सोचता आगे बढूँ किस राह पर..

Posted on
  • by
  • Himanshu Kumar Pandey
  • in
  • Labels: ,
  • क्षितिज तक आकर खड़ा
    अनजान एक पथिक
    सोचता आगे बढूँ
    किस राह पर ?
    मिलते रहे चौराहे
    हर पग पर ।
    साथ में संबल नहीं,
    जाउँ मैं गंतव्य पर,
    अपने किस प्रकार ?
    मान सकता हूँ नहीं
    मैं हार ।
    संग में जब दृढ़ सदा
    संकल्प,
    मिल ही जायेंगे
    स्वतः विकल्प ।
    सत्य ही मनुपुत्र
    है अति हठी
    ठान लेता मन में
    जब निश्चय,
    दिग-दिगन्त बोलते
    सब उसकी जय ।
    पर सदा जय की ही
    नहीं है लालसा,
    जय-विजय सुनने का
    आदी जीव यह,
    अंततः पाता, विषय
    भ्रम जाल सा ।
    भ्रमित होकर पुनः
    क्षितिज तक आकर
    खड़ा,
    सोचता आगे बढूँ
    किस राह पर ?
    मिलते चौराहे
    हर पग पर ।

    ---------------------------------------------
    वाणी जी ने अपनी डायरी के पन्ने याद किये ....मैंने भी इसी दीपावली की सफाई के उपक्रम यह चिट्ठी पायी ..आपसे बाँट रहा हूँ ।

    8 टिप्‍पणियां:

    1. संग में जब दृढ़ सदा
      संकल्प,
      मिल ही जायेंगे
      स्वतः विकल्प ।

      आभार ।

      उत्तर देंहटाएं
    2. जय-विजय सुनने का
      आदी जीव यह,
      अंततः पाता, विषय
      भ्रम जाल सा ।
      भ्रमित होकर पुनः
      क्षितिज तक आकर
      खड़ा,

      स्वागत है,

      उत्तर देंहटाएं
    3. क्षितिज तक आकर
      खड़ा,
      सोचता आगे बढूँ
      किस राह पर ?
      मिलते चौराहे
      हर पग पर।

      नवगीत बहुत सुन्दर है।
      बधाई!

      उत्तर देंहटाएं
    4. बहुत खूब....अक्सर यही सोचता हूं...सुंदर रचना है

      उत्तर देंहटाएं
    5. सोचता आगे बढूँ
      किस राह पर ?
      मिलते चौराहे
      हर पग पर ।
      चौराहे पर ही एक नई राह मिलेगी
      आगे बढकर देखो अब छाह मिलेगी

      उत्तर देंहटाएं

    आपके आने के लिए धन्यवाद
    लिखें सदा बेबाकी से है फरियाद

     
    Copyright (c) 2009-2012. नुक्कड़ All Rights Reserved | Managed by: Shah Nawaz