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| अन्नाभाई |
विस्तार में जानने के लिए आप अपने जोखिम पर ही यहाँ संपर्क करें ......
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| अन्नाभाई |
बहुत प्यारा। सुन्दर।
बड़ा सिलसिलेवार लिखा है...कैसे एक एक छोटी बात भी सहेज कर
रख छोड़ी थी ? जैसे आज के लिये ही !
बच्चे ऐसे ही बड़े हो जाते है...हम उनसे वही पुरानी उम्मीदें लिए बैठे रहते हैं. अच्छा लिख रहीं हैं, जारी रहिये.,
bandahne waali post agli kadi kaa intazar hai
शमा जी
आपका ब्लॉग आज पहली बार ही देखा, एक पोस्ट पढ़ने के बाद इतना बढ़िया लगा कि पिछली दस-बारह पोस्ट भी पढ़ ली, पता नहीं आपकी लेखनी में क्या जादू है कि बाकी पोस्ट पढ़ने रुका नहीं जा रहा पर समय की कमी के चलते इसे कल पढ़ूंगा।
धन्यवाद
॥दस्तक॥
तकनीकी दस्तक
गीतों की महफिल
आह्ह!! कितने अरमान होते हैं ऐसे विशेष मौकों के लिए...दिल की गहराई से उठते इमानदार भाव..अगली कड़ी का इन्तजार.
Pahli baar apke blog pe aaya hoon, par padh kar man prasann ho gaya.
Is pyari si post ke liye badhaayi.
कहते है ना एक मौन भी कभी कभी किसी संवाद से बेहतर होता है.....आपका मूक संवाद भी बेहद भावुक ओए सच्चा है.....
बाँधे हुये है..अब तक !
फिर, आगे ?
जारी है, श्री शेखावत, भारत के माजी उपराष्ट्रपती के द्वारा दिए गए भाषण का उर्वरित अंश:
श्री शेखावतजी ने सभागृह मे प्रश्न उपस्थित किया," ऐसे हालातों मे पुलिसवालों ने क्या करना चाहिए ? कानून तो बदलेगा नही...कमसे कम आजतक तो बदला नही ! ना आशा नज़र आ रही है ! क़ानूनी ज़िम्मेदारियों के तहत, पुलिस, वकील, न्यायव्यवस्था, तथा कारागृह, इनके पृथक, पृथक उत्तरदायित्व हैं।
"अपनी तफ़तीश पूरी करनेके लिए, पुलिस को अधिकसे अधिक छ: महीनोका कालावधी दिया जाता है। उस कालावाधीमे अपनी सारी कारवाई पूरी करके, उन्हें न्यायालय मे अपनी रिपोर्ट पेश करनेकी ताक़ीद दी जाती है। किंतु, न्यायलय पे केस शुरू या ख़त्म करनेकी कोई समय मर्यादा नही, कोई पाबंदी नही ! "
शेखावतजीने ऐलानिया कहा," पुलिस तक़रीबन सभी केस इस समय मर्यादा के पूर्व पेश करती है!"( याद रहे, कि ये भारत के उपराष्ट्रपती के उदगार हैं, जो ज़ाहिरन उस वक्त पुलिस मेहेकमेमे नही थे....तो उनका कुछ भी निजी उद्दिष्ट नही था...नाही ऐसा कुछ उनपे आरोप लग सकता है!)
"अन्यथा, उनपे विभागीय कारवाई ही नही, खुलेआम न्यायलय तथा अखबारों मे फटकार दी जाती है, बेईज्ज़ती की जाती है!! और जनता फिर एकबार पुलिस की नाकामीको लेके चर्चे करती है, पुलिसकोही आरोपी के छूट जानेके लिए ज़िम्मेदार ठहराती है। लेकिन न्यायलय के ऊपर कुछभी छींटा कशी करनेकी, किसीकी हिम्मत नही होती। जनताको न्यायलय के अवमान के तहत कारवाई होनेका ज़बरदस्त डर लगता है ! खौफ रहता है ! "
तत्कालीन उप राष्ट्रपती महोदयने उम्मीद दर्शायी," शायद आजके चर्चा सत्र के बाद कोई राह मिल जाए !"
