अब लगेंगे शिकायत के भी पैसे!

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  • मोबाईल सेवा प्रदाता मचा रहे लूट
    सरकार ने आंख पर बांध रखी है पट्टी

    सावधान! टोल फ्री के चक्कर में लुट न जाना

    (लिमटी खरे)

    बाजार में बिक रही वस्तुओं में छोटा सा स्टार लगाकर शर्तें लागू का प्रचलन आज का नहीं बरसों पुराना है, ताकि उपभोक्ता उन पर किसी तरह का क्लेम न कर सके। हाल ही में मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने भी अपने उपभोक्ताओं को लूटने की नई योजना पर काम करना आरंभ कर दिया है। अगर आप अपनी मोबाईल की सेवा में काल ड्राप, नेटवर्क कंजेशन, या अन्य किसी समस्या से परेशान हैं और आप अपने सेवा प्रदाता के कस्टमर केयर के पास अपनी शिकायत दर्ज कराने जा रहे हैं, तो थोडा रूकिए, अब ये काल पहले की तरह निशुल्क नहीं हैं, इन पर अब पचास पैसा प्रति काल की दर से चार्ज किया जाने लगा है।

    ठगा उपभोक्ता जब अपना मोबाईल का बेलेंस चेक करता है तो वह हर बार के पचास पैसे कम पाता है। उपभोक्ता अपनी शिकायत दर्ज कराए तो किसके पास और अब तो शिकायतें भी सशुल्क हो गईं हैं। अपने स्वार्थाें, वेतन भत्तों और सुविधाओं को बढाने वाले जनसेवकों को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि उपभोक्ता पर क्या गुजरेगी। देश और सूबों की सरकारों का बस अगर चले तो वे तो पुलिस थानों में शिकायत दर्ज कराने पर बाकायदा शुल्क लेकर रसीद काटना भी आरंभ कर दे। वैसे भी अस्पतालों में रोगी कल्याण और अन्य निधियों में बाकायदा शुल्क लेकर पर्ची दी जाती है, इतना ही नहीं उसी काउंटर के उपर लिखा होता है -''इस अस्पताल में इलाज का कोई पैसा नहीं लिया जाता है।''

    बहरहाल मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों का यह प्रयास निश्चित तौर पर उन्हें सुकून देने में काफी हद तक सहायक साबित होगा। अपने लक्ष्य के लिए मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियां तरह तरह की आकर्षक योजनाओं का प्रलोभन देकर उपभोक्ताओं को फंसाने से नहीं चूकतीं हैं, बाद में जब उपभोक्ता कंपनी की सेवाओं से उकता कर हलाकान हो जाता है, तब वह कंपनी के कस्टमर केयर में अपनी शिकायत दर्ज कराने के पहले सौ मर्तबा सोचेगा, कि उसकी शिकायत का पैसा भी उसे भरना होगा। सीधा से बिजनिस का फंडा है जितनी खराब सेवाएं, उतनी अधिक शिकायतें और जितनी अधिक शिकायतें उतनी सेवा प्रदाता कंपनी की कमाई।

    सरकार और मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों की इस अंधेरगर्दी में टेलीकॉम रेग्युलेटरी अथॉरिटी (ट्राई) ने भी अपनी सहमति जताकर देश के करोडों मोबाईल उपभोक्ताओं की जेब पर सेवा प्रदाता कंपनियों को डाका डालने के मार्ग प्रशस्त कर दिए हैं, जो अनुचित ही है। सेवा प्रदाता कंपनियों के खराब नेटवर्क की समस्या और सर्विस से जूझता उपभोक्ता आखिर अपनी शिकायत लेकर जाए तो जाए कहां। क्या ट्राई को यह नहीं मालुम कि उपभोक्ता द्वारा सेवा प्रदाता कंपनियों के कस्टमर केयर में घंटों ''आप कतार में हैं'' का केसट सुनकर दूसरी ओर से आने वाली मधुर आवाज सुनने या उनसे बतियाने के लिए अपना समय खराब नहीं किया जाता है। कुछ सेवा प्रदाता कंपनियों के कस्टमर केयर में बैठे कारिंदे तो आपके द्वारा कही बात को ही दुहरा कर आपकी सहन शक्ति की परीक्षा लेने का प्रयास भी करते हैं। ट्राई की सहमति पर आश्चर्य इसलिए है कि बिना उपभोक्ताओं का पक्ष सुने वह अपनी सहमति कैसे दे सकती है।

    मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों का यह कहना कि कस्टमर केयर में आने वाले अस्सी फीसदी काल बेकार होते हैं, एकदम बकवास है। आज के दौडते भागते युग में किसे इतनी फुर्सत है कि वह आधे पोन घंटे तक अपने मोबाईल को इंगेज रखकर सेवा प्रदाता कंपनी के कस्टमर केयर से बात करेगा। इसी आधार पर सेवा प्रदाता कंपनियों ने अब तक के अपने प्रचारित टोल फ्री नंबर्स को बिना किसी उदद्योषणा के सशुल्क बना दिया है। अनेक उपभोक्ताओं को तो इसका भान ही नहीं है कि कस्टमर केयर पर बात करना अब सशुल्क हो गया है।

    एसे तो मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियां अपने उत्पादों या योजनाओं के बारे में अपने उपभोक्ताओं को हर दस मिनिट में एक एसएमएस भेजकर परेशान करती रहती हैं, पर इतने बडे फैसले के उपरांत उसे लागू करने के बाद भी सरकारी उपक्रम बीएसएनएल, एमटीएल सहित निजी क्षेत्र की मोबाईल सेवा प्रदाता कंपनियों ने एक भी एसएमएस भेजने की जहमत नहीं उठाई है। इस मामले में सरकार के साथ ही साथ ट्राई की चुप्पी आश्चर्यजनक ही कही जाएगी।

    सरकार और टेलीकॉम रेग्युलेटरी अर्थारिटी को चाहिए कि पहले से लुटे पिटे उपभोक्ता को लूटने के सारे रास्ते बंद करने हेतु इस मसले पर एक बार फिर गंभीरता से विचार करे। उपभोक्ताओं की शिकायतों को निश्चित समयावधि में सुनकर उनके निपटारे की व्यवस्था सुनिश्चित किया जाना अत्यावश्यक है, वरना आने वाले समय में मोबाईल उपभोक्ताओं के बीच सेवा प्रदाता कंपनियों के साथ ही साथ ट्राई की साख बिगडते देर नहीं लगेगी।

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