शहनाई के शहनशाह और बनरास

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  • फ़ज़ल इमाम मल्लिक

    प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खां की ज़िन्दगी हिंदुस्तानी संस्कृति की इबादत की तरह रही है। बिस्मिल्ला ख़ां बनारस के थे और बनारस बिस्मिल्ला ख़ां का। बनारस की गलियों, घाटों, चौक-चौराहों से शहनाई के इस उस्ताद का जुड़ाव तो रहा ही, बिस्मिल्ला ख़ां ने बनारस के घाटों, मंदिरों और महफ़िलों में अपनी शहनाई वादन से लोगों को क़ायल किया। शहनाई के इस सम्राट पर जूही सिन्हा की लिखी किताब ‘बिस्मिल्ला ख़ां द मेस्ट्रो फ्राम बनारस’ से इस शहर और यहां से जुड़ी सभ्यता, संस्कृति और संगीत की विस्तृत जानकारी मिलती है। लेखन के साथ-साथ फ़िल्मों के निर्माण से जुड़ी इस लेखिका ने बनारस की गलियों को भी हमारे सामने रखा है, घाटों से टकराते गंगा के पानी की लयकारी भी किताब में है, जीवन के रंग और उमंग भी हैं, मिठाइयों का ज़िक्र भी है और संगीत की उन महफ़िलों की चर्चा भी है जो बनारस की तहज़ीब से कहीं गहरे जुड़ी रही हैं। जूही सिन्हा ने बच्चों के लिए भी लिखा और बड़ों के लिए भी लेकिन संस्कृति उनका ख़ास विषय रहा है। चार साल पहले राजस्थान पर आई उनकी किताब भी ख़ासी चर्चित रही थी।
    अपनी इस किताब ‘बिस्मिल्ला ख़ां द मेस्ट्रो फ्राम बनारस’ में जूही सिन्हा ने बीसवीं सदी के बनारस का ज़िक्र बेहतर ढंग से किया है। यहां की संस्कृति की चित्रमय प्रस्तुति के ज़रिए उन्होंने जीवन से जुड़े ठेठ बनारसी ठाठ को पाठकों के सामने परोसा है। शुरुआती अध्याय में जूही सिन्हा बनारस के गली-मोहल्लों, घाटों-नावों, मंदिरों-महफ़िलों, दुकानों-मिठाइयों के ज़ायकÞों से जोड़ती हैं और फिर धीरे-धीरे वे हमें बनारस की संगीत की दुनिया में ले जाती हैं। संगीत की उस दुनिया से वे हमें जोड़ती हैं, जिस दुनिया में उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां पले-बढ़े, सीखा-सिखाया और शहनाई को बुलंदियों पर ले गए। बिस्मिल्ला ख़ां के जीवन के क्रमवार विकास को उन्होंने सामने रखा है। डुमरांव जैसे छोटी-सी जगह से निकले उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां ने बनारस जैसे शहर में अपने को ढाला और फिर शहनाई को बुलंदियों पर पहुंचाया। शागिर्द से उस्ताद बनने तक के सफ़र में उन्होंने कई पड़ाव तय किए। एक अदना से कलाकार से उस्ताद बनने के दौरान उन्होंने ढेरों उतार-चढ़ाव देखे। शुरुआती दौर में बिस्मिल्ला ख़ां किसी कार्यक्रम के लिए पांच रुपए लेते थे। लेकिन जैसे-जैसे उन्होंने सुरों को साधा और शहनाई वादन में महारत हासिल कर शोहरत की बुलंदियों को छुआ तो एक कार्यक्रम के लिए पांच से दस लाख रुपए तक उन्हें मिले। इस सफ़र के दौरान उस्ताद को क्या कुछ झेलना और सहना पड़ा है, जूही सिन्हा सलीक़े से इनका उल्लेख करती हैं।
    लेकिन किताब में सिर्फÞ बिस्मिल्ला ख़ां ही नहीं है। पुस्तक के ‘द म्युजिकल लेगैसी’ खंड में बनारस की संगीत परंपरा का विस्तार से ज़िक्र किया गया है। बनारस की दाल मंडी की गायिकाओं में से गौहर जान का उल्लेख उन्होंने ख़ासतौर से किया है। गौहर जान के जीवन से जुड़ी यादों को उन्होंने साझा करते हुए लिखा है कि बिस्मिल्ला ख़ां बनारस की ठुमरी गायिकाओं से प्रभावित तो थे ही, गुरु-शिष्य परंपरा को लेकर भी उनके मन में बेतरह सम्मान था और इसका निर्वाह वे हमेशा करते रहे।
    जूही सिन्हा सुबह-ए-बनारस का उल्लेख करते हुए कहती हैं कि ख़ां साहब कहा करते थे कि दो-तीन बजे भोर में ही शहर जाग जाया करता था और हम सब भोर में मिठाई की दुकान पर जाकर बालूशाही और गुलाब जामुन के साथ ही हलवा भी खाया करते थे। इस किताब में पंडित किशन महाराज, पंडित जगदीप और मौजुद्दीन ख़ान भी जगह-जगह अपनी पूरी सांगीतिक परंपरा के साथ मौजूद हैं। बनारस की सांगीतिक परंपरा में यों भी एक ही मज़हब को लोग मानते हैं, चाहे वह औरत हो या मर्द वह सिफर्Þ संगीत और कला को ही अपना मज़हब मानते हैं। उस्ताद बिस्मिल्ला ख़ां भी ऐसे ही संगीतकार ते जिन्होंने हमेशा संगीत को ही अपना मज़हब माना। बिस्मिल्ला ख़ां उन कलाकारों में शामिल है, जिन्होंने संगीत की इबादत की और संगीत के प्रति उनकी दीवानगी का आलम यह था कि जब उनका मन नहीं होता था उस दिन वह कह देते थे, ‘आज शहनाई बजाने का मन नहीं कर रहा है।’ यह किताब खÞां साहब की जिÞंदगी, बनारस शहर और उस शहर की संस्कृति को बेहतर ढंग से हमारे सामने रखता है। किताब की सबसे बड़ी ख़ूबी इसकी भाषा है। जूही सिन्हा ने सरल और सहज भाषा में पुस्तक लिखी है जो अंग्रेजÞी के कम जानकारों की समझ में भी आसानी से आ सकती है। पुस्तक में बनारस और बिस्मिल्ला ख़ां के अलावा दूसरे कलाकारों के कुछ दुर्लभ चित्र भी हैं जो किताब के महत्त्व को और भी बढ़ाते हैं।

    बिस्मिल्ला खां द मेस्ट्रो फ्राम बनारस (जीवन वृतांत), लेखक: जूही सिन्हा, प्रकाशक: नियोगी बुक्स, डी-78, ओखला इंडस्ट्रियल एरिया, फेज-1, नई दिल्ली-110020, मूल्य: 795





    2 टिप्‍पणियां:

    1. badi hi sundar baat batayi sach aapki baatein padhkar kisi ka bhi mann is kitab ko padhne ko wyakul ho uthega par aur behtar aur jan lokpriy hota agar ye apni bhartiy bhasha HINDI me hota to wo bhi padh pate jo aaj padh pa rahe hain aur wo bhi jo is pustak ko padhne se wanchit rah gaye hain.

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    2. ustad ko sab sunte hain lekin unke andaj men BISMILLAH karna sikhana bhi nahin chahate

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    आपके आने के लिए धन्यवाद
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