हम भारतीयों कि टांगें इतनी कमज़ोर क्यों हैं?

Posted on
  • by
  • संजीव शर्मा/Sanjeev Sharma
  • in
  • स्वामी विवेकानंद ने सलाह दी थी कि हमारी युवा पीढ़ी को गीता पढ़ने की बजाय फुटबाल खेलना चाहिए.उनका कहना था कि देश के युवा वर्ग को सबल बनना होगा,धर्म की बारी तो इसके बाद आती है. उन्होंने कहा था कि यह मेरी सलाह है कि “ फुटबाल खेलकर आप ईश्वर के अधिक निकट हो सकते हो”. उन्होंने आगे कहा था कि “यह बात आपको भले ही अजीब लग रही हो पर मुझे कहनी पड रही है क्योंकि मैं आप लोगों से प्यार करता हूँ.मुझे इस बात का अनुभव है कि यदि आपके हाथ की हड्डियां और मांसपेशियां अधिक मजबूत होंगी तो आप गीता को बेहतर तरीके से समझ सकोगे”. लेकिन हम भारतीयों की तो आदत है कि हम अपने बाप की नहीं मानते तो विवेकानंद की सीख कैसे मान सकते हैं. हमें उनका कहना नहीं मानना था और हमने नहीं माना! यही कारण है कि विश्व के फुटबाल मानचित्र पर भारत की स्थिति १३३ वीं है और दिल्ली-मुंबई तो दूर मेरठ-भोपाल जैसे छोटे शहरों से भी छोटे देश फुटबाल खेलने वालों देशों की सूची में शान से इठला रहे हैं.
    दक्षिण अफ्रीका में शुरू हुए फुटबाल महाकुम्भ(world cup football ) में दुनिया भर के चुनिन्दा ३२ देशों की टीमों के १६०० खिलाडी आठ समूहों में बंटकर ६४ मैचों के दौरान अपनी दमदार टांगों का ज़लवा दिखाएंगे और हम भारतीय अपनी पतली-कमज़ोर टांगों और मोटी तोंद के साथ कई लीटर कोला डकारकर किसी विदेशी टीम के नाम पर अपनी नींद खराब करते रहेंगे. वैसे विश्व कप फुटबाल को भारत के आईपीएल(IPL ) का बाप कहा जाये तो अतिस्योंक्ति नहीं होगी क्योंकि इन मैचों को ३७६ टीवी चैनलों के ज़रिये २१४ देशों के लगभग ७२ करोड़ लोग देख रहे हैं.सिर्फ टीवी प्रसारण के अधिकार ही ३४ अरब डॉलर में बिके हैं.खेलों की विशालता और महत्त्व का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि यहाँ सुरक्षा पर ही ९० करोड़ रूपए खर्च हो रहे हैं. अब तक मैचों के ३४ लाख टिकिट लोगों ने ख़रीदे हैं और मैचों के जुनून के साथ-साथ यह संख्या भी बढती जायगी.
    सोचिए, यदि हमने विवेकानंद की सलाह मानकर सही ढंग से फुटबाल खेलना शुरू कर दिया होता तो आज हमारी टीम भी तिरंगे के साथ अपनी जर्सी का ज़लवा दिखा रही होती. वैसे भारत में फुटबाल की दशा शुरू से इतनी खराब नहीं रही. १९५० से लेकर १९६४ तक भारतीय फुटबाल ने भी स्वर्णिम दिन देखे हैं. इस दौरान हमने ऑलिम्पिक से लेकर एशियाई खेलों तक में अपनी टांगों का ज़बरदस्त हुनर दिखाया है. एशियाई खेलों में तो हमने स्वर्ण पदक तक जीता है लेकिन कमज़ोर टांगों और बेतहाशा पैसे वाले क्रिकेट ने फुटबाल के साथ-साथ सभी ऊर्जा-स्फूर्ति-जोश और उत्साह से भरपूर खेलों का बंटाधार कर दिया. तभी तो सबसे ज्यादा पैसे पीटने वाले २०-२२ साल के युवा क्रिकेटर अपने ४२ साल के कोच के साथ पूरीतरह से दौड़ भी नहीं पाते क्योंकि दौड़ने के लिए भी तो टांगो में दम चाहिए?हाँ विज्ञापनों से कमी के मामलें में वे कोच तो क्या कारपोरेट घरानों के प्रमुखों से भी आगे हैं. तो चलिए भारतीय फुटबाल कि दशा पर मातम मनाने की बजाय हमारी नई पीढ़ी को स्वामी विवेकानंद की शिक्षा देने का प्रयास करें ताकि भविष्य की पौध मजबूत टांगों वाली हो और फिर हमें फुटबाल तो क्या किसी भी खेल को खेलने वाले देशों की सूची में भारत का नाम नीचे से नहीं ढूँढना पड़े......आमीन!

    3 टिप्‍पणियां:

    1. हम भारतीयों कि टांगें इतनी कमज़ोर क्यों हैं?

      आबादी बढ़ाने के कारण

      जवाब देंहटाएं
    2. स्वामी विवेकानंद ने सलाह दी थी कि हमारी युवा पीढ़ी को गीता पढ़ने की बजाय फुटबाल खेलना चाहिए.उनका कहना था कि देश के युवा वर्ग को सबल बनना होगा,धर्म की बारी तो इसके बाद आती है. उन्होंने कहा था कि यह मेरी सलाह है कि “ फुटबाल खेलकर आप ईश्वर के अधिक निकट हो सकते हो”...

      Great lines !

      Nice post !

      Divya

      जवाब देंहटाएं

    आपके आने के लिए धन्यवाद
    लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

     
    Copyright (c) 2009-2012. नुक्कड़ All Rights Reserved | Managed by: Shah Nawaz