सीबीएसई की खामोशी से शिक्षा माफिया की पौ बारह (3)

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    सीबीएसई पर हावी शिक्षा माफिया (3)

    टीचर्स निभा रहे हैं सिक्यूरिटी गार्ड की भूमिका?

     
    सिवनी। जिला मुख्यालय सिवनी में इसाई मिशनरी द्वारा संचालित किए जाने वाले सेंट फ्रांसिस स्कूल के नए आधे अधूरे भवन का पहुंच मार्ग पूरी तरह कीचड से सन गया है, जिससे इसमें कभी आटो फंस जाते हैं तो कभी बच्चों के जूते मोजे और गणवेश कीचड से सन जाते हैं. अभिभावकों की परेशानी यह है कि उन्हें रोजाना अपने लाडले के जूते मोजों और गणवेश की सफाई अलग से करना पड रहा है. इसके अलावा यहां कार्यरत अध्यापक जिन्हें ब्रितानी उपनिवेशक सभ्यता के हिसाब से उनके नाम या सरनेम से फलां टीचर के नाम से पुकारा जाता है, वे भी अपने मूल काम से इतर सिक्यूरिटी गार्ड की भूमिका में नजर आ रहे हैं.
     
    बताया जाता है कि मध्य प्रदेश के शिक्षा बोर्ड से ज्यादा क्रेज सीबीएसई शिक्षा बोर्ड का है, जिसके तहत किराना दुकानों के मानिंद जगह जगह खुले शिक्षण संस्थान अपने आप को सीबीएसई से संबद्ध करवाना चाहते हैं. सीबीएसई पाठयक्रम में मोटी फीस मिलती है, जिसके चलते ज्यादा धन कमाने की चाह में शिक्षण संस्थाओं के संचालकों द्वारा शिक्षा जैसे पवित्र पेशे को बदनाम किया जा रहा है. सबसे अधिक आश्चर्य का विषय तो यह है कि यह सब देखने सुनने के बाद भी प्रशासन के अधिकारी, राजनैतिक दल के नुमाईंदे सभी चुप्पी साधे बैठे हैं.
     
    मध्य प्रदेश जोन के सीबीएसई अजमेर कार्यालय के सूत्रों का कहना है कि सेंट फ्रांसिस स्कूल सिवनी की मान्यता के संबंध में प्रकरण लंबित तो है, इसमें राज्य शासन की अनुशंसा ही काफी विलंब से प्राप्त हुई है. राज्य शासन के शिक्षा विभाग के सूत्रों का कहना है कि इस शाला के प्रकरण की अनुशंसा करने में अधिकारी टालामटोल इसलिए कर रहे थे क्योंकि शाला ने वांछित आहर्तांएं पूरी करने में बार बार हीला हवाला किया जा रहा था. राजधानी भोपाल स्थित राज्य सचिवालय वल्लभ भवन और गौतम नगर स्थित राज्य शिक्षा संचालनालय के सूत्रों की मानें तो वहां यह चर्चा तक आम है कि इस शाला ने राज्य शासन की अनुशंसा करवाने के लिए छरू अंको में राशि तक खर्च की है. इन बातों में सच्चाई कितनी है यह बात या तो शाला प्रबंधन जानता है या फिर राज्य शासन के अधिकारी, पर यह सत्य है कि काफी मशक्कत के उपरांत यह प्रकरण राज्य शासन से अनुमोदित हो सका था.

    सूत्रों ने बताया कि अप्रेल माह में शाला प्रबंधन को सूचित किया गया था कि सीबीएसई का निरीक्षण दल जुलाई माह में किसी भी तारीख को वहां जाकर निरीक्षण कर सकता है, अतरू अन्य औपचारिकताओं के साथ भवन संबंधी औपचारिकताएं पूरी कर ली जाएं. हडबडी में शाला प्रबंधन द्वारा इस भवन का काम तेज गति से आरंभ करवा दिया गया. २१ जून से आरंभ हुए शैक्षणिक सत्र को बहुत ही हडबडी में आरंभ करवाया गया था. इसके उपरांत यहां चार दिन का अवकाश भी घोषित कर दिया गया था. शहर से लगभग सात किलोमीटर दूर स्थित इस आधे अधूरे शाला भवन में आज भी अनेक खामियां साफ तौर पर देखी जा सकती हैं. बरसात में इस भवन के दक्षिणी दिशा में बहने वाले नाले के पास बाउंड्रीवाल का निर्माण किए बिना ही यहां स्कूल आरंभ करवा दिया गया था. बाद में जब इस बात को प्रमुखता से उजागर किया तब जाकर शाला प्रबंधन चेता और बाउंड्रीवाल का काम आरंभ करवाया.

    इसके अलावा आवागमन के पर्याप्त साधन न होना इस शाला की सबसे बडी खामी बनकर सामने आई है. आलम यह है कि शाला में अध्ययनरत विद्यार्थी सुबह छरू बजे घरों से निकलते हैं और शाम चार बजे घर लौटने पर मजबूर हैं. यहां उल्लेखनीय तथ्य यह है कि शाला में पढाने वाले टीचर्स इन दिनों सिक्यूरिटी गार्ड की भूमिका में नजर आ रहे हैं. जब तक बच्चों के लिए आवागमन के साधन नहीं आ जाते हैं टीचर्स को बच्चों की देखरेख के लिए वहां रूकने पर मजबूर होना पड रहा है. टीचर्स जो अलहसुब्बह छरू बजे घरों से निकलते हैं वे शाम ढलते ही घर लौट पाते हैं और निढाल होकर गिर पडते हैं, इससे विद्यार्थी और टीचर्स के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पडे बिना नहीं है. लगता है शाला प्रबंधन द्वारा सिक्यूरिटी गार्ड के खाते की राशि को बचाकर टीचर्स और विद्यार्थियो के साथ अन्याय किया जा रहा है. बताया जाता है कि शाला प्रबंधन ने इस बार शनिवार का अवकाश भी घोषित कर दिय है.

    मुख्य मार्ग से शाला पहुंच मार्ग की जर्जर हालत शाला प्रबंधन के हिटलरी रवैए को बखान करने के लिए पर्याप्त कही जा सकती है. शाला का यह मार्ग खबना अर्थात कीचड से सना हुआ है. इस सडक पर आने जाने वाली सायकल, रिक्षा, आटो, स्कूटर आदि जब तब फंस जाया करते हैं. सांसद, विधायक और जिला प्रशासन से ध्यानाकर्षण की जनापेक्षा है.
     
    (क्रमशः जारी)
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