जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है

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  • फ़ज़ल इमाम मल्लिक

    बस एक दिन पहले कलानाथ मिश्र से मुलक़ात हुई थी। क़रीब दो-तीन घंटे उनके साथ रहा था। कवि-मित्र शिवनारायण ने उनसे मुलाक़ात करवाई थी। पटना पहुंचा तो फ़ोन पर शिवनारायण से बात हुई। उन्होंने किसी गोष्ठी की जानकारी दे कर आने का न्योता दिया था। लेकिन घर से निकलते-निकलते देर हे गई। वहां पहुंचा तो गोष्ठी ख़त्म हो चुकी थी और लगभग सारे लोग जा चुके थे। शिवनारायण को वहां अपने पहुंचने की इत्तला फÞोन पर दे चुका था इसलिए वे मेरा इंतज़ार कर रहे थे। शिवनारायण ने ही कलानाथ मिश्र से मुलाक़ात करवाई और फिर मुझे बताया था कि कल इनके पहले कथा संग्रह ‘दो कमरे का मन’ का लोकार्पण अनुग्रह नारायण कालेज सभागार में है। उन्होंने मुझे न्योता भी दिया कि लोकार्पण समारोह में ज़रूर शिरकत करूं। लोकार्पण समारोह में शिरकत के लिए शिवनारायण ने औपचारिकता निभाते हुए आमंत्रण पत्र भी थमा दिया। इतना कहने-सुनने के बाद उन्होंने कहा कि हम लोग पुस्तक मेला जा रहे हैं, आप भी चलें।
    एक दिन पहले ही पुस्तक मेला श्ुरू हुआ था। मुझे थोड़ी देर बाद शंकर आज़ाद से मिलना था। लेकिन उन्हें आने में थोड़ी देर थी और मेरे लिए इतना समय काफ़ी था। फिर यह ख़याल भी आया कि पुस्तक मेले में कुछ लोगों से इसी बहाने मुलक़ात भी हो जाएगी। वहां से हम अलग-अलग गाड़ियों में गांधी मैदान पहुंचे। उस शाम वहां पत्रकारिता पर सेमिनार हो रहा था। उसी कार्यक्रम में अनिल विभाकर से मुलाकाÞत हुई। लंबे समय बाद उनसे मिल कर अच्छा लगा। समारोह ख़त्म होने पर अनिल विभाकर के साथ बातचीत कर ही रहा था कि पत्रकारिता के कुछ छात्रों ने हमें अपने-अपने सवालों के साथ घेर लिया। वक्ताओं की बजाय उनका हमसे सवाल-जवाब करना कुछ अटपटा ज़रूर लगा लेकिन उनके सवालों को हमने गंभीरता से लिया। पत्रकारिता को लेकर उनकी चिंता वाजिब लगी। हम दोनों ने उनके सवालों का जवाब दिया। अपने सवालों का जवाब पाकर उन्हें तसल्ली भी हुई। वे अख़बारों में लिखना चाहते थे। उन्हें बताया कि आप लोग फ़िलहाल अख़बारों में फ़ीचर लिखें। हमने भी इसी तरह से अख़बारी सफ़र शुरू किया था। दस-पंद्रह लड़कों का यह समूह पत्रकारिता में आई गिरावट को लेकर तो चिंता जता ही रहा था, बिहार में पत्रकारिता के स्तर पर भी सवाल खड़े कर रहा था। उनका कहना था कि नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार में पत्रकारिता ख़त्म हो गई है और अख़बारों में ‘नीतीश चालीसा’ ही अब ज्Þयादा होने लगी है। भविष्य के उन युवा पत्रकारों की चिंता सचमुच डराने वाली थी। क्योंकि बीते पांच-सात साल से बिहार में पत्रकारिता की नई पाठशाला खोल रखी है नीतीश कुमार ने और इस पाठशाला से दीक्षित पत्रकार वही लिखता है जो नीतीश चाहते हैं। अख़बारों के ज़रिए बिहार में सुशासन की एक चमकीली दुनिया बाहर-भीतर दोनों तरफ़ से ही लोगों को आकर्षित करती है। विपक्ष और सरकार विरोधी ख़बरों को अख़बारों में जगह नहीं के बराबर ही मिल पाती हैं। पत्रकारिता के उन छात्रों की चिंता इसी बात को लेकर ही थी। उनके सवालों का जवाब देने के बाद मैं शिवनारायण और कलानाथ मिश्र को खोजने लगा।
