चिट्ठी पत्री से...!

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  • गीतिका 'वेदिका'
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  • आजाओ न कभी यूँ ही
    चिट्ठी पत्री से एकदम से

    फिर कुछ पूछो न नाम पता
    फिर देहरी पर जम ही जाओ
    फिर मै थामूं समझ अपना
    आखर से आंगन भर जाओ

    इक खुशियों भरी सूचना से
    घर महका जाओ मद्धम से !

    हाँ सबको संबोधन करना
    कोई भी अपना छूटे न
    स्नेह भी हो आदर भी हो
    कोई भी परिजन रूठे न

    लेकिन मुझसे ऐसे मिलना
    जैसे इक प्रियतम, प्रियतम से !

    3 टिप्‍पणियां:

    आपके आने के लिए धन्यवाद
    लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

     
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