दिल को देखो चेहरा न देखो

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  • मुखोटे, नकाब, जोकर का चेहरा और पुतले एक ही जाति, धर्म इत्‍यादि के अंर्तसंबंधों को जाहिर करते हैं। इनका लुत्फ नए-नए फिल्मी प्रयोग और टीवी चैनल के धारावाहिकों में रोजाना प्रसारित हो रहा है। इन सबको अलग नाम देने के क्‍या कारण रहे होंगे। मुखोटे मुख को ओट कर भी खोटे साबित हो रहे हैं। वैसे इंसान अथवा वस्‍तुएं खोटी होती नहीं हैं पर इंसान उन्‍हें अपने अनैतिक आचरण से खोटा बना देता है। बाजार में खोटे सिक्‍के चलते नहीं हैं, कई बार अप्रत्‍याशित रूप से दौड़ते भी हैं। हालिया पीएम चुनावों में इनका यही रूप पब्लिक ने पहचाना है। खोटे सिक्‍के सिर्फ गहराई की ओर लुढ़क रहे हों और उनके गले में लगाम न कसी जा रही हो, अक्‍सर ऐसा नहीं होता है। जब-जब ऐसा हुआ है तब स्‍पीड ब्रेकर काम आते हैं। अनुभव बतलाताहै कि बहुत अधिक स्‍पीड होने पर ब्रेकर की ऊंचाई बढ़ा दी जाती है अथवा उसमें कम ऊंचाई के दस-बारह स्‍पीड ब्रेकर बना दिए जाते हैं जिससे स्‍पीड को कम कर लिया जाता है। स्‍पीड ब्रेकरों के इस समूह को जिग जैग कहा जाता है जिनसे स्‍पीड स्‍लो हो जाती है। इससे साबित होता है कि खोटी वस्‍तु चल तो सकती है पर इंसान के दिमाग के कारण उसे स्‍पीड नहीं मिल पाती। भारत जुगाड़ प्रधान देश है। वह स्‍पीड कम करने का रास्‍ता निकालता है तो उससे बचने का उपाय भी खोज लेता है। जिग जैग उसी का नतीजा है। पर आश्‍चर्य की बात यह है कि खोटापन दूर करना संभव नहीं हो पाया है।
    मुख को ओटने के ऐसे उपायों का आजकल राजनीति में भरपूर वर्चस्‍व है। जिस भी नेता को देखो, वह मुखोटे पहनकर  पब्लिक के सामने रूबरू होता है। ऐसे सत्‍ता के लालचियों का स्‍वभाव उनकी कथनी एवं करनी में अंतर दिखलाता है। सत्‍ता में खोटापन आजकल खूब तेजी से चल और पल रहा है। इसके फलने और फूलने के कारण सब जानते हैं।
    मुखोटे लगाने के बाद पहचानना मुश्किल हो जाता है। अब तो मॉल इत्‍यादि में भी हंसते-मुस्‍कराते चेहरों के मुखोटे पहनाकर प्रचार किया जाता है। नतीजतन, ऐसे मुखोटे पहनाकर सबको लुभाकर वस्‍तुओं की बिक्री में बढ़ोतरी की जाती है। वैसे यह सच्‍चाई है कि मुखोटे पहनकर मोहित करने की यह कला सरकस के जोकर का विकसित रूप है। इसका अति विकसित रूप मुखोटे पहनकर जुर्म करना है। इसी परिवार का एक ओर व्‍यावहारिक रूप नकाब है। जबकि नकाब के जरिए नाक की आब यानी आबरू नहीं बचाई जा सकती है। हां, हर मुमकिन कोशिश अवश्‍य की जाती है। इसे धारण करके अपनी पहचान छिपाकर बैंक डकैती और हत्‍या जैसी वारदातें की जाती हैं। यह इस प्रकार चेहरे पर ओढ़ लिया जाता है कि इसे ताकत लगाकर ही पहनने वाले की मर्जी के खिलाफ उतारकर इसे पहचानने का प्रयास किया जा सके। इसमें कई बार सफलता मिलती है और अनेक बार असफलता। वैसे ऐसा भी लगता है कि नकाब पहनने के बाद नाक बाहर रह जाती है और उसकी आब इसलिए बच जाती है क्‍योंकि वह सरलता एवं सहजता से सांस ले पाती है। नाक की आबरू के साथ प्राणों का इंधन धन मिलने से शरीर में भी प्राण बने रहते हैं और नकाब दुष्कर्मियों के चंगुल  में  फंसने से बची रहती है। मुखोटों का खोटापन दूर करके इनका देशहित में कैसे उपयोग किया जा सकता है। अच्‍छे दिन लाए जाने के संबंध में इन पर चर्चा और विमर्श जारी है।
    पुतले विरोध स्‍वरूप जलाए जाते हैं। यह आक्रोश महंगाई, पेट्रोल, आलू, प्‍याज, फल इत्‍यादि किसी भी जीव नहीं अपितु निर्जीव का पुतला बनाकर आग  में  झोंककर प्रकट किया जाता है। ऐसा माना जाता है कि बुराई और अपहरण के प्रतीक रावण से पुतला  बनाकर फूंकने का विरोध युग आरंभ हुआ है।
    आभासी मुखोटे झूठ और सच का संगम स्‍थल हैं। इनके खोटे होने की जानकारी पुलिस और लाई टेस्‍ट अथवा अनुभव से ली जा सकती हैं। चेहरे के हाव भाव भी संवेदना के स्‍तर पर पहनने वाले की पहचान जाहिर करने में सक्षम हो गए हैं। इनमें आंखें भी सब रहस्‍य खोल देती हैं। इनमें दिल की प्रभावी भूमिका रहती है। एक फिल्‍मी गीत की पंक्तियां इसे बखूबी बतलाती हैं - दिल को देखो, चेहरा न देखो, चेहरे ने लाखों को लूटा। वैसे लूटने का कार्य आजकल फेसबुक बहुत शिद्दत से कर रहा है। सावधानी हटी, दुर्घटना घटीइस मौके के लिए ही जगह-जगह हाई वे पर लिखा मिलता है। हैरान मत होइएगा अगर यह चेतावनी जल्‍दी ही फेसबुक पर लिखी मिले। फेसबुक प्रबंधन को सुझाव भेज दिया गया है, इस पर कार्यवाही वही कर सकते हैं। हमें तो इन सब युक्तियों से सतर्क रहने की जरूरत है। वरना सब यही गाते मिलेंगे कि सब कुछ लुटा कर होश में आएतो क्‍या आए और क्‍यों आए ? इससे चंगे तो सोशल मीडिया से दूर रहकर ही अच्‍छे थे। बिना सोशल मीडिया के न इतने बुरे दिन और रातें हुआ करती थीं। तब सब ओर समाज में इंसान और उसके दिमाग में सकारात्‍मकता ही हुआ करती थी। आज बुरे दिन और रातों की विसंगति बीते जमाने में प्रभावी नहीं रही है। अब फिर से उसी माहौल की जरूरत है।

    1. -    अविनाश वाचस्‍पति



    4 टिप्‍पणियां:

    1. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

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    2. ब्लॉग बुलेटिन की आज गुरुवार १० जुलाई २०१४ की बुलेटिन -- राम-रहीम के आगे जहाँ और भी हैं – ब्लॉग बुलेटिन -- में आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार!

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