अविनाश वाचस्‍पति तू क्‍यों स्‍वस्‍थ हुआ

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    मेरा ठीक होना रास नहीं आया स्‍वजनों को
    उनकी मनमानी जाती रही
    मनमर्जी चल न सकेगी अब
    बड़ा बेटा, पुत्रवधू, धर्मपत्‍नी को
    आश्‍चर्य की बात है
    कलयुग में ऐसा भी होता है
    वैसे यह अब हत्‍यारा युग है
    कभी भी कुछ भी हो सकता है।
    यह मेरा बड़ा बेटा कहता है
    तो सच ही कहता है
    उसके मन की कौन थाह लेता है
    पीता है, पिलाता है पर मेरे लिए
    मेरी इंडिपेंडेंट कार नहीं लेने देता है
     कहता है बाप तू अस्‍पताल के
    आईसीयूू मेु क्‍यों नहीं मर गया
    तुझे ठीक करके तो बड़ा फजीता है
    रुपये जो मिल रहे थे उन पर
    लग गया पलीता है

    अब मैं खाना छोड़ चुका हूं
    इंसुलिन सिर्फ लगाकर अब
    मुझे मरना है
    नया मैं कुछ नहीं कर सकता
    और न मुझे करना है।

    2 टिप्‍पणियां:

    1. वैसे यह अब हत्‍यारा युग है
      कभी भी कुछ भी हो सकता है।
      सच कहा आपने संबंधों से बचे या बिमारियों से .

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    2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (20-10-2015) को "हमारा " प्यार " वापस दो" (चर्चा अंक-20345) पर भी होगी।
      --
      सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
      --
      चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
      जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
      हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
      सादर...!
      डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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