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ब्‍लॉगवाणी और चिट्ठाजगत एग्रीगेटरों के आगमन की सच्‍चाई

अगर यह सच है कि
ब्‍लॉगवाणी और चिट्ठाजगत एग्रीगेटर का पुन: अवतरण हो रहा है
सोच रहा हूं
ब्‍लॉग और चिट्ठों पर हो रहे घमासान
युद्ध मान लेते हैं
का क्‍या होगा ?


चिट्ठाजगत आए
या आए ब्‍लॉगवाणी
आओ मिलकर फैसला करें
पाठकवाणी
ब्‍लॉगजगत के वासी।


अपनी राय दें
क्‍या चाहते हैं
क्‍या हो
क्‍या न हो
खामियां क्‍या पहले रहीं
अब जो चाहते नहीं ।


वह भी अवश्‍य बतलाएं
तनिक न शर्माएं
जिससे बाद में
न उलझें उलझाएं।


सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं है सूरत यह बदलनी चाहिए। 
एक फेमस कवि की पंक्तियां। 
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क्‍या ब्‍लॉगवाणी और चिट्ठाजगत को सक्रिय करने की कोशिशें शुरू की जानी चाहिएं ???

यदि आप इस प्रश्‍न का उत्‍तर 'हां' में देना चाहते हैं तो सबसे पहले इन दोनों एग्रीगेटरों में से एक पर अपनी पूरी सहमति दीजिए और आप शनिवार 24 दिसम्‍बर 2011 को अंतरराष्‍ट्रीय सांपला चिट्ठा संगोष्‍ठी में शिरकत कर रहे हैं तो इस मुद्दे पर पूरी गंभीरता से विचार विमर्श कीजिए और एक नेक राह निकालिये। 

आप परिचित ही हैं कि इस चिट्ठा संगोष्‍ठी में चिट्ठा जगत के बेताज बादशाह शामिल हो रहे हैं। जिनमें अलबेला खत्री, राज भाटिया, ललित शर्मा, संगीता पुरी, अन्‍तर सोहिल, राजीव तनेजा, रूपचंद शास्‍त्री, दिनेश राय द्विवेदी,   योगेन्‍द्र मौद्गिल, वीरु भाई, शाहनवाज, खुशदीप सहगल और सतीश सक्‍सेना जी इत्‍यादि प्रमुख हैं। इसलिए कोई वजह नहीं बनती कि संगोष्‍ठी में चिट्ठा जगत के उन्‍वान के लिए फैसला लिया जाए और उस पर अमल करने में कोई कठिनाई हो। 

और कोई निर्णय हो, न हो, कोई बात हो, न हो लेकिन इस संबंध में लिए गए फैसले के बहुत ही दूरगामी परिणाम सामने आयेंगे। इसलिए संगोष्‍ठी में भाग लेने वाले चिट्ठाकार इस अवसर को मत गंवाइयेगा क्‍योंकि इस तरह सबके मिल बैठने और फैसले लेने के मौके बहुत कम ही आते हैं। मेरी इस संबंध में लिए गए सभी प्रकार के निर्णय में सहमति समझी जाए। 

एक बहुत ही अच्‍छी खबर का हिन्‍दी चिट्ठाजगत इंतजार कर रहा है। उसे निराश मत कीजिएगा अलबेला खत्री और टीम जी।
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चिट्ठाजगत की धमाकेदार वापसी : आप भी जांच लीजिए


चुप चुप चुप चुप

गुप चुप गुप चुप
कब तक रहेंगे
ब्‍लॉगर हैं, कहेंगे
सब कुछ कहेंगे

आज दिल्‍ली में हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की सरगर्मी रही है। जिसके चित्र और चित्र, विचार और विचार आप जल्‍द ही पोस्‍टों में देखेंगे। वहीं पर यह मालूम हुआ है कि चिट्ठाजगत आज वापिस प्रकट हो गया है। गति थोड़ी धीमी है। जल्‍द ही उसकी गति बढ़ाने के लिए टॉप गियर डाला जायेगा।

