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फेसबुक और ट्विटर पर 'आप' की क्रांति पर और इतर कुछ हालिया स्‍टेटस : ब्‍लॉगस्‍वामी/पाठक भी आनंद लें इन चुटकी भरी हकीकतों का



##RahulGandhi

राहुल कह रहे हैं कि मैं 'आम' पार्टी की सफलता से प्रेरणा लेकर 'अमरूद' पार्टी का गठन करूंगा और लोकसभा चुनावों में पीएम बनकर 'आप' सबको चिढ़ाऊंगा। मम्‍मी जी को खुशी हुई है कि मेरा सुपुत्र अब पीएम बनने की योग्‍यता हासिल कर चुका है ।



#Polls2013

अरविंद केजरीवाल यानी 'आप' का यह फैसला कि किसी भी बेईमान से जुगलबंदी नहीं की जाएगी - स्‍वागतयोग्‍य है। जुगलबंदी सत्‍ता में पहुचने पर मिलीभगत बन जाती है इससे 'आप' अच्‍छी तरह परिचित हैं।




#Polls2013

'आप' ने खोल दी
कांग्रेस और भाजपा की
ढोल में है कितनी पोल
कितनों को रहे हैं पाल
पर लोकपाल से बचने का
नतीजा है यह चाहे
सबने कितने ही बजाए गाल।



##sheela

दिल्ली से शीला चाची
ने इस्तीफा देकर
शीला मामी बनना
किया स्वीकार
'आप' की ताकत हुई साकार।



##Tejpal

डर गया तेजपाल
जब से सुना है
केजरीवाल लाएंगे लोकपाल
अब तेज को पालने के दिन बीते रै भैया
लोक को पालने आप आई है।



##AAP

जीत गए 'आप'
जश्‍न मनाओ 'आप'
आप ही आप अब
'आपसमाज' बनेगा
कर लीजिए जाप।



##Delhi

जीत को हार
हार को जीत
तो नहीं बनाएंगी
ई वी एम...
यदि नहीं हुई
धांधली तो
जरूर आएगी
आप की आंधी।


##Sheela

कांग्रेस ने दिल्‍ली वासियों के बिजली के बिलों को चुनाव के नतीजों की पूर्व रात से कम कर दिया। रात एक बजे से बिजली नहीं है, बिल तो अपने आप ही कम आएगा। बिजली की वजह से पानी नहीं आएगा, इसलिए पानी का बिल कम आएगा। यह है एमएलएम। अब भी 'आप' को शक है कि दिल्‍ली में शीला चाची अब मामी बनेंगी। जो मतगणना अधिकारी रात को सोए नहीं होंगे, वह मतों की गिनती चाहकर भी ठीक से कर पाएंगे, मुझे तो भरोसा नहीं है, किसी को हो तो हो ... मेरा भरोसा तो अब भी यही कह रहा है कि दिल्‍ली में आपकी सरकार ही बहुमत में आएगी। और आपका भरोसा संदेह के दायरे में क्‍यों है,, जो मोदी की गोदी में बैठे हैं उन भाजपाइयों को छोड़ दें तो मम्‍मी की गोदी वाले राहुल से क्‍यों डर लगेगा।


##salman

मुसलमान में से 'मु' हटाने से = सलमान...
मुसलमान में से 'मु' और 'न' हटाने से = सलमा
और मुसलमान में से मुसल हटाने से = मान
मान ही सब धर्मों और मानवता
की शान है
मान की सबसे अधिक आन है
आन बान और शान है
मान लो अब।
 
 
 
अविनाश वाचस्‍पति

 
 
 
 
 
 
 
 
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क्या आप फ़ेसबुक व ट्विट्टर पर हैं ?


अजब दुनिया है यह फ़ेसबुक और ट्विट्टर भी. लगता है जैसे खाली बैठे सिर खुजाने वालों के मोहल्ले में आ गए हों.