लेकिन उस चर्चा सत्रको तबसे आजतक ७ साल हो गए, कुछभी कानूनी बदलाव नही हुए।
उस चर्चा सत्र के समापन के समय श्री लालकृष्ण अडवानी जी मौजूद थे। ( केन्द्रीय गृहमंत्री के हैसियतसे पुलिस महेकमा ,गृहमंत्रालय के तहेत आता है , इस बातको सभी जानतें हैं)।
समारोप के समय, श्री अडवाणीजी से, (जो लोह्पुरुष कहलाते हैं ), भरी सभामे इस मुतल्लक सवाल भी पूछा गया। ना उन्ह्नों ने कोई जवाब दिया ना उनके पास कोई जवाब था।
बता दूँ, के ये चर्चा सत्र, नेशनल पुलिस commission के तहेत ( 1981 ) , जिसमे डॉ. धरमवीर ,ICS , ने , पुलिस reforms के लिए , अत्यन्त उपयुक्त सुझाव दिए थे, जिन्हें तुंरत लागू करनेका भारत के अत्युच्च न्यायलय का आदेश था, उनपे बेहेस करनेके लिए...उसपे चर्चा करनेके लिए आयोजित किया गया था। आजभी वही घिसेपिटे क़ानून लागू हैं।
उन सुझावों के बाद और पहलेसे ना जाने कितने अफीम गांजा के तस्कर, ऐसे कानूनों का फायदा उठाते हुए छूट गए...ना जाने कितने आतंकवादी बारूद और हथियार लाते रहे, कानून के हथ्थेसे छूटते गए, कितने बेगुनाह मारे गए, कितनेही पुलिसवाले मारे गए.....और कितने मारे जायेंगे, येभी नही पता।
ये तो तकरीबन १५० साल पुराने कानूनों मेसे एक उदाहरण हुआ। ऐसे कई कानून हैं, जिनके बारेमे भारत की जनता जानती ही नही।
मुम्बई मे हुए ,सन २००८, नवम्बर के बम धमाकों के बाद, २/३ पहले एक ख़बर पढी कि अब e-कोर्ट की स्थापना की जा रही है। वरना, हिन्दुस्तान तक चाँद पे पोहोंच गया, लेकिन किसी आतंक वादीके मौजूदगी की ख़बर लखनऊ पुलिस गर पुणे पुलिस को फैक्स द्वारा भेजती, तो न्यायलय उसे ग्राह्य नही मानता ...ISIका एजंट पुणे पुलिसको छोड़ देनेकी ताकीद न्यायलय ने की ! वो तो लखनऊसे हस्त लिखित मेसेज आनेतक, पुणे पुलिस ने उसपे सख्त नज़र रखी और फिर उस एजंट को धर दबोचा।
सम्पूर्ण
शमा जी,अच्छा किया आपने अपने मन के उद्गार बाहर निकालने की राह चुनी। यहाँ आपको बहुत से मित्र मिलेंगे,जो आपकी बात समझेंगे भी,सलाह भी देंगे व कभी कभी आपको आपकी किसी सोच को बदलने को भी उकसाएँगे। सबसे बड़ी बात यह है कि जब हम अपनी सोच को लिखित शब्दों में उड़ेलते हैं तो बहुत सी बातें अपने आप ही हमें अधिक साफ होकर नजर आने लगती हैं। यहाँ आकर हमें यह भी महसूस होता है कि दुख में हम अकेले नहीं हैं,सब हमारे साथ हैं और हम अकेले दुखी नहीं हैं। सुख में भी हमारी खुशी में खुश होने वाले बहुत से मिल जाते हैं।
आपका यहाँ स्वागत है।
घुघूती बासूती
माँ का ममत्व-बहुत बढ़िया लिख रहीं हैं आप-हमें इन्तजार रहता है आपके लेखन का.
हम तो खैर हमेशा से इस बात के खास पक्षधर रहे है की साहित्य लेखन हो या गैर पेशेवर लेखन हो बस पढने वाले को उससे जुडाव महसूस होना चाहिए ..ओर उसकी ढेर सारी खासियत आप में नजर आती है....लिखती रहे....