समाचार शुभ है। 
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चिट्ठाजगत स्‍वस्‍थ और सानंद है अब : आप भी आनंद लीजिए

चिट्ठाजगत आया, ब्‍लॉगर खुश 
जी हां
अब स्‍वस्‍थ है
आनंदित है
आप भी आनंदित हो आयें

चिट्ठाजगत पर
अपनी पोस्‍टें
अपनी नहीं
सबकी पोस्‍टें देखें
पढ़ें और टिप्‍पणियायें

आप सभी को
चिट्ठाजगत की वापसी की
शुभ मंगलकामनायें

ब्‍लॉगर प्रसन्‍न हैं
मुदित प्रत्‍येक मन है
नेक विचार आसन्‍न हैं

साल अभी बीता नहीं है
अभी मौजूद यहीं है
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चिट्ठाजगत की छुट्टी खत्म...लौट आया

लो जी चिट्ठाजगत की छुट्टी खत्म हुई
लौट आया है ये
अब फिर छापेगा धड़ाधड़
आओजी स्वागत है
:-)
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ब्लॉगिंग करने पर ब्लॉगरों पर टैक्स लगेगा ? अब सर पर बैठेगी कार

ब्लॉगिंग करना जुर्म तो नहीं होने वाला परन्तु तेजी से इसकी लोकप्रियता के मद्देनजर इसे टैक्स के दायरे में लाने का सरकार ने मन बना लिया है। पर कर का यह कहर सिर्फ हिन्दी ब्लॉगिंग पर ही क्यों, जबकि हिन्दी ब्लॉगिंग तो अभी अपने बचपन में ही है और इससे आय होना भी आरंभ नहीं हुई है।

पता चला है कि सरकार, जिसके जितने ब्लॉग उससे उसी के अनुसार कर लिया जाएगा, की पद्धति के तहत कर वसूलने की तैयारी कर रही है। सरकार को लगता है कि देश को आर्थिक मंदी की मार से बाहर निकालने के लिए यह एक कारगर कदम हो सकता है। इसे लागू करने के लिए सरकार चुनाव के समय दी जाने वाली रियायतों से भी दूर रखेगी क्योंकि ऐसे मामले आचार संहिता के दायरे में बहुत जल्दी आते हैं। यह तो वैसे भी देशहित से जुड़ा हुआ मसला है।

सरकार हिन्दी प्रेमी ब्लॉगरों से ईमानदारी की उम्मीद करती है। उसका मानना है कि जो हिन्दी से सच्चे। मन से प्रेम करता है। हिन्‍दी के लिए तन और धन न्‍यौछावर करने वाला हिन्‍दी सेवी है। वो अपने हिन्दी प्रेम की मिसाल ब्लॉगिंग पर कर चुका कर दे सकता है। ब्लॉगर्स को असुविधा न हो इसके लिए सरकार एक ऑनलाईन खाता शुरू कर रही है।

यह कानून वित्तीय वर्ष 2009-2010 में प्रभावी हो जाएगा। इसके तहत ब्लॉग की लोकप्रियता और प्राप्त टिप्पणियों के अनुसार कर देय होगा। मतलब साफ है कि जिसके जितने अधिक ब्लॉग और जितनी अधिक लोकप्रियता होगी तथा जिस पोस्ट अथवा ब्लॉग पर अधिकाधिक टिप्पणियां पाई जाएंगी, उन्हें उसी हिसाब से अधिक राशि का भुगतान करना होगा।

जिस ब्लाग के जितने अधिक फालोअर्स होंगे, उससे उसी हिसाब से अधिक टैक्स वसूल किया जाएगा क्योंकि यही उनकी लोकप्रियता का पैमाना होता है। वो बात दीगर है कि जो जितने अधिक ब्लागों का फालाओर होगा उसे टैक्स देयता में छूट मिलेगी। परन्तु अधिक टिप्पणी करने वाले ब्लॉ्गरों को इस छूट का लाभ नहीं मिल सकेगा।

