एक मीठा व्यंग्य मिठास है जहां, दीपावली है वहां

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  • दीपावली से आशय दीपों की पंक्ति से नहीं, करेंसी नोटों की गड्डियों से है। गड्डियां सदा से ही मीठी भाती रही हैं। अब मीठी से अर्थ गन्‍ने की गं‍डेरियों से नहीं है। दीपमाला से नहीं है, गंडेरी से नहीं है फिर क्‍या है अर्थ – अर्थ तो है ही और वह है काले नोटों से। नोट लिए और टैक्‍स जमा कर दिया तो दीवाली मन चुकी  दीपावली मनाने के लिए टैक्‍स बचाना बहुत जरूरी है। जहां टैक्‍स बचा     लिया, वहीं दीपावली का मजा मिलना शुरू हो गया। उतना आनंद काले नोटों में नहीं मिलता है जितना टैक्‍स के बचने से  मिलता है। टैक्‍स चाहे इंकम का हो, सेल्‍स का हो या बहुत बड़ी व्‍हेल मछली का हो
    टैक्‍स मतलब सरकार की आंखों के सामने हेर फेर करके धन बचाना है। टैक्‍स बच गया तो समझ लो, मन गई या मान गई दीपावली। दीपावली का मानना बहुत जरूरी है। काले करेंसी नोट जो दरअसल लाल, नीले, हरे हैं पर कहलाते काले ही हैं। काली करेंसी का बचाव सचमुच में लुत्‍फदायी है। जितना लुत्‍फ इसमें आता है उतना लुत्‍फ श्रम से कमाई गई दौलत से भी नहीं आता। चाहे कितने ही श्रमेव जयते के गुण गाए जाएं पर दीपावली मनाने के लिए शर्मेव जयते की बहुत सख्‍त जरूरत है। शर्म की जीत हरेक प्रकार की मेहनत पर विजयी रही है। आदमी का बेशर्म होना बहुत जरूरी है। जहां आदमी बेशर्म हुआ वहीं पर दीपावली का पूरा मजा मिलना शुरू। शर्म को पानी, पानी नहीं किया तो फिर न तो दीपावली का मजा मिलेगा और न कोल्‍ड ड्रिंक, न ज्‍यूस, बीयर अथवा दारू का। इन सबका आनंद आते ही दीपावली का मजा आना शुरू हो जाता है। आप में से भला कौन चाहेगा कि सख्‍त मेहनत करके दीपावली का घनघोर आनंद लूटे। घनघोर आनंद लूटने के लिए बीयर, मिठाई और शराब का होना निहायत ही जरूरी है। दीपावली का असली आनंद भी तब ही मिलता है जब शरीर मिठास झेलने के लिए तैयार रहे। यह क्‍या कि शरीर शुगरग्रस्‍त हो और चल दिए जनाब दीपावली का आनंद लूटने। दीपावली का जो आनंद ढाई सौ ग्राम रबड़ी, बरफी, जलेबी, इमरती में आता है वह आनंद पचास क्विटल कड़वे करेले, नीम तना अथवा पत्‍ती या जामुन के बीजों में कहां ?
    मिठास को जिव्‍हा का चुम्‍मा लेने दीजिए फिर देखिए वह आनंद और किसी तरह की दीपावली में नहीं। आप चाहेंगे कि चुम्‍मा का यह जुम्‍मा जीवन भर इसी तरह जिव्‍हा पर परमानेंट रजिस्‍ट्रीयुक्‍त कब्‍जा कायम कर ले ताकि फिर यम के आगमन का भय भी सदा के लिए दूर हो जाए।
    दीपावली और दीवाला दोनों कर्मपत्‍नी और कर्मपति का पूरी शिद्दत से अहसास कराते हैं कि उनके सामने धर्मपति और धर्मपत्‍नी के अहसास का कोई मोल नहीं रह जाता है। मिठास के आगे भला किसी तरह के दीपावली अथवा दिवाले की क्‍या औकात ?  जो दीपावली की महसूसन मिठासक्रिया में है, वह भला काले धन के करेंसी नोटों में भी नहीं। चाहे बापू गांधी स्‍वयं आकर करेंसी नोटों पर विराजित हो जाएं, वह रहेंगे सदा पराजित ही। इस अविजितता के समक्ष किसी प्रकार की विजय अच्‍छी नहीं लगती और न अच्‍छे दिन अच्‍छे लगते हैं। जय, विजय, जीत, जश्‍न, प्‍यार, प्रीत और लुत्‍फ सरीखे शब्‍द मिठास होने पर ही पसंद किए जाते हैं। अगर यह न हों तो किसी तरह की शुद्ध शहद की चाशनी भी इनके सामने फीकी है अथवा फ्री की है।
    मुफ्त से याद आता है कि माले मुफ्त दिले बेरहम। पर अगर मिठास न हो तो किसी प्रकार का भी माल बेरहमी का शिकार नहीं होता है। रहमपन या हरामपन अथवा हरेपन की गोद में समाने के लिए मिठास अवश्‍यंभावी है। मुझे तो मिठासहीन जीवन भी मौत के समान लगता है जबकि मिठासयुक्‍त जीवन रोगयुक्‍त होते हुए भी भोग का मजा देता है। मिठास मजा देगी और एक रहस्‍य की बात बतलाऊं कि मुझे तो लेख के उस पारिश्रमिक में भी मजा नहीं आता जिससे मैं दस ग्राम मिठास खरीद के न खा सकूं। मुझे तो आप रबड़ी की एक चम्‍मच या फलूदा कुल्‍फी चटा दो और पूरी पुस्‍तक बिना पारिश्रमिक के लिखवा लो। मिठास के बदले में तो मेरी रोज ही दीवाली है जबकि मिठास बिना काली सुर्ख दिवाला वाला निवाला है।
    एक चम्‍मच मिठास के लिए मैं जीवन की सारी दीपावलियां न्‍यौछावर करने के लिए तैयार हूं, लालचमन मतलब मिठास के लाल चमन के लिए मैं जुनून की हद के किसी भी पार जाने के लिए पैदल ही तैयार हूं। मुझे मौत का भय नहीं है परंतु मिठास न मिले तो मैं डरा-डरा सा रहता हूं। मानो मेरे जीवन की अनमोल निधि छीन ली गई हो। मिठास देकर चाहे रोसगुल्‍ला की हो, रबड़ी की, कलाकंद की, जलेबी की, इमरती की मैं अपने प्राण तक न्‍यौछावर करने की शपथ लेता हूं परंतु मिठास छोड़ने के लिए झूठी कसम तक नहीं जा सकता। झूठी कसम खा सकता हूं यदि मुझे नगर, शहर अथवा देश के स्‍वच्‍छता कार्य में लगा दिया जाए पर मिठाई देखने की कौन कहे, सूंघने भी न दी जाए।  जहां मिठास दीपावली है वहां, जहां नहीं मिठास वहां मेरे मन मरना भी मुझे नागवार लगता है। मेरे मिठासयुक्‍त चेहरे पर मक्खियां भिनभिनाती रहें, वह दीपावली की एलईडी लाइट्स के समान हैं। अब तो आप मिठास के लिए मेरे जुनून से परिचित हो गए होंगे ?
    अविनाश वाचस्‍पति

    साहित्‍यकार सदन, 195 पहली मंजिल, सन्‍त नगर, ईस्‍ट ऑफ कैलाश के पास, नई दिल्‍ली 110065 फोन 01141707686

    1 टिप्पणी:

    1. तभी ज्यादा मिठास में इल्ली पड़ जाती हैं ..
      बहुत खूब कहा आपने!

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    आपके आने के लिए धन्यवाद
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