अन्ना बने दूसरे गांधी, गांधी परिवार ही मुश्किल में

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  • सुनील वाणी
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  • सुनील (7827829555)

    नवरात्र में उपवास रखकर लोग अपनी मनोकामना को पूरी कर रहे हैं तो दूसरी तरफ समाज सेवी अन्ना हजारे ने आमरण अनशन कर देश को भ्रष्टाचार मुक्त कराने के अपने संकल्प पर अडिग है और उनकी यही मनोकामना है कि देश को भ्रष्टाचार और भ्रष्टाचारियों से मुक्त कराया जाए। पूरे देश के लिए लड़ाई लड़ने वाले यह शख्स आज देश के दूसरा गांधी बन गए हैं। जिन्होंने गांधी को नहीं देखा वे अन्ना को देखकर यह अंदाजा लगा सकते हैं कि महात्मा गाधी ने किस तरह अहिंसा, आमरण अनशन और असहयोग आंदोलन का सहारा लेकर अंग्रेजों के नाक में दम कर दिया था और अंग्रेजों से देश को मुक्ति दिलाई थी। उसी सदगी, ईमानदारी और नेकी के रास्ते पर चलते हुए यह अन्ना हजारे देश को भ्रष्टाचार से मुक्त कराना चाहते हैं। उस समय लड़ाई पराए लोगों से थी लेकिन इस बार घर की लड़ाई है और घर के लोगों से ही है और इस कारण यह महायुद्ध पहले से कहीं ज्यादा मुश्किल और महत्वपूर्ण है। हालांकि उनका यह महायुद्ध रंग लाने लगा है और देश की करोड़ों जनता के साथ-साथ, बुद्धिजीवी वर्ग, बॉलीवुड कलाकार, छात्र और युवा उनका भरपूर सहयोग कर रहे हैं। इसी कारण वर्तमान सरकार भी पशोपेश में पड़ गई है। अपनी नींव हिलता देख खुद गांधी परिवार की वर्तमान मुखिया सोनिया गांधी को आगे आने पड़ा। सरकार को ज्यादा फजीहत न झेलनी पड़े, इस कारण उनकी कई मांगों को मान भी लिया गया है। वहीं शरद पवार ने जीओएम से पहले ही अपने पांव पीछे खींच लिए हैं, क्योंकि वे जानते है कि मेरा दामन कितना पाक है और भ्रष्टाचार में उनका कौन सा नंबर है। खैर, भ्रष्टाचार को लेकर अगर येदि नेताओं में इस तरह की गिनती की जाए तो यह बताना मुश्किल हो जाएगा कि पहले नंबर पर किस नेता को रखा जाए। सबसे महत्वूपर्ण यह है कि इस आंदोलन का आगाज तो हो चुका है लेकिन इसका अंजाम देश की कमजोर कड़ी और विकास में बाधक बन रहे रहे भ्रष्टाचार से मुक्ति से ही होना चाहिए। यह बहुत अच्छा अवसर है जब पूरी जनता खासकर युवाओं को एक बार फिर से मौका मिला है कि वो खुद को खुदीराम बोस, भगत सिंह, सुखदेव और आजाद साबित करें और भ्रष्टाचार जैसे दैत्य से देश को मुक्त कराएं। जय हिंद!

    5 टिप्‍पणियां:

    1. हम अन्ना के साथ हैं
      हम ईमानदारी से परीक्षा देंगे
      ईमानदारी से अधिकारी बनेंगे
      और वोट का सही प्रयोग करके इमानदार नेताओं को ही लायेंगे
      ...अन्ना आप अकेले नहीं हैं...
      हम बदलेंगे खुद को .....देश के लिए ...आपके लिए ...
      जहाँ भ्रस्ताचार होगा हम विरोध करेंगे ...
      और इसकी शुरुआत मैंने कर दी है सच बोलने के साथ .....

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    2. पुराने पेड़ को सीधा करना बहुत मुश्किल जरुर है लेकिन उसका भी हल मुमकिन है. बस जब एक महा क्रांति का बिगुल बज ही गया है तो अब तो यही आरजू है ये कारवां बढ़ता ही चला जाए और यह अभियान एक जनक्रांति बन भ्रस्टाचार को ख़त्म कर ही दम लें . अब बहुत हो चली. सब देख चुकी जनता. अब तो सबके सामने शासन-प्रशासन में बैठे बड़ी बड़ी ढींगे हाकने वालों के नाकों चने चबुवाकर जनता और मीडिया को मिलकर लडाई जीतकर ही दम लेना है. अब जनता को बेवक़ूफ़ बनाकर वोट की राजनीति कर सत्ता हासिल कर सिर्फ घोटाले कर अपना घर भरने वाले राजनेता और ऊँचे सरकारी ओहदों पर बैठने वाले जनता की तरफ मुहं फेरने वाले अपनी गोटियाँ बिठाकर पैसा बनाने वालों को उनका असली चेहरा देखने का वक्त आ गया है. आम जनता इस महाक्रान्ति में सक्रिय योगदान देने और मीडिया को जनता की आवाज बुलंद कर साबित करने का की जनता जब जागती है तो क्या कर सकती हैं...

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    3. कल आ रहे हैं वे नुक्‍कड़ के द्वारे
      आप भी आइये
      शामिल हो जाइये
      पर पोस्‍ट जरूर और
      तुरंत लगाइये।

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    4. समाज में व्याप्त अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार शोषण का सामना करते -करते एक दिन वह स्थिति आ जाती है जब अन्दर सोया पुरुषार्थ भी जागृत हो उठता है. नहीं ...अब ...और नहीं...., बहुत दिन सह लिया..बहुत ज्यादा सह लिया..अब और नहीं सहूंगा...मिटा डालूँगा इसे....अन्याय का यह अस्वीकार बोध मानव मन को दो विकल्प उपलब्ध कराता है - प्रथम, हम अन्याय और शोषण की ओर से पूरी तरह विरक्त हो जाय, यह मान लें कि हमारे चरों ओर जो कुछ घटित हो रहा है हम उसके सहभागी नहीं है. हम कुछ नहीं कर सकते. अतएव हमारा कोई दायित्व नहीं. द्वितीय, यह स्थिति अन्याय, शोषण और भ्रष्टाचार से सीधे प्रतिकार और टकराव का है. पहली स्थिति पलायनवादिता है, विवशता और पराधीनता की स्थिति है. दूसरी स्थिति अन्याय से आमने - सामने जूझने की स्थिति है जहां जीवन का मोह निरर्थक हो जाता है. और मृत्यु का वरण पहली अनिवार्य शर्त बन जाती है.जहां मृत्यु के अनजाने भय में भी दायित्व का सौन्दर्य और विवेक का प्रकाश दिखाई देने लगता है. मन बोल ही उठता है - 'पहिला मरण कबूल कर जीवन की छड़ आस', यहाँ मृत्यु की कोई चिंता नहीं और जीवन से कोई मोह भी नहीं. बिना तत्त्वज्ञान के यह होता भी नहीं, वह शक्ति -साहस और ऊर्जा तभी मिलती है जब व्यक्ति में ज्ञान और दायित्व का, कर्त्तव्यबोध का उदय होता है. जब ऐसा होता है तो वह अन्याय और भ्रष्टाचार को सहने से इनकार कर देता है. यह स्थिति पहले भी कई बार आयी है ..और आज भी आ उपस्थित हुई है....

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