अर्जुन चुप क्यों हैं

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  • Dr. Subhash Rai
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  • आखिर अर्जुन सिंह ने अपने होठ क्यों सिल रखे हैं? वे बोलते क्यों नहीं, बताते क्यों नहीं कि सच क्या है? भोपाल गैस त्रासदी के अपराधी वारेन एंडरसन को सुरक्षित बाहर निकालने में उनकी भूमिका क्या थी? ऐसा उन्होंने किसी के निर्देश पर किया या अपने बुद्धिकौशल के उपयोग से? केवल भोपाल या मध्य प्रदेश ही नहीं, सारा देश जानना चाहता है इतनी बड़ी गलती किसने की, क्यों की। कांग्रेस के शीर्ष नेता परस्पर विरोधी बयानों से लोगों का संदेह बढ़ाने में जुटे हैं पर वे इस तरह अपनी जवाबदेही से बचकर नहीं निकल सकते।

    प्रणव मुखर्जी ने साफ-साफ कहा है कि एंडरसन को मुक्त करने का फैसला अर्जुन सिंह ने किया था। मुखर्जी उस समय अखबारों में छपे अर्जुन सिंह के बयानों का हवाला देकर कहते हैं कि भोपाल में गुस्सा बढ़ रहा था, कानून-व्यवस्था के लिए कठिन स्थिति पैदा होती जा रही थी। ऐसे में एंडरसन को बाहर निकालना जरूरी हो गया था। उन्होंने इस बारे में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी से भी बात की थी, उन्हें समूचे घटनाक्रम की जानकारी भी दी थी। अगर प्रणव सही कह रहे हैं तो क्या राजीव गांधी को इस पर गौर नहीं करना चाहिए था कि देश के हजारों निर्दोष और मासूम लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार व्यक्ति को इस तरह छोड़ना कितना मुनासिब होगा?
    अगर अर्जुन ने फैसला किया भी हो तो वे इतना ही तो कर सकते थे कि एंडरसन को दिल्ली तक पहुंचवा दें। वह दिल्ली से कैसे उड़ गया, वह भी जब प्रधानमंत्री को सारे वाकये की जानकारी थी। क्या तत्कालीन केंद्र सरकार की यह जिम्मेदारी नहीं बनती थी कि वह हिंदुस्तानी जनता के गुनहगार को देश से बाहर भाग निकलने से रोके? सीबीआई के एक पूर्व अधिकारी के इस बयान का जवाब क्यों नहीं दिया जा रहा कि विदेश मंत्रालय का भी दबाव था कि एंडरसन को जलील न किया जाय?

    पर क्या इन अधिकारियों से भी नहीं पूछा जाना चाहिए कि अब वे जिस तरह सरकारों की फजीहत करके अपनी शहादत जताने में जुटे हैं, उनकी आत्मा तब क्यों गुलामी बजा रही थी? क्या उनके लिए सरकार और नौकरी से बड़ा देश नहीं था? क्या उनको उन परिवारों की तकलीफ से कोई मतलब नहीं था, जो जहरीली गैस के रिसाव में अपना सब कुछ गंवा चुके थे? उन अफसरों ने तब अपनी आत्मा कहां गिरवी रख दी थी, वे किस नीमबेहोशी में जी रहे थे?

    बहरहाल कांग्रेस को इन सारे सवालों का जवाब देना पड़ेगा। पार्टी के नेता जिस तरह राजनीतिक अभिशाप झेल रहे और अकेले पड़ गये बूढ़े एवं निहत्थे अर्जुन को जिम्मेदारी के चक्रव्यूह में घेरकर निष्प्राण करने की कोशिश कर रहे हैं, वह आखिर कब तक उन्हें खामोश रहने देगी। लाखों गैसपीड़ितों के साथ समूचा देश चाहता है कि अर्जुन बोलें और बतायें, सच है तो है क्या?

    4 टिप्‍पणियां:

    1. gandhi parivar ko pak daman sabit karane ke liye ek aadad bakara chahiya arjun singh kis din kam aayange.

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    2. सुभाष जी,मैं उस वक़्त का भुक्तभोगी हूँ. अर्जुन किस मुंह से सच्चाई कबूलेंगे? वे कहते हैं कि गैस कांड के बाद वे भागे नहीं थे, बल्कि सीएम हाऊस में बैठकर स्तिथि पर नज़र रखे थे,मगर मेरे पास इस बात का प्रमाण है कि वे भाग चुके थे.3 दिसंबर 2009 को दैनिक भास्कर ने एक परिशिष्ट निकाला था जिसमें भोपाल के उस वक़्त के कलेक्टर मोतीसिंह का इंटरव्यू छापा है, जिसमें उन्होंने साफ़ कहा है कि वे हादसे की रात सीएम हाउस गए थे मगर अर्जुनसिंह उन्हें नहीं मिले. ऐसे लोगों से क्या अपेक्षा की जा सकती है.

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    3. अर्जुन चुप हुआ तो क्या मै भी तो चुप हूँ !!!

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    4. इस संदर्भ में बस दो कविताएं याद आती हैं। इनका उपयोग हम लोगों ने भोपाल गैस त्रासदी पर प्रकाशित एक पुस्तिका में किया था-
      तू इधर उधर की बात न कर
      ये बता कि काफिला लुटा कैसे
      यह मेरठ की किसी शायर की पंक्तियां हैं नाम याद नहीं है।
      और दूसरी कविता थी शलभ श्रीरामसिंह की-

      जो इनका भेद खोल दे
      हर एक बात बोल दे
      हमारे हाथ में वही
      खुली किताब चाहिए
      घिरे हैं हम सवाल से
      हमें जवाब चाहिए।

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