ब्लॉगवाणी/चिट्ठाजगत इत्यादि एग्रीगरेटर्स पर पसंद पर क्लिक करने वाले ब्लॉगर्स को प्रति क्लिक के हिसाब से सरकार द्वारा भुगतान भी किया जाएगा। इस नीति का जिन ब्लॉगरों ने स्वालगत किया है वे सभी अंग्रेजी के हैं। परन्तु फंडा यह है कि जिस ब्लॉग की अधिक पसंद क्लिक होंगी उनसे सरकार को टैक्स भी तो अधिक मिलेगा। अब तक अपनी पोस्ट‍ पर ब्लॉगरों द्वारा पसंद चटकाने और टिप्पणी की मांग में मंदी आने की संभावना है। बल्कि टैक्स से बचने के लिए ब्लॉंगर्स एग्रीगरेटर्स की सुविधाएं न लेने पर भी विचार करने लगें और टिप्पणी की सुविधा ही रोक दें तो क्या आश्चर्य ? और अपनी पोस्ट की सूचना ई मेल के जरिए ही देने लगें और टिप्पणियां भी ई मेल पर ही मंगवाएं। जिससे टैक्स से बचाव हो सके।

जो ब्लॉग सिर्फ कविता को समर्पित होंगे अथवा जो ब्लॉंगर अपनी टिप्पणियां कविता में देते हैं उन्हें इस टैक्स से‍ निजात मिल सकेगी। इससे इंटरनेट पर हिन्दी कविता का भविष्य स्वर्णिम होने की आशा जगी है। आपकी इस संबंध में क्या राय है और आप इस करदेयता के पक्ष में हैं तो क्यों और अगर नहीं हैं तो भी क्यों ? अपनी राय जाहिर करें।

विदेश में रहकर हिंदी ब्लॉगिंग में जुटे ब्लॉगर प्रसन्न न हों। वे भी भारतीय हिंदी ब्लॉगरों की भांति सन्न हों।
प्रिंट मीडिया के धुरंधरों ने सरकार के इस कदम का सहर्ष स्वागत किया है और प्रिंट मीडिया के दोबारा से फलने फूलने की आशा व्यक्त की है। यही स्थिति चैनलों की भी है। चैनलों की घटती साख और टी आर पी में भी सरकार के इस असरकारी कदम से तेजी आने की उम्मीद की जा रही है।

मेरा भी यह निवेदन है कि जब तक पसंद का कीड़ा टैक्स से बाहर है, आप उसे अपने माउस से हिट कर सकते हैं और कीबोर्ड का प्रयोग करके टिप्पणियों की गति बढ़ा सकते हैं। कल के बारे में कौन जाने ?
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250वीं पोस्‍ट है नुक्‍कड़ पर और टिप्‍पणियां अपार : कौन शोध करेगा

इस पोस्‍ट के साथ ही नुक्‍कड़ पर 250 पोस्‍ट पूरी हो गई हैं। नुक्‍कड़ अपने सभी साथी लेखकों, पाठकों, ब्‍लॉगर साथियों का इस उपलब्धि के लिए आभार करता है। आप सबको जानकर असीम प्रसन्‍नता होगी कि हिन्‍दी ब्‍लॉग्‍स यानी चिट्ठों की संख्‍या प्राप्‍त सूचना के अनुसार 10000 के उपर चढ़ चुकी है। इससे पता लग रहा है कि हिन्‍दी कितनी बढ़ चुकी है। इस चढ़ने, बढ़ने और अंग्रेजी से लड़ने, लड़ने नहीं, मनों में धमकने के लिए आप सबकी भूमिका को नहीं भुलाया जा सकता है। एक बार फिर सभी का आभार। करते रहें नुक्‍कड़ को इसी तरह प्‍यार। मार्च में वित्‍तीय वर्ष की समाप्ति तक 300 पोस्‍ट का लक्ष्‍य हासिल करने के लिए कीबोर्डबद्ध रहें सभी नुक्‍कड़ग्रहवासी।

