तीरथगढ जल प्रपात मुंगाबहार नदी से बनता है, यहाँ शिवरात्रि का मेला भी लगता है। यहाँ पहुंचने पर प्रकृति के मनोरम स्वरुप के दर्शन हुए। काफ़ी उंचाई से गिरने के कारण झरने की कल कल की आवाज दहाड़ में बदल गयी। जहाँ मैं खड़ा था वहाँ से झरने की गहराई लगभग 300 फ़िट है। उपर से झरना देखना खतरनाक भी कई लोग यहां अपने प्राण गंवा चुके हैं। हल्की हल्की बरसात हो रही थी। बूंदा-बांदी के बीच सैलानीयों की भीड़ खूब थी। लोग वहीं पर नव वर्ष मना रहे थे। टूरिस्ट बसों की लाईन लगी हुई थी। हमें रास्ते में हाट बाजार में बेचने के लिए बकरे और मुर्गे ले जाते लोग मिले। कर्ण ने कहा कि अंकल जैसे ही कोई त्यौहार आता होगा तो बकरे और मुर्गे सहम जाते होगें। त्यौहार इंसान मनाता है और शामत इन मूक पशुओं की आ जाती है। मुझे भी सोचने पर मजबूर होना पड़ा। पर बस्तर की यही संस्कृति है, मुर्गा, बकरा और महुआ की दारु के बिना यहाँ त्यौहार और पर्व की कल्पना ही नहीं की जा सकती। इसी तरीके यहां भी नव वर्ष का स्वागत किया जा रहा था।------- आगे पढें
माटरा की चटनी और तीरथगढ जलप्रपात ------------- ललित शर्मा
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