    कलानाथ मिश्र तो सामने ही दिख गए लेकिन शिवनारायण इस बीच कहीं निकल गए थे। कलानाथ मिश्र को बेली रोड होते हुए कहीं जाना था। मुझे भी शंकर आजाद से मिलने बेली रोड ही जाना था इसलिए मैंने उनसे साथ ले चलने को कहा तो वे राज़ी हो गए। लेकिन जाने से पहले शिवनारायण से मिलना ज्Þारूरी था, इसलिए उनका इंतज़ार हम करते रहे। वहीं सम्मेलन स्थल के बाहर अगले दिन होने वाले कार्यक्रमों का ब्योरा था। दूसरे दिन सम्मेलन में मेरे कई मित्र हिस्सा लेने वाले थे। रायपुर से गिरीश पंकज, महेंद्र ठाकुर, ग़ाज़ियाबाद से सुभाषचंदर और जयपुर से फ़ारूक आफ़रिदी के अलावा हरीश नवल और प्रेम जनमेजय भी आने वाले थे। दिल्ली में इन लोगों से कम ही मुलक़ात होती है, अपने शहर में अपने मित्रों के आने की सूचना से मुझे सकून तो हुआ ही, मेरे भीतर एक सुख भी पसर गया। इनमें से कइयों से सालों बाद मुलाक़ात होगी। दिल्ली में रहते हुए भी कहां किसी से ढंग से मिलना-जुलना हो पाता है। हर कोई अपने-अपने ग़मे-रोज़गार में मुब्तला। न हम ख़ाली न वे ख़ाली। कथाकार बलराम अग्रवाल की बात याद आ गई। हाल ही में उनका फ़ोन आया था। बक़रीद पर बधाई देते हुए उन्होंने कहा कि अभी-अभी सुभाष नीरव से पंजाब के एक कार्यक्रम में मुलाक़ात हुई। लगता है कि हम दोनों भी अब रायपुर में ही फिर मिलेंगे। दिल्ली में रहते हुए अरसा बीत गया है लेकिन सुभाष नीरव ही क्या बलराम अग्रवाल से भी मुलाक़ात हुए अरसा बीत गया है। वह तो भला हो फ़ोन का जिसकी वजह से हम बीच-बीच में बतियाते रहते हैं। तीन साल पहले बलराम अग्रवाल से रायपुर में हुई मिलना हुआ था। ‘सृजनगाथा’ के लघुकथा सम्मेलन में। उस दिन उसी बात का ज़िक्र बलराम कर रहे थे। पटना में दिल्ली और दूसरी जगहों से आरहे लेखकों की सूची में कई परिचितों का नाम देख कर बलराम मुझे याद आए।
    शिवनारायण अब तक नहीं आए थे। हमें देर हो रही थी। तब कलानाथ भाई ने शिवनारायण को फ़ोन किया तो पता चला कि वे एक स्टाल पर जमे हैं। हम स्टाल की तलाश में घूमने लगे। चलते हुए ही मैंने कलानाथ मिश्र से मज़ाक़ में कहा- ‘प्रोफेसरों के साथ यही दिक्ÞकÞत है। उन्हें याद ही नहीं रहता कि दूसरे लोग भी उनके साथ हैं।’ कहने को तो मैं कह गया लेकिन बाद में कलनाथ भाई का ख़याल आया। उनसे पूछा आप कहां कार्यरत हैं तो उन्होंने बताया कि मैं भी इत्तफ़ाक़ से प्रोफ़ेसर ही हूं। मैं थोड़ा असहज ज़रूर हुआ, लेकिन शिवनारायण से लंबे समय से जुड़ाव था इसलिए सहज होने में देर नहीं लगी। उन्हों खोजते हुए हम लोग स्टाल पर पहुंचे तो वहां चाय का दौर चल रहा था। मैंने छूटते ही फिर ‘प्रोफ़ेसर वाली’ अपनी बात दोहराई। शिवनारायण हंसने लगे और हम चाय पी कर वहां से निकल गए। रास्ते में कलानाथ मिश्र से ढेरों बातें हुईं। साहित्य से लेकर पत्रकारिता पर उनसे बात होती रही। तब मुझे पता चला था कि प्रोफ़ेसरी से पहले कलानाथ मिश्र पत्रकारिता के दश्त में भी ख़ूब सैयाही कर चुके हैं। थोड़ी देर बाद ही मेरी मंज़िल आ गई तो मैंने उनसे विदा ली। उन्होंने चलते-चलते याद दिलाया- कल आप कार्यक्रम में ज़रूर आएं। मैंने उनसे वादा किया। यों भी दूसरे दिन पटना में मुझे दो लोगों से मिलना ही था। इन दो में पहला नाम वरिष्ठ साहित्यकार कुमार विमल का था। क़रीब सात-आठ महीने से वे लगातार संपर्क में थे और जिस स्नेह से वे बतियाते थे, उसने मुझे उनका क़याल बना लिया था। ईद में घर गया था तभी उनसे मिलने का कार्यक्रम था। लेकिन तब बहुत जल्दी में दिल्ली लौटना हुआ और मैं उनसे मिल नहीं पाया था। इसका मलाल काफी सालता रहा था। इसलिए इसबार तय कर आया था कि उनसे ज़रूर मुलाक़ात करूंगा। गांव से फ़ोन पर उनसे बात भी हो चुकी थी और वे बेतरह ख़ुश हुए थे यह जान कर कि मैं बिहार आया हुआ हूं और उनसे मुलाक़ात के लिए उनके घर आऊंगा। दूसरे शख़्स थे, कवि-गीतकार सत्यनारायण। उनसे मिले भी काफ़ी अरसा हो गया था। बीच में वे बीमार भी रहे थे और दिल का आपरेशन करवा कर लौटे थे। इसलिए मिलना ज़रूरी था।
    दूसरे दिन विमोचन के कार्यक्रम में देर से पहुंचा। समारोह की अध्यक्षता बिहार के पुर्व मुख्यमंत्री जगन्नाथ मिश्र कर रहे थे। गिरीश पंकज, सुभाषचंदर, महेंद्र ठाुकर, हरीश नवल, प्रेम जनमेजय को देख कर अच्छा लगा। पुराने मित्र-पत्रकार ध्रुव कुमार सामने थे। ध्रुव ने मेरे लिए जगह ख़ाली की। देख कर अच्छा लगा कि सभागार भरा हुआ था। सामने ही कवियत्री डाक्टर कुमारी मनीषा भी थीं। उनसे दो साल पहले खगड़िया के समारोह में मिलना हुआ था। वे अच्छी कविताएं लिखती हैं। उन्होंने खगड़िया में अपनी कविताओं का पाठ भी किया था। हम दोनों ने बिना बोले एक-दूसरे का अभिवादन किया। उनके अलावा कई और मित्रों को देख कर अच्छा लगा। संचालन शिवनारयण कर रहे थे। मैं पहुंचा तो पुस्तक पर कवि-मित्र निविड़ शिवपुत्र बोल रहे थे। निविड़ को सुनना अच्छा लगा। उसने पुस्तक पर बहुत अच्छी और सधी प्रतिक्रिया दी। प्रेम जनमेजय की वक्तव्य के दौरान ही शिवनारायण की नज़र मुझ पर पड़ी और उन्होंने मुझे इशारे से बताया कि मुझे भी बोलना है। पहले तो मैं झिझका। किताब मैंने पढ़ी नहीं थी। इसलिए उस पर क्या कुछ बोलूंगा। इसलिए पहले मैंने मना किया। लेकिन शिवनारायण ने जब दोबारा कहा तो मैं राज़ी हो गया। मुझे क्या कुछ बोलना है यह मैंने तय कर लिया था। कल रात से ही पुस्तक