चिकित्सकों की भी जय जय, जनसेवकों की भी जय जय . . .

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    (लिमटी खरे)

    भगवान शिव की नगरी सिवनी में बीते दो तीन दिनों से जो हो रहा है, वह निश्चित तौर पर जिले के स्वर्णिम चिकित्सकीय इतिहास (90 के दशक तक के) में टाट का पैबंद के मानिंद ही नजर आ रहा है। बीते दिनों जबलपुर रोड पर एलआईसी के करीब हुई सडक दुर्घटना के बाद घायल बालिका के साथ जिला चिकित्सालय में पदस्थ सरकारी तनख्वाह पाने वाले चिकित्सकों ने अपने चेहरों से नकाब उतारकर जिस कदर अमानवीय चेहरे को बाहर लाया है, उसकी जितनी भी निंदा की जाए कम होगा। बताते हैं कि इसके बाद जिलाधिकारी मनोहर लाल दुबे के निर्देश पर मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डॉ.आर.एस.चौहान ने जिला चिकित्सालय में पदस्थ चंद चिकित्सकों की चिकित्सा दुकान पर जाकर तालामारने की कार्यवाही की गई। इसमें डॉ.राम रजक, डॉ.पुरूषोत्तम सूर्या और डॉ.एस.के.नेमा नेमा की निजी तौर पर घरों से इतर चलाई जा रही दुकानों पर ताला जडा गया। आम जनता में सीएमएचओ डॉ.चौहान के द्वारा की गई कार्यवाही की बेहद अच्छी प्रतिक्रिया सामने आई है। इसी घटनाक्रम में डॉ.नेमा ने अपनी दुकान के ताले को तोड दिया।

    इसके उपरांत शनिवार को जब सीएमएचओ डॉ.आर.एस.चौहान ने प्रियदर्शनी इंदिरा गांधी के नाम से सुशोभित मेडिकल कालेज की क्षमता वाले जिला चिकित्सालय में सुबह साढे आठ बजे उपस्थिति पंजी देखकर उसमें अनुपस्थित चिकित्सकों के नाम के सामने गैरहाजिरी लगानी आरंभ कर दी। विडम्बना देखिए कि जिस आरएमओ के भरोसे जिला चिकित्सालय की व्यवस्थाएं संचालित होती हैं, उन्प्ही आरएमओ डॉ.राम रजक ने सीएमएचओ डॉ.चौहान को न केवल भद्दी भद्दी गालियां दी, बल्कि उनके हाथ से उपस्थिति पंजी छीन ली। बौखलाए डॉ. चौहान ने सिविल सर्जन डॉ.के.सी.मेश्राम को निर्देश दिया कि आरएमओ पर से डॉ.राम रजक को हटाकर किसी अन्य चिकित्सक को इसका प्रभार दिया जाए। यह है सिवनी जिला चिकित्सालय के हाल सखे।

    अस्सी के दशक के उत्तरार्ध में अस्तित्व में आए जिला चिकित्सालय को पूर्व में वहां संचालित किया जाता रहा है, जहां वर्तमान में निजी बस स्टेंड है। पूर्व केद्रीय मंत्री विमला वर्मा और स्व.गार्गीशंकर मिश्र के जमाने में इसे वहां से हटाकर बारापत्थर लाने की कार्यवाही की गई थी। उस समय यह जगह शहर से बाहर हुआ करती थी। गौरतलब है कि आज शहर का हृदय स्थल और भीडभाड वाला क्षेत्र बन गया है अस्पताल के इर्दगिर्द का क्षेत्र। सुश्री वर्मा जब तक प्रदेश सरकार में मंत्री के बतौर काम करती रहीं तब तक उन्होंने इस अस्पताल को संजीवनी देने की भरसक कोशिशें की। उनके जमाने में उनके प्रशासनिक गुणों के आगे सरकारी नुमाईंदे नतमस्तक ही हुआ करते थे। उनका दबदबा इतना हुआ करता था कि सरकारी कर्मचारी गफलत करने की बात भी नहीं सोच सकता था। विडम्बना ही है कि सुश्री विमला वर्मा के सक्रिय राजनीति से बिदा होते ही सिवनी जिले में भ्रष्टाचार, अनियमिततओं, भाई भतीजावाद आदि के बेलगाम घोडे दौडने आरंभ हो गए जिनकी रेस आज तक अनवरत ही जारी है।

