अविनाश वाचस्‍पति ने कविता का मतलब समझाया है (अविनाश वाचस्‍पति)

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  • एक किलो मीठी मिठाई
    पांच किलो नमकीन कविता
    में से क्‍या खरीदोगे
    कविता पांच सौ किलो
    नमकीन या मीठी
    कैसी भी हो
    बिना पैसे खर्च किए
    मिलेगी तो खरीद लोगे

    पर क्‍या गारंटी कि
    गारंटी इस बात की मांगोगे
    कि खरीदकर भी नहीं पढ़ी तो
    क्‍या बिगाड़ लोगे कवि
    या कविता के सौदागर
    सौदागिरी में काम आने लगी है कविता
    सुनकर मोदी चिल्‍लाया
    कविता के अच्‍छे दिन आए हैं
    बिकने लगी है कविता
    बिना पैसे दिए भी
    बिकने लगी है कविता
    कविता का पति नहीं है
    यह काफी है
    कविता खरीदने के लिए

    कविता को पालने पोसने के लिए
    एक आैर सुंदर कविता
    कविता साथ में मिलेगी
    सुनकर मैं बोला
    एक कविता आज खरीद ली है मैंने
    खरीदने गया था रसमलाई
    खरीदकर लाया हूं कविता
    कविता के बुरे दिनों का
    सौदागर मैं
    कविता के अच्‍छे दिन लाया हूं
    मैं सफल व्‍यापारी हूं
    आभारी हूं कविता जी
    जो आप मुझे मिलीं
    भली लगीं सो खरीद लाया हूं

    खरीदने के लिए
    कविता नहीं कहानी
    उपन्‍यास, नाटक, नाटिका या नौटंकी
    की खरीद व्‍यवसाय में
    ला सकती है तूफान
    पर आज वह काम
    एक कविता ने किया है
    कविता ने खूब बलिदान किया है
    कविता का यह बलिदान
    काले अक्षरों की उपज है
    सोने के अक्षरों में गर लिखी जाती
    कविता गर आज
    तो लगती लाईनें
    और सब लूटकर पूरी कविता
    ले जाते
    लुटेरे कहलाने से भी बाज नहीं आते

    बाज आते हैं धरती पर यह देखकर
    कि कविता नहीं
    आदमी या जानवर की लाश है
    लाश चूहे की भी हो सकती है
    लाश की तलाश
    बाज को महान बनाती है
    उसकी तुलना में सबको
    अपने से नीचे पाती है
    वैसे भी कोई जाबांज ही
    बाज को कर सकता है
    आकर्षित
    उसमें कशिश या खिंचाव पैदा

    यह पैदाईश आदमी की पैदाईश से
    काफी मुश्किल काम है
    संकट की घड़ी में
    घड़े में, ठंडे पानी के मटके में
    मटकना छूटता नहीं है
    मटका इसका फूटता नहीं है
    बाज ही इसका कर सकता है सौदा
    हर बार, हर दफा
    वही बिकता है
    जो कर दिया जाता है दफा
    या लगाई जाए उस पर
    दफा 302
    कविता खरीदना
    मर्डर करने के बराबर है

    कवि मानने लगे हैं
    पाठक भी बचने से सुनने के लिए
    कविता पेलने पर
    दफा 302 की मांग कर बैठते हैं
    आओ एक कविता का सौदा करें
    इसे सुनाएंगे
    लालकिले से
    या तालकटोरा स्‍टेडियम से
    भरपूर इनाम पाएंगे
    कितनी बार कई कवि
    बिना सुनाए
    न सुनाने का पारिश्रमिक
    लेकर चले गए हैं
    पर शर्म उन्‍हें नहीं आती
    इस बात पर आती थी
    उनको हंसी
    अब हंसने की बात
    कोई भी बात नहीं सुहाती है
    हंसना भूल गए हैं
    जब से कविता सुनने का
    किया था फैसला
    फैसले का बना है
    इतना बड़ा फासला
    कि फालसे गर्मी के
    खीरा ककड़ी चुकंदर
    जैसी कीमत भी अधिक लगती है
    फ्री की कविता खरीदना भी

    अब तो सजा लगती है। 

    5 टिप्‍पणियां:

    1. इस कविता पर अपनी प्रतिक्रिया लिखकर चस्‍पां करने वाले को पांच किलो मीठी इमरती का गिफ्ट हैंपर भेजा जा रहा है। कितने ही चौहान पंक्तिबद्ध हैं। वह चूके सो चौहान नहीं बनना चाहते। और बाकी सब महान बनना चाहते हैं।

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    2. यहां इसपर कुछ
      लिखवाना चाह रहे हो
      क्यों हमको फाँसी
      दिलवाना चाह रहे हो
      कानून बना दिया गया है
      इसके लोगों के द्वारा
      पता होने के बाद भी
      क्यों लोगों को
      अंदर करवा रहे हो ?

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    3. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 6-11-2014 को चर्चा मंच पर चर्चा - 1789 में दिया गया है
      आभार

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    4. कविता सारगर्भित है |सच्चाई के इतने करीब है किकुछ कहा नहीं जा सकता |
      मंहंगा खरीदा जा नहीं सकता सस्ते की तलाश सदा रहती है |आज कविता की भी वही स्थिति है |कोई सुनना नहीं चाहता |तब कहना ही पडेगा एक के साथ एक फ्री |

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    5. Steek ekdum ... Par sir main meetha nahi khaati ..... Offer me kuch badlaaw kar dijiye na kripya ... Mera bhi bhala ho jaayega :)

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    आपके आने के लिए धन्यवाद
    लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

     
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