एक निवेदन और आप लोग सदा इस बात का ध्‍यान रखें कि पोस्‍ट को 24 घंटे प्रमुखता से एग्रीगेटर्स पर जमे रहने के लिए अधिकाधिक पसंद पर चटका लगाने और टिप्‍पणी लगाने यानी राय प्रकट करने की भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है। इसके लिए आप सभी का सहयोग सदा की तरह मिलता रहेगा। इसी विश्‍वास के साथ। फिर नुक्‍कड़ पर। हिन्‍दी को आगे बढ़ाने की इस मुहिम में लगे एग्रीग्रेटर्स की महती भूमिका से भी इंकार नहीं किया जा सकता है।

नुक्‍कड़ पर यदि कोई ब्‍लॉगर साथी शोध करना चाहे और बतलायें कि अब तक की अवधि में इस ब्‍लॉग की पोस्‍टों की क्‍या विविधता रही, टिप्‍पणियों में क्‍या रहा, इसे और अधिक पाठकों तक पहुंचाने के लिए क्‍या किया जा सकता है, किन और लेखकों को इससे जोड़ा जाना चाहिए, और भी ऐसी संभावनाओं पर आप सबकी राय बेबाकी से सदा की तरह आमंत्रित हैं।

चलते चलते बतला रहा हूं कि साहित्‍य शिल्‍पी पर होली के अवसर पर जारी की गई कार्टूनक्रीड़ा में यह कार्टून जारी किया गया है। जिसे जो न देख पाए हों, इसे देखें और होली के बाद भी इसका आनंद लें। और अधिक आनंद लेने के मूड में हों तो इसे भी पढ़ें हिलियाना और जूतियाना पर टिप्‍पणी देने से न डरें और न पसंद पर चटका लगाने से।
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"इस प्यार को क्या नाम दूँ"

"इस प्यार को क्या नाम दूँ"

 

***राजीव तनेजा***

"दिल की ये आरज़ू थी कोई दिलरुबा मिले"...

"आखिर तुम्हें आना है...ज़रा देर लगेगी"...

"आज ये सब गाने मुझे बेमानी से लग रहे थे क्योंकि सब कुछ धीरे-धीरे सैटल जो होता जा रहा था"

"आज भी पुराने दिन याद करता हूँ तो सिहर-सिहर उठता हूँ"...

"उफ!..वो दिन भी क्या दिन थे जब मैँ दिन रात इसी सपने में खोया रहता कि... काश..सपने में ही दिख जाए वो मुझे किसी तरह "

"असलियत में तो नामुमकिन सी बात जो लगती थी"..

"उसका चेहरा हमेशा मेरी आँखो के आगे छाया रहता"...

"ज़मीन पर रह कर चाँद को पाने की चाहत थी मेरी"..

"पहली बार बचपन में बडे पर्दे पर ही तो देखा था उसे"..

"सामने ये कौन आया...दिल में हुई हलचल...

देख के बस एक ही झलक...हो गए हम पागल"..

"उफ!..क्या कयामत बरपायी थी उसने अपने पहले ही जलवे में"..

"जिसे देखो...वही शैंटी फ्लैट हुए जा रहा था तो अपुन किस खेत की गाजर मूली थे?"...

"थे तो हम भी हाड माँस के मामुली इंसान ही ना?...

"सो!..कैसे बचे रह्ते उसके मोह पाश से?"

"बस अब ना था दिन को चैन और ना रही रातों की नींद"

"जानता था कि मेरी किस्मत में नहीं है वो"..

"कोई बडा आदमी ही ले जाएगा उसे"

"मेरी किस्मत में तू नहीं शायद...क्यूँ तेरा इंतज़ार करता हूँ...

मैँ तुझे कल भी प्यार करता था...मैँ तुझे अब भी प्यार करता हूँ"

"लोगों से सुना है...किताबों में लिखा है...

सबने यही कहा है कि...नखरे बहुत हैँ स्साली के"..

"खर्चीली इतनी कि पूछो मत"...