इस तरह के प्रोग्राम लिखने वालों को इनकी प्रेरणा ज़रूर आदिमानवों द्वारा बनाए गए भित्ति चित्रों से मिली होगी. उन लोगों ने गुफाओं की दीवारों पर चित्र बनाए और कुछ-कुछ लिख कर चलते बने, पर अक़्लमंद लोग हैं कि उनके लिखे में आज भी मतलब ढूँढ़ रहे हैं. अरे भई छोड़ो न, ये उनके समय के फ़ेसबुक और ट्विट्टर थे. आज हज़ारों साल बाद भी यह परंपरा ज़िंदा है, यक़ीन नहीं तो बाहर कहीं भी किसी भी दीवार पर नज़र घुमाइए, शर्तिया कुछ न कुछ लिखा ज़रूर मिलेगा.

फ़ेसबुक व ट्विट्टर भी, दीवारों पर यूँ ही कुछ-कुछ लिख कर चलते बने लोगों की ही दुनिया है. यहाँ कुछ लोग हैं कि कुछ कवितामय छोड़ देते हैं तो कुछ जीवन-दर्शन सरीखा कुछ, कई तो चुटकुले लिख जाते हैं. पता ही नहीं चलता कि कौन किसके लिए क्या लिख रहा है. कुछ तरह-तरह की फ़ोटो टाँग जाते हैं.

सुंदर सी महिलाओं की फ़ोटो वाली लाइनों के नीचे पसंद करने वालों और प्रतिक्रिया देने वालों का तो ताँता ही लगा मिलता है, ज़ाहिर है इन लाइन लगाए लोगों में पुरुष ही ज़्यादा होते हैं.

ये प्रोग्राम भी जातिवादी परंपरा का पालन करते हैं. यहाँ बड़े लोगों के फ़ैन बनने के न्योते आते हैं तो आम जनता को मित्र बनाने के सूचनाएँ चस्पा की जाती हैं. अब श्रृद्धा आपकी है कि आप क्या करना चाहते हैं.

कुछ झंडाबरदार लोग भी यहाँ आते हैं, उन्हें इतने से ही सुख नहीं मिलता कि कुछ लिख कर चलते बनें. वे ग्रुप कहे जाने वाले अपने गुट बनाकर यहाँ-वहाँ लोगों को उनमें शामिल करने के संदेश तो दाग़ते ही रहते हैं, जहाँ मौक़ा मिला वहाँ लोगों को, उन्हें बिना बताए ही, इनमें चुपचाप शामिल भी कर लेते हैं. इनका गुज़ारा इतने से ही नहीं होता, इसके बाद आपको ढेरों इमेल भी ठेले जाते हैं कि फ़लाने ने ढिमाके के यहाँ क्या तीर मारा.

ट्विट्टर तो गूंगों की दुनिया लगती है. कोई आया और कुछ-कुछ लिख कर चलता बना, अगर आपके पास समय है तो पढ़ लो. बहुत हुआ तो आप भी कुछ लिख आओ. ट्विट्टर पढ़ कर ऐसे लगता है कि किसी ने शायद जम्हाई लेते हुए कुछ अनर्गल/ निरापद कह दिया हो. हां, यह बात दीगर है कि कुछ बड़े लोग जो कुछ कभी-कभार यहां लिखते हैं उसका ढिंढोरा मीडिया के दूसरे लोग जम कर पीट मारते हैं.

पहले-पहल कंप्यूटर में विंडो के साथ सॉलिटायर गेम का उद्देश्य यह बताया गया था कि यह काम करते-करते बोर होने पर मन बहलाने भर के लिए है. आज यही काम फ़ेसबुक और ट्विट्टर कर रहे हैं. ज्यों जेम्स बाँड की फ़िल्म में कोई सामाजिक संदेश नहीं ढूँढ़ा जाता ठीक वैसे ही फ़ेसबुक और ट्विट्टर पर भी कोई अर्थ नहीं ढूँढ़ा जाना चाहिए.

बहुत से लोगों को, एक समय के बाद यहां ऊब होने लगती है पर कई ठाड़े हैं कि जो आज भी यहां डटे हुए हैं.

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- काजल कुमार
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