    याद पडता है कि जब पंडित महेश शुक्ला मध्य प्रदेश सरकार के विधि विधायी मंत्री हुआ करते थे, तब एक मर्तबा उन्होंने प्रातः साढे आठ बजे जाकर जिला चिकित्सालय की उपस्थिति पंजी का निरीक्षण किया था, उस समय चिकित्सकों में हडकम्प मच गया था। इसके उपरांत जनसेवकों ने इस ओर से अपना ध्यान हटा लिया। आज जिला चिकित्सालय में पदस्थ चिकित्सक तनख्वाह तो सरकार से ले रहे हैं, पर मरीजों को अपने घरों पर बुलाकर उनकी जेबे हल्की कर उनका इलाज कर रहे हैं। कहने को तो जिला प्रशासन का एक उप जिलाध्यक्ष स्वास्थ्य विभाग का आफीसर इंचार्ज (ओआईसी) हुआ करता है, पर साल में एकाध दिन भी अगर वह अस्पताल की सुध लेता हो एसा नहीं लगता। जिला कलेक्टर को चाहिए कि बजाए सीएमएचओ के लगाम कसने के उनके द्वारा अपने मातहत ओआईसी डिप्टी कलेक्टर की मुश्कें कसें।

    इसके साथ ही साथ जिले में चिकित्सा का धंधा जोर शोर से पनप रहा है। जिला चिकित्सालय में पदस्थ चिकित्सकों की भव्य अट्ालिकाएं देखते ही बनती हैं। यक्ष प्रश्न तो यह है कि क्या सरकारी तनख्वाह में एसे विशाल भवन बनाए जा सकते हैं। जिला चिकित्सालय में पदस्थ स्टाफ द्वारा अस्पताल के समय में ही इनके साथ ही साथ निजी तौर पर संचालित होने वाले अस्पतालों में अपना बेशकीमती समय दिया जाता है। आज अगर किसी को एक्स रे कराना हो या खून की जांच, चिकित्सकों द्वारा वहीं भेजा जाता है जहां से उन्हें तगडा कमीशन मिलता है।

    इतना ही नहीं जिला चिकित्सालय में पदस्थ चिकित्सक अपने मरीजों को छोटी मोटी बीमारी होने पर रिफर करने में खासी महारथ रखते हैं। जरा सी जटिलता होने या फिर कृत्रिम तौर पर केस को जटिल बनाकर उसे नागपुर रिफर कर दिया जाता है। नागपुर के बडे आलीशान फाईव स्टार संस्कृति वाले अस्पतालों में मरीजों की गर्दन मोटी आरी से रेती जाती है। फिर उनसे वसूली रकम का बडा भाग सिवनी के चिकित्सकों को हर माह पहुंचाया जाता है। अब तो नागपुर के चिकित्सकों ने सिवनी में साप्ताहिक तौर पर आना भी आरंभ कर दिया है। यह परिपाटी लगभग पांच सालों से जारी है।

    सिवनी के विधायकों, सांसदों के अलावा अन्य जनसेवकों को इस बात से कोई लेना देना नहीं है कि भगवान शिव के इस जिले की जनता इतने विशाल जिला चिकित्सालय के होते हुए भी इलाज को क्यों तरस रही है। जिसकी मर्जी में जो आता है, वह उसे कर देता है। तत्कालीन जिला कलेक्टर एम.मोहन राव ने प्राईवेट वार्ड के पास एक फव्वारा बनाया था, जिसमें आज कुत्ते लघुशंका करते हैं। मोहम्मद सुलेमान ने इसकी बाउंड्री वाल को तोडकर व्यवसायिक काम्पलेक्स बना दिया जिसमें मूलभूत सुविधाएं ही नहीं हैं। जी.के.सारस्वत ने अपने कार्यकाल में इसे अण्डा जेल बना दिया। कहा जाता है कि मरीजों को स्वच्छ हवा और वातावरण की आवश्यक्ता होती है, पर उन्होंने अपने हिटलरी फरमान से यहां हवा आने के सारे मार्ग बंद करवा दिए। अगर वे चाहते तो कारीडोर में लगे बांस के जंगलों के बजाए लोहे की जालियां लगवा दी जातीं तो वार्डों की सुरक्षा के साथ ही साथ मरीजों को साफ हवा तो नसीब हो पाती। हालात देखकर यही कहना चाहेंगे कि तुम्हारी (चिकित्सकों की) भी जय जय, हमारी (जनसेवकों की) भी जय जय, न तुम जीते न हम हारे . . .।

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    1 टिप्पणी:

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