को लेकर जो बात मुझे बेतरह हॉण्ट कर रही थी, उसे लोगों के सामने रखने का ख़याल अचानक मुझे आया ता। कलानाथ मिश्र ने पुस्तक का नाम ‘दो कमरे का मन’ रखा है और इस नाम से मुझे एक अलग तरह का लगाव हो गया था। इसलिए शिवनारायण ने जब मुझे बुलाया तो मैंने इसी को केंद्र में रख कर अपनी बात कही। मैंने कहा कि दिल्ली में पिछले सात-आठ साल से रहना हो रहा है। वहां रहते हुए इस बात का शिद्दत से अहसास हुआ कि साहित्य और दुनियादारी दोनों ही जगह दिल्ली वालों ने अब अपने मन में एक भी कमरा नहीं रख छोड़ा है। मुझे ख़ुशी इस बात की है कि मेरे शहर और मेरे प्रदेश के कथाकार ने आज भी मन में कम से कम दो कमरे छोड़ रखे हैं। और सच तो यह भी है कि वह बिहार ही है जो देश को दुनियादारी भी सिखाती है और साहित्य में मन में कमरे बनाने की सीख भी देता है। मेरी यह बात वहां मौजूद श्रोताओं को पसंद तो आईं लेकिन दिल्ली वालों को शायद मेरी यह साफ़गोई अच्छी नहीं लगी। मेरे बाद बोलने आए हरीश नवल ने इसका इज़हार भी किया लेकिन अपने संबोधन में जब उन्होंने महानगर की त्रासदी का ज़िक्र भी किया तो मेरी बात की तसदीक़ भी एक तरह से उन्होंने कर दी। हालांकि उन्होंने अपने संबोधन में ‘मुख़ालफ़त’ के लिए जब ‘ख़िलाफ़त’ का इस्तेमाल किया तो मुझे बेतरह अटपटा लगा। पत्रकारिता की चलताऊ बातचीत में ‘ख़िलाफ़त’ का इस्तेमाल ‘विरोध’ के लिए ख़ूब किया जा रहा है लेकिन हिंदी का कोई विद्वान और प्रोफ़ेसर अगर विरोध के लिए खिलाफ़त का इस्तेमाल करे तो यह शर्मनाक है। कम से कम उन जैसे लोगों को तो ‘ख़िलाफ़त’ और ‘मुख़ालफ़त’ का मतलब भी आना चाहिए और फ़र्क़ भी। फिर अगर हिंदी में मुख़ालफ़त के लिए विरोध शब्द है तो क्या ज़रूरत है उर्दू की टांग तोड़ने की। लेकिन हिंदी में ऐसा हो रहा है और हरीश नवल सरीखे लेखक भी उसका इस्तेमाल बिना मतलब जाने-समझे कर रहे हैं। यह बात मेरे जैसे कम समझ वाले के लिए चिंता की बात है।
    बहरहाल कार्यक्रम ख़त्म हुआ। जगन्नाथ मिश्र से लंबे समय बाद मिलना हुआ था। वह तपाक से मिले और कहा कि तुम्हें पहचान लिया है। पटना आते हो ते मिलते क्यों नहीं हो। सुभाष, गिरीश पंकज और महेंद्र ठाकुर लहक कर मिले। लेकिन मेरी संक्षिप्त टिप्पणी पर दिल्ली वाले इस बुरी तरह आहत थे कि उन्होंने ढंग से बातचीत तक नहीं की। यानी सचमुच दिल्ली के साहित्य-समाज अपने मन के कमरे को बंद कर रखा था। जहां अब न तो कोई ताज़ी हवा आती है और न ही जिसे अपनी आलोचना सुनने की ताब। कलानथ मिश्र की किताब उनके मन में कोई कमरा बना पाए, ऐसा लगता तो नहीं लेकिन उम्मीद तो की ही जा सकती है। वैसे इस मौक़े पर मुझे मलिकज़ादा मंज़ूर अहमद का एक शेर याद आ रहा है-
    चेहरे पर सारे शह्र का गर्दो-मलाल है
    जो दिल का हाल है वही दिल्ली का हाल है।






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