कविता

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  • Kajal Kumar
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    अजब चलन है
    मेरे शहर का;

    यहाँ,
    हवा के लिए
    सोने के ताले हैं
    चाँदी की दीवारें
    पत्थर के हैं शीशे
    पारे की साँसें..

    सब मुमकिन है
    बस, इक
    बहने की इजाज़त के सिवा...

    अजब चलन है
    मेरे शहर का.

    0--------0

    -काजल कुमार

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    10 टिप्‍पणियां:

    1. प्रदूषण के इस बियाबाँ मे
      बहना भी कौन चाहता है.
      बहुत सुन्दर चित्रण किया है.

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    2. वाह, सब ठहरना चाहते हैं, सब सब कुछ बटोरना चाहते हैं,,,,,सुन्दर कविता....हाँ,,और सक्षिप्त भी..

      उत्तर देंहटाएं
    3. यहाँ,
      हवा के लिए
      सोने के ताले हैं
      चाँदी की दीवारें
      पत्थर के हैं शीशे
      पारे की साँसें.. nice

      उत्तर देंहटाएं
    4. गंदगी और प्रदूषण भरे ,
      इस शहर में -----
      हवा बहे भी तो यहां
      बहे कैसे --------
      जुर्रत अगर वो ,
      बहने की करे तो क्या --
      हवा - हवा रह पाएगी---------
      सुंदर काव्य है ।

      उत्तर देंहटाएं
    5. यह तो लघु कविता हो गयी। लेकिन अच्‍छी अभिव्‍यक्ति, बधाई।

      उत्तर देंहटाएं
    6. सुन्दर कविता के लिए काजल कुमार जी को बधाई!

      उत्तर देंहटाएं
    7. पत्थर के शीशे हैं---समझ में नहीं आया।

      उत्तर देंहटाएं
    8. bahut sahi kaajal kumar ji

      bahut hi behatreen dhang se aapne shaher ka zikr kiya hai ..aur ye shaher kisi ka bhi ho sakta hai ..

      bahut bahut badhai aapko

      dhanywad.

      vijay
      www.poemsofvijay.blogspot.com

      उत्तर देंहटाएं
    9. bahut sahi kaajal kumar ji

      bahut hi behatreen dhang se aapne shaher ka zikr kiya hai ..aur ye shaher kisi ka bhi ho sakta hai ..

      bahut bahut badhai aapko

      dhanywad.

      vijay
      www.poemsofvijay.blogspot.com

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