यह रचनाविरोधी समय है। जो सचमुच रचना को साधना की तरह जीते हैं, जो अपनी पक्षधरता को जीवित रखना चाहते हैं, उनको केवल बाहरी लोगों के षडयंत्रों से नहीं