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चिट्ठी पत्री से...!

आजाओ न कभी यूँ ही
चिट्ठी पत्री से एकदम से

फिर कुछ पूछो न नाम पता
फिर देहरी पर जम ही जाओ
फिर मै थामूं समझ अपना
आखर से आंगन भर जाओ

इक खुशियों भरी सूचना से
घर महका जाओ मद्धम से !

हाँ सबको संबोधन करना
कोई भी अपना छूटे न
स्नेह भी हो आदर भी हो
कोई भी परिजन रूठे न

लेकिन मुझसे ऐसे मिलना
जैसे इक प्रियतम, प्रियतम से !
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जब भी दिल को कोई बात अखर जाती है ...!

 
हर बार तुम्हारी गली नजर आती है
जब भी दिल को कोई बात अखर जाती है ...!

कोई अनजाने ही कुछ कह जाये तो भी
कोई कह के कुछ रह भी जाये तो भी
कोई कुछ न बोले पर शक्ल बना ले
हर बात पे अब तो साँस बिखर जाती  है 
हर बार तुम्हारी गली नजर आती है ...!

कोई बात भली तो तुम ही मुस्काते हो
जैसे कोई आड़ से मुझे चिढ़ा जाते हो
फिर झट से जाने कहाँ अरे जाते हो
शायद ये गाड़ी तेरे नगर जाती है
हर बार तुम्हारी गली नजर आती है ...!
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