"किसी आँडू-बाँडू को पुट्ठे पे हाथ तक नहीं धरने देती है"...

"अब ये बावले क्या जानें कि नखरे तो होने ही हैं....टॉप की आईटम जो ठहरी"...

"अब हर किसी ऐरी-गैरी...नत्थू-खैरी के बस का कहाँ कि वो लटके-झटके दिखाती फिरे"

"नखरे दिखाना भी अदा होती है ...स्टाईल होता है"...

"अब खुमार ऐसा छाया दिल ओ दिमाग पे कि लाख उतारे ना उतरा"

"सबने समझाया कि रहने दे...तेरे बस कि बात नहीं"...

"ऊँचे लोगों की ऊँची पसन्द भला गरीब के घर में एडजस्ट कैसे करेगी?"

"बडे ही प्यार से ...जतन से रखूँगा"

"सब नखरे सह-सह लूंगा"...

"रूठ गयी तो ...प्यार से...मान मनौवल से मना लूंगा"

"अब किसी और को बसाने की इस दिल ए नादाँ में चाहत ना रही"

"बचपन से दिल में यही इकलौती इच्छा समाई हुई थी कि...एक ना एक दिन उसे लाना ज़रूर है"

"जब जवान हुआ और थोडा बहुत कमाना भी शुरू कर दिया तो...

कईओं ने घर आ-आ के खुद ही कहना शुरू कर दिया कि आप हमारी वाली ले जाएँ"

"मैँ मन ही मन सोचता कि इनकी जूठन?"....

"और!..वो मैँ सम्भालूँ?"

"हुह!..ऐसी होने से तो न होना ही अच्छा है लेकिन कम कमाई होने की वजह से सिवाय चुप लगा के रहने के मेरे पास कोई चारा नहीं होता था"

"अफसोस!..कोई फ्रैश पीस आ के ही राज़ी नहीं था मेरे पास"

"जो भी मिलती ...कोई ना कोई कमी साथ लिए ज़रूर होती"

"किसी का फिगर बेकार तो...

किसी के रंग रूप में दम वाली बात नज़र नहीं आती"

"कोई सूरत-शक्ल से बेकार...

तो कोई नैन-नक्श से कंडम"..

"कोई ज़रूरत से ज़्यादा तगडी तो...

किसी का कमज़ोरी में कोई सानी नहीं"

"कोई मेकअप से लिपी-पुती...

तो कोई मेकअप विहीन अपना दीन चेहरा लिए नज़र आती"

"अपुन ने तो अपने सभी यार-दोस्तों से साफ-साफ कह दिया था कि..

"लाएँगे तो एक्दम सॉलिड पीस ही लाएँगे वर्ना खाली हाथ बैठे रहेंगे"

"अब ये बेकार की '*&ं%$#@'पीस अपने बस की बात नहीं"

"सुना जो रखा था कि सब्र का फल मीठा होता है...

तो सोचा कि क्यों ना सब्र करके भी देख लिया जाए?"

"डायबिटीज़ हुई तो क्या हुआ?"...

"अब!..थोडा बहुत मीठा तो चलता ही है"...

"क्यों?..है कि नहीं?"

"और आखिर हर्ज़ ही क्या है इसमें?"

"क्या मालुम आने वाला कल सुनहरा हो"

"हम होंगे कामयाब एक दिन...हो..हो...मन में है विश्वास...पूरा है विश्वास"

"खैर...हम सब्र करते रहे और वो ऊपर बैठा-बैठा हमारे सब्र का इम्तिहान लेता रहा"...

"पहले तो ये बहाना था जनाब के पास कि मुंडा कमाता नहीं है" ...

"अब तो ठीकठाक कमाने भी लगा हूँ"...

"अब क्या एतराज़ है आपको?"

"स्साला!..जिसे देखो वही अपना घिसा पिटा पुराना माल चेपने की फिराक में तैयार बैठा मिलता था"..

"अब वैसे कहने को तो कई ठीक-ठाक काम चलाऊ अपने रस्ते में आती रही...

