतना ही नहीं किसी के घर जागरण हो या किसी का पशु खो जाए, गांव वालों को इसकी सूचना शिशुपाल सिंह के जरिये ही पहुंचती है. ग्राम में ग्रामसेवक या पटवारी या टीकाकरण के लिये नर्स के आने की खबर भी शिशुपाल सिंह के रेडियो से ही प्रसारित होती है. ग्राम की जन समस्याओं को भी यह अनोखा पत्रकार मुखरता से उठाता है. टी.आर.पी. के लिए मूल्यों को हाशिए पर डालती आज की मीडिया के लिए शिशुपाल सिंह अनूठा उदाहरण  है,   जो मौन भाव से सामाजिक जागरण का बेहतरीन काम कर रहा हैं.
हालांकि शिशुपाल सिंह के लिए चलना-फ़िरना तो दूर खुद करवट बदलना भी मुम्किन नहीं, मगर उसके चेहरे पर नैराश्य की छाया तक नजर नहीं आती. उसकी आंखों की उत्सुकता, चेहरे की चमक तथा  बात-बात पर खिलखिला कर हंसना उसके चट्टानों सरीखे बुलंद हौंसलों को  बयां करते जान पड़ते हैं ।
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यक्ष प्रश्न

हिन्दुस्तान का इतिहास किसी न किसी ऐसे जयचंदों के वर्णनों से भरा पडा है जिन्होंने अपनी नैतिकता सिर्फ चंद कागज़ के टुकड़ों के लिए और अपने व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए बेचीं है..और आज तक वो ही हालात है..जब  रक्षक ही भक्षक हो जाए तो कोई क्या करे..देश का खुफिया तंत्र..जिसपे पूरी अवाम की सुरक्षा टिकी है, जब वो ही भ्रष्ट हो जाए..तो कोई किस पर भरोसा करेincome tax वसूलने वाले ख़ुद income tax डकार जाते हैं, anti -corruption वाले ख़ुद corruption में लिप्त है, खुफिया तंत्र के अधिकारी ख़ुद देश की महत्वपूर्ण सुरक्षा जानकारी दुश्मन देश को सौंपते हैं. और हमारे माननीय नेतागण जिस जनता के मतों से जीत कर आते हैं उसी जनता का, उसी के लिए महत्वपूर्ण नियम अथवा किसी भी प्रकार के निर्णय लेने में, किसी भी हस्तक्षेप को उचित नहीं समझते. लोकतंत्र तो सिर्फ नाम का ही रह गया है..हम इतराते फिरते हैं कि दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है हमारा..किस बात पे इतराते हैं हम ? आज एक तरफ खबर आती है कि अमेरिका ने सुपर सोनिक मिसाइल तैयार की है, अंतरिक्ष में कोई नई उपलब्धि हासिल की है, तो हमारे समाचार चेंनल्स में देखने को मिलता है आज इस अफसर को रिश्वत लेते पकड़ा, महंगाई नहीं रुकी तो फूँक दी देश की कीमती सम्पति, तो कही आरक्षण और जातिवाद की आग में झुलसती सामाजिक व्यवस्था. अमेरिका में एक बार हवाई आतंककारी हमला हुवा उसके बाद मजाल है कि कोई हिमाक़त  कर ले दुबारा हमले की. और हमारे यहाँ, एक के बाद एक हमले होते हैं, आतंककारी पकडे भी जाते हैं, लेकिन नतीजा वो ही ढाक  के तीन पात. अब तो देश भक्ति के गीत भी सिर्फ चुनावों, २६ जनवरी और १५ अगस्त जैसे राष्ट्रीय गौरव के समारोहों में ही सिर्फ औपचारिकता निभाते प्रतीत होते हैं. अरे और तो और.. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के मंदिर (संसद) तक पर हमला करने वालों का सजा तक नहीं दी जाती, मुंबई बम  काण्ड के आरोपियों के आकाओं  के खिलाफ सब सबूत होने के बाद भी कोई कार्यवाही नहीं की जाती.
इन सबमे कही ना कही अवाम भी दोषी है मेरे नजरिये से क्योंकि एक छोटी सी मांग को तो लेकर आगजनी, हिंसा, पथराव, आत्मदाह, धरना, प्रदर्शन पता नहीं क्या-क्या  करती ,लेकिन नहीं कर सकती तो इन भ्रष्ट नेताओं को राजनीति में आने से रोकना, अपने व्यक्तिगत कारणों से इन भ्रष्ट, दागी और नैतिक रूप से गिरे हुवे इन वाह्यात लोगों को राजनीति में जबरदस्ती थोंप दिया जाता है जिन पर पता नहीं कितने मुक़द्दमे कई अदालतों में चलते होते हैं. जो जनता के वोट से नहीं अपितु अपने बाहुबल से जीत कर आते हैं. अगर मैं दूसरे शब्दों में कहूं तो इनको सैधांतिक  रूप से लोक अर्थात जनता चुनती है लेकिन व्यावहारिक रूप से आज भी राजतंत्र की ही तरह जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थति है. क्या यही है गाँधी के सपनो का भारत ? क्या यही है २१वीं सदी का भारत? क्या इसलिए शहीदों ने अपनी शहादत दी थी? क्या इसी को हम विकास कहेंगे ?
कहने को तो बहुत कहा जा चुका है इन विषयों पर और मैं भी कोई नई बात नहीं कह रहा. लेकिन आज के इन हालातों  को किसी भी नज़रिए से देखें, है सार्वभोमिक सत्य कि जिस देश में नेता ख़ुद जो इस लोकतंत्र रूपे विशाल जहाज़ के तारणहार हैं, भ्रष्ट है तो सिर्फ नौकरशाहों और अफसरशाहों से भी क्या अपेक्षा कर सकते हैं.
एक उम्मीद जरूर है, और वो भी इस लोकतांत्रिक देश की जनता से कि वो एक दिन जागेगी और जिस दिन जनता जागेगी उसी दिन शायद भारत एक बार फिर विश्व में सिरमौर होगा. क्योंकि इतिहास गवाह है कि किसी भी क्रांति के बिना कभी परिवर्तन नहीं आया, और परिवर्तन ही विकास की धुरी है..एक दिन ऐसी क्रान्ति आयेगी जरूर क्योंकि "अति सर्वर्त्र वर्जयेत"

