जादू की ‘की’ यानी बोले तो मंकी # मन की मस्‍त आज चुनाव

Posted on
  • by
  • नुक्‍कड़
  • in
  • देशभर में आज लोकसभा चुनाव संपन्‍न हो रहे हैं या बड़े अथवा फिल्‍मी पर्दे पर लड़ाई भिड़ाई का दृश्‍य फिल्‍माया जा रहा है। इस संबंध में प्रचार और प्रसार की भाषा ने यही बतलाया है कि किसी फीचर फिल्‍म के संवाद व घटनाक्रम कान और आंख को नजर आ रहा है। परदे पर तो इन सबके चुनकर आने के बाद जूते,चप्‍पलमाइकघूंसेलातों की जोर आजमायश इन्‍हें यश दिलवाने में अहम् भूमिका दिलाते हैं। इन अनूठे पलों के जीवंत दृश्‍य छोटे परदे पर दिखलाए जा  हैं।  जिनके जाल में  पब्लिक उलझ-उलझ जाती है और अपने वोट को किसी न किसी सपने दिखाने वाले को सौंप आती है। पब्लिक जानती है कि नफरत वाली राजनीति है और वह उसी ताकत के बल पर फिर से सत्‍ता  की गोदी हथियाने को तैयार हैं।
    किसी पार्टी के पद पर आने के लिए फॉर्म भरकर दाखिल दफ्तर के लिए खड़ा होना,मानो कोई शिशु पहली बार कोशिश करके खड़ा हो हो।  टिकट लेने को लाईसेंस लेने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा जा सकता है। वोट अपने पक्ष में डलवाने की कोशिशों को लड़ना और दारू तथा नकदी के वितरण को  भिड़ाई कहकर चुनाव की सारी व्‍याकरण ही बदल दी जाती है। चुनाव की नई व्‍याकरण सचमुच में ही  बहुत मौजूं है।  आप इसी के मजे में इतराते रहते हैं और इतराने के नशे की गिरफ्त में अपना वोट इन्‍हें  सौंप आते हैं। किसी के विजयी होने को कीमतें गिरने के संदर्भ में देखा जाता है। जबकि हारने पर किसी की जमानत जब्‍त नहीं होती और इतने सारे वोट मिलते हैं। सिर्फ कुछ सौहजार या लाख वोटों की कमी को ऐसे माना जाता है,जैसे कुछ सौ पैसों की बात हो रही हो।
    आओ चुनाव में खड़े हो जाएं में अपनी कल्‍पना की ताकत का रुतबा दिखलाकर देखिए। कितना मनोरंजक व मनभावन चित्र सामने ले आते हैं। इसी प्रकार चुनाव लड़ना सोचने विचारने पर दिलखुश कर देता है। मानो चुनाव न होकर डब्‍ल्‍यू डब्‍ल्‍यू एफ की ड्रॉमेटिक कॉमेडी युद्ध चल रहा हो। युद्ध में भी आनंद लूटना इस खेल की विशेषता है। इस प्रकार पूरे चुनाव का व्‍याकरण एक हंसी मजाक बनकर रह गया है। यह हंसी मजाक राजू श्रीवास्‍तव,सुनील पाल, बनवारी झोल जैसे कॉमेडियन्‍स का खिलौना बन गया है। जिनका पेशा  पब्लिक को हंसा हंसाकर नोट कमाना है। आजकल हास्‍य कविता हास्‍यास्‍पद कविता बन गई है जबकि हास्‍यास्‍पद कविता मनोरंजक कॉमेडी प्रदर्शन। चुनाव वह नाव है जो आम पब्लिक का लक बन गया है। जिसने पब्लिक और सरकार को लूट लिया हैवह लकी। जो नहीं लूट पायावह बिना उछलने वाला मंकी। मंकी वह जो अपने मन की की यानी चाबी का मालिक हो। इसलिए आज सभी चाहते हैं कि चुनाव की नाव में विजयी होकर मन की सागर से बाहर निकलकर अपना पूरा का पूरा भुवन सुधार लें। पर इसके लिए काला धन चाहिएजिन चेहरों पर स्याह रंग की बरसात हुईवह दिन में स्‍वप्‍न देखते हैंदिन के अपनी मर्जी के रंग के होते हैं। चाहो तो उन्‍हें काले रंग में देख लोवरना वह रंगीन तो बनायेंगे ही  मस्ती भरी निंदियाई आंखों को। इन्‍हें देखने के लिए धन नहीं खर्च होता पर इनका निर्माणनिर्देशन आपकी कल्‍पना की ताकतरचना की तार्किकतासच्‍चाई की डराने वाली अभिव्‍यक्तियांअनुभूति बनाकर दिखलाती हैं। मंकी वही जो मन की जादू की की यानी चाबी कब्‍जाकर व्‍यस्‍त और मस्‍त रहे। इन दिनों जादू की छड़ी की नहीं, जादू की चाबी का काला जादू उम्‍मीदवारों  के फेस पर मारा जा रहा है। वह करें भी तो क्‍या, क्‍योंकि ऐसा मौका दोबारा तो मिलने से रहा।

    3 टिप्‍पणियां:

    1. कश्मीर से चुनाव लड़ रहे हैं जैसे लग रहे हैं :)

      उत्तर देंहटाएं
      उत्तर
      1. लड़ रहे हैं
        पहलवान नहीं हैं हम
        खाते हैं झापड़
        पापड़ की गूंज
        देती है सुनाई


        जैसे हलवाई की
        मीठी हो मिठाई
        हमें न लड़ना है
        न लड़ना आता है
        सुशील भाई

        हटाएं
    2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा आज बृहस्पतिवार (10-04-2014) को "टूटे पत्तों- सी जिन्‍दगी की कड़ियाँ" (चर्चा मंच-1578) पर भी है!
      --
      सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
      --
      हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
      सादर...!
      डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

      उत्तर देंहटाएं

    आपके आने के लिए धन्यवाद
    लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

     
    Copyright (c) 2009-2012. नुक्कड़ All Rights Reserved | Managed by: Shah Nawaz