टकराती रही लेकिन इस चक्कर में कि सिर्फ और सिर्फ सालिड मॉल पे ही हाथ डालना है"...

"मैँ बेवाकूफ!..सबको रिजैक्ट पे रिजैक्ट करता चला गया"

"यही सोच थी मेरी कि ऊपरवाला रहमदिल है"...

"उसके घर देर है पर अन्धेर नहीं है"

"कोई ना कोई तो उसने मेरे लिए बनाई ही होगी"

"सुन जो रखा था कि जोडियाँ ऊपर से ही बन के आती हैँ"

"तो चलो!...देख लेते हैँ कि कब जागती है अपनी रूठी हुई किस्मत"

"इसी चक्कर में उम्र बढती रही..बढती रही"

"अब तो पडोसियों ने भी टोकना शुरू कर दिया था कि...

अब मज़े नहीं लेगा तो क्या बुढापे में लेगा?"

"बाद में तेरे किसी काम ना आएगी"...

"दूसरे ही मौज उडाएँगे"

"जब कब्र में पैर लटके होंगे तो ला कर क्या धूप-बत्ती करेगा?"

"अगर ढंग की एक नहीं मिलती है तो कामचलाऊ दो ले आओ"एक मज़ाक उडाता हुआ बोला

"आजकल बडी सस्ती मिल रही हैँ नेपाल में और आसाम में"

मुझे गुस्सा आ गया...बोला"नेपाल और आसाम का लोकल माल आप ही को मुबारक हो शर्मा जी"

"अपुन को तो चाहिए..एकदम स्टाईलिश वाला"

"शर्मा जी!...आपसे अपनी तो संभलती नहीं ठीक से और चले हैँ लैक्चर देने दूसरों को"...

"पहले अपना घर तो ठीक करो जा के"

"चिनॉय सेठ!...जिनके घर शीशे के होते हैँ वो दूसरों के घरों पे पत्थर नहीं फैंका करते"

"कुछ इल्म भी है आपको?कि कभी कोई तो कभी कोई आपकी वाली के साथ मौज उडा रहा होता है?"
"कभी चाँदनी चौक तो कभी चॉयना"...

"और साहेब हैँ कि इन्हें कोई फिक्र ही नहीं"

"वाह साहेब!..वाह"

"एक-आध को तो मैँने 'बाराटूटी' में भी गुल्छर्रे उडाते देखा था आपकी वाली के साथ"

"सच...इन्हीं आँखो से"

"आप बुज़ुर्ग हैँ...आपकी इज़्ज़त कर रहा हूँ वर्ना कोई और होता तो अभी के अभी मुँह तोड के रख देता"

"मूड खराब हो चला था मेरा"

"लग रहा था कि बिना उसके ही पूरी ज़िन्दगी काटनी पडेगी"

"ये सब ख्यालात दिल में उमड-उमड ही रहे थे कि अखबार में छपे एक इश्तेहार ने सारा मूड एकदम से फ्रैश कर दिया"

"बार-बार उसी सफे को पढे जा रहा था मैँ जिसमें मेरी जॉनेमन का जिक्र था"

"अपनी चमचम कर चमकती किस्मत पे जैसे विश्वास ही नहीं हो रहा था मुझे"

बार-बार खुद को चिकोटी काटता कि...

"या अल्लाह!...क्या ये सच है?"

अब दिल का भंवर झूम-झूम गाने लगा..

"जिसका मुझे था इंतज़ार...वो घडी आ गयी...आ गयी"...

"जिसके लिए था दिल बेकरार...वो घडी आ गयी..आ गयी"

"अब रुका किस कम्भख्त से गया?"...

"सीधा दिया हुआ फोन नम्बर मिलाया और सारी बातचीत करने के बाद बताए गए पते पे जा पहुँचा"

"वो तैयार खडी मानों मेरी ही राह तक रही थी"

"इस प्यार को क्या नाम दूँ?"

"दबे हुए जज़बातों को क्या अल्फाज़ दूँ?"

"शायद...पहली नज़र का पहला वाला प्यार यही था"

"लव ऐट फर्स्ट साईट"...

"जब अपने बारे में सब कुछ तफ्तीश से बताया उन्हें कि...

तनख्वाह के अलावा कितना कमाता हूँ ऊपर से और...

क्या क्या शौक हैँ मेरे वगैरा वगैरा"...

"तो कहीं जा के उन्हें तसल्ली हुई कि यही बन्दा ठीक रहेगा"

"हर किसी राह चलते ऐरे-गैरे नत्थू खैरे के हाथ कैसे थमा देते?"

"पहले भी तो देख चुके थे किसी अनाडी के हाथ में थमा के"...

"दो दिन भी ठीक से सम्भाला नहीं गया था उससे और उल्टे पाँव लौटा दी थी बैरंग "

"अब कहीं जा के तसल्ली हुई दिल को कि अब किसी को फाल्तू बोलने का मौका नहीं मिलेगा"

"यार-दोस्त...पडोसी-रिश्तेदार...सबके मुँह बन्द हो जाएँगे खुद ही"

"बडे कहते फिरते थे कि...राजीव के बस का कुछ नहीं"..

"ऐसे ही वेल्ले हाँकता फिरता है" ..

"ये!..बडा सा...मोटा सा ताला लग जाएगा उनकी लपलपाती ज़बान को "

"अब अपने मुँह से क्या तारीफ करूँ कि...

"दिखने में कैसी है?"

"रंग-रूप कैसा है उसका?"..

"स्टाईल कैसा है उसका?"

"फिगर कैसी है उसकी?"वगैरा...वगैरा"...

"उफ!...कैसे तारीफ करूँ उसकी?"

"रंग-रूप ऐसा कि चाँद भी शर्मा उठे"

"कोमल इतनी कि छू लेने भर से दाग लग जाए"

"बस यूँ समझ लो कि एक दम मक्खन के माफिक चिकनी"

"चाल ऐसी मतवाली कि जब सडक पे निकले तो सब की सब निगाहेँ थम जाएँ"...

"कसा हुआ भरपूर बदन कि बडे-बडे विश्वामित्र ललचा उठें"

"आँखे चौँधिया जाएँ उनकी "

"बोलती बन्द हो उठे "

"उनके जल कर कोयला होने का मंज़र देख ये दिल खुशी से झूम उठता है"

"तारीफ करूँ क्या उसकी...जिसने तुम्हें बनाया...

ये चाँद सा रौशन चेहरा ज़ुल्फों का रंग सुनहरा"...

"ऊप्स!..ये ज़ुल्फें कहाँ से आ गई बीच में?"..

"हैँ ही कहाँ उसके ज़ुल्फें?". ..

"मुझे तो दिखाई ही नहीं दी"

"अब वो ऐसी है...या फिर वो वैसी है...

"मेरे कहने से तो आप मानने से रहे"...

"तो आप खुद ही नज़र उठा कर एक झलक देख क्यों नहीं लेते?...

"आप भी अगर फिदा न हो उठें तो मेरा नाम भी राजीव नहीं"...

bmw

***राजीव तनेजा***

 

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कितने हैं नुक्कड़ ?

नुक्कड़ कई हैं
नुक्कड़ कई होते हैं
जिस तरफ का हो कोना
वहीं एक नुक्कड़ मिलेगा
इस इसी पर होनी है रिसर्च
या करेगा कोई सर्च
कितने हैं नुक्कड़ ?

एक नुक्कड़ मेरा है
एक नुक्कड़ तेरा है
एक उसका है
एक इसका है
खोजें सब किस किसका है
या पूछें जानें समझें
नारद, ब्लागवाणी, चिट्ठाजगत
या सभी एग्रीगरेटर्स से
ब्लागर्स भी बतलायेंगे
पर हम इसे विवाद नहीं बनायेंगे
जो आना चाहें
स्वागत है
जो जाना चाहें
रूकावट है
हम किसी को
जाने नहीं देंगे।
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