- नरेन्द्र व्यास
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मूर्खता का महीना और गधा करे शोर (अविनाश वाचस्‍पति)

शुरू हुआ है देखो अभी
बीतता भी नहीं है कभी
बीत जाएगा तब भी
रीतेगा नहीं कभी
रीतने पर भी कोई
जीतेगा क्‍या कभी ?



करना है इमेज पर क्लिक
मेज पर नहीं ठकठकाना है
और पढ़ जाना है
मजा न आएगा
गारंटी इसकी भी है

देखिए फैशन के दौर में
दे रहे हैं गारंटी
इससे अधिक नहीं बजा सकते
हम किसी भी मंदिर की घंटी।
सोपानstep मासिक के सौजन्‍य से।
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बदलते वक्‍त की जरूरत (रश्मि रविजा)


बदलते वक्‍त की जरूरत

पहले कतरन पर क्लिक करके पूरा पढियेगा तभी अपनी राय दीजिएगा।
यह पोस्‍ट दिनांक 27 जनवरी 2009 के राष्‍्ट्रीय सहारा दैनिक, नई दिल्‍ली के सहारा इंडिया मास कम्‍यूनिकेशन द्वारा प्रकाशित साप्‍ताहिक पत्रिका आधी दुनिया में पेज नंबर 7 पर सचित्र प्रकाशित हुई है। आप इसे पढि़ये और एक बार फिर सच्‍चाईयों की गहराईयों में उतर जाइये।
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स्वास्थ्य बीमा के बारे में आवश्यक बातें जो सभी को पता होना चाहिये। (What You Should know about Mediclaim ..)


स्वास्थ्य बीमा दावा दायर करने की प्रक्रिया -

    स्वास्थ्य बीमा कौन सा लेना चाहिये और कितना प्रीमियम भरना चाहिये यह सब एक अलग बात है और स्वास्थ्य बीमा के दावे की प्रक्रिया बिल्कुल अलग। बीमा सुविधाओं का दावा करते समय आपको दावा दायर करने का फ़ार्म भरते समय होशियारी और सावधानी दिखानी होती है। स्वास्थ्य बीमा का दावा करते समय आपको और क्या सावधानियाँ रखनी चाहिये।

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ये लघु संदेश सेवा है , अरे एस एम एस है यार ...अजय कुमार झा



कुछ दिनों से मोबाईल में एस एम एस आ रहे थे , जाहिर है कि आपको भी आ रहे होंगे , मुझे कुछ को पढ को हंसी आई कुछ को पढ के नहीं आई , अब जरूरी तो नहीं कि मुझे नहीं आई तो और भी किसी को न आए , तो लीजीये न एक पोस्ट झेलिए ऐसी भी
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लपटन जी : सुना ,चांद पर पानी मिला है ...........


झपटन जी :- ओह ये तो बहुत बडी खबर है, बस इतना और पता चल जाए कि नमकीन, गिलास और दारू यहीं से ले के जाना पडेगा कि वो भी ........

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एक इश्वरीय संदेश :-
तू करता वो है जो तू चाहता है , मगर होता वो है जो मैं चाहता हूं , तू वो कर जो मैं चाहता हूं , फ़िर वही होगा जो तू चाहता है ....

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लपटन जी ने अपनी प्रेमिका का फ़ोन लेकर देखा कि आखिर मिस लपटन ने उनका नंबर किस नाम से सेव कर रखा है .......जानू, डीयर , मिस्टर ......अरे नहीं लिखा था ........टाईम पास नंबर ....आठ

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दोस्त रूठे तो रब रूठे ........

दोस्त फ़िर रूठे तो जग छूटे,

दोस्त फ़िर रूठे तो ......

चप्पल मारो साले को रोज का एक ही ड्रामा
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मेरे भाई कभी याद किया करो,

यार कभी कभी तो मिल लिया करो,

सिर्फ़ जनाजे में आना दोस्ताना नहीं होता

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लपटन जी ने अपनी लपटानी से कहा, ओ जाने तमन्ना हटा लो ये जुल्फ़ें अब तो ,,,,,,जो अब खाने में मिला एक भी बाल तो खुदा कसम .........सजनी से सीधा , गजनी बना दूंगा ....

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लपटानी की बेटी सयानी ने शादी के अगले दिन श्रीमती लपटानी को फ़ोन किया , "मां , मेरी इनसे लडाई हो गई है ?

श्रीमती लपटानी, " कोई बात नहीं बेटा, घबराने की कोई बात नहीं , सब ठीक हो जाएगा ॥

सयानी : " मां, वो तो ठीक है , मगर अब ये तो बताओ कि इनके लाश का क्या करूं ????
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इंसान की चार मां होती हैं

एक जिसने पैदा किया ,
एक वो जिसने पढाया ,
एक सासू मां , और

चौथी वो जिसके लिए मम्मी कहती है ," ओये कंजरा,राति दो बजे , केडि मा नाल गल्ला मारि जान्दा है "

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लपटन जी अपनी प्रेमिका से , " यार तुम चाईनीज़ जैसी क्यों दिखती हो ?

प्रेमिका ," क्योंकि मेरे पिता चाईनीज़ थे , इसलिए ।

लपटन जी ," अच्छा अच्छा, अब वे कहां हैं ?

प्रेमिका ," वे तो मर गए ।

लपटन जी ," हां , भई आखिर चाईना का माल था चलता भी कितना
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टीचर जी : लपटन translate करो,"बाजार में गोलियां चल रही थीं "

लपटन काफ़ी सोचने के बाद " the tablets are walking in the market "

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अरे बस जी , अभी तो मोबाईल भी है और मैसेज भी बाकी फ़िर कभी
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डॉ.अभिज्ञात को अम्बडेकर उत्कृष्ट पत्रकारिता सम्मान


नुक्‍कड़ की बधाई

कोलकाताः रविवार की देर रात तक आयोजित एक भव्य समारोह में विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान के लिए अम्बेडकर सम्मान प्रदान किये गये। डॉ.अभिज्ञात को उत्कृष्ट पत्रकारिता सम्मान आरके एचआईवी एड्स रिसर्च एंड केयर सेंटर के चेयरमैन डॉ.धर्मेन्द्र कुमार ने प्रदान किया। दो दशकों से पत्रकारिता कर रहे डॉ.अभिज्ञात सम्प्रति सन्मार्ग में वरिष्ठ उप-सम्पादक हैं। वे साहित्य में भी सक्रिय हैं और छह कविता संग्रह तथा दो उपन्यास प्रकाशित हुए हैं। साहित्य के क्षेत्र में योगदान के लिए उन्हें पांच पुरस्कार-सम्मान मिले हैं। यह समारोह उपनगर टीटागढ़ में आयोजित था।

महिलाओं के विकास में योगदान के लिए डॉ.सुरंजना चौधरी, ग्लोबल पर्सनालिटी आफ द ईयर रमेश प्रसाद हेला, औद्योगिक उपलब्धि सम्मान लोकनाथ गुप्ता, अम्बेडकर गुरुद्रोण सम्मान नृत्यानंद जी महाराज, सामाजिक जागरुकता सम्मान डॉ.संतोष गिरि, मैन आफ द ईयर सम्मान आत्माराम अग्रवाल, उभरता मीडिया उद्योग सम्मान विजन खबरा खबर (चैनल विजन) और यूथ आइको आफ द ईयर अवार्ड शिव प्रसाद गोसाईं को प्रदान किया गया।

कार्यक्रम डॉ.भीमराव अम्बेडकर शिक्षा निकेतन और आरके एचआईवी एड्स रिसर्च एंड केयर सेंटर की ओर से आयोजित था। इस अवसर पर टीटागढ़ डॉ.भीमराव अम्बेडकर शिक्षा निकेतन संस्था का उद्घाटन, डॉ.अम्बेडकर और संस्था के संस्थापक स्व.मक्खनलाल की मूर्ति का अनावरण उद्योगपति आत्माराम अग्रवाल ने किया। सांस्कृतिक कार्यक्रमों का लुत्फ उपस्थित श्रोताओं ने उठाया। आराधना सिंह ने भोजपुरी गीत पेश किये।
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आपको यूलिप (ULIP) के बारे में क्या क्या पता होना चाहिए… ? यूलिप क्या होता है.. [What is ULIP..]

यूलिप के तहत आयकर पर छूट
य़ुलिप में निवेश की गई राशी आपको आयकर के तहत छूट भी प्रदान करते हैं। यूलिप में किया गया निवेश आयकर की धारा 80 C  के तहत ज्यादा से ज्यादा १,००,००० तक के निवेश को आयकर में छूट मिलती है।निवेशक द्वारा चुनी गई योजनाओं से कोई फ़र्क नहीं पड़ता है।
कड़ियाँ पढ़ने के लिये नीचे दी गईं लिंक पर चटका लगाईये।
भाग १ - आपको यूलिप (ULIP) के बारे में क्या क्या पता होना चाहिए… ? यूलिप क्या होता है.. [What is ULIP.. Part 1]
भाग २ - आपको यूलिप (ULIP) के बारे में क्या क्या पता होना चाहिए… ? यूलिप क्या होता है.. [What is ULIP.. Part 2]
भाग ३ - आपको यूलिप (ULIP) के बारे में क्या क्या पता होना चाहिए… ? यूलिप क्या होता है.. [What is ULIP.. Part 3]
भाग ४ - आपको यूलिप (ULIP) के बारे में क्या क्या पता होना चाहिए… ? यूलिप क्या होता है.. [What is ULIP.. Part 4]
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नववर्ष में परिवार को सुरक्षित करें और परिवार को तोहफ़ा दें आज ही, जल्दी सोचिये और अमल करें [Secure your family, Think fast ….by Term Insurance]

नववर्ष में परिवार को सुरक्षित करें अगर आप ने अभी तक अपने परिवार को सुरक्षित करने की नहीं सोची है तो अब तत्परता से सोचिये और नये साल का तोहफ़ा दीजिये।

परिवार को सुरक्षित कैसे करेंगे इंश्योरेन्स से, जी हाँ आपने बिल्कुल सही पढ़ा है इंश्योरेन्स से। केवल इतना सोचिये अगर कल आप अपने परिवार के साथ न रह पायें तो परिवार कैसे अपना गुजारा करेगा, नहीं ९९% लोगों ने कभी इस बारे में नहीं सोचा है, केवल १% लोगों ने ही इस बारे में सोचा है। जी हाँ बिल्कुल कटु सत्य है यह, जबाब आपको अपने आप से या आसपास के लोगों से पूछ्कर ही पता चल जायेगा कि आप कितने जागरुक हैं अपने परिवार की सुरक्षा के लिये।

अब बहुत से लोग बोलेंगे कि हमने इंश्योरेन्स करवा रखा है तो अब हम इस बारे में बात करते हैं, अगर आपने LIC का इंश्योरेन्स करवा रखा है तो आपके परिवार को कितनी सुरक्षा मिल रही है, अरे देखिये भई पाँच लाख या उससे भी कम या थोड़ी सी ज्यादा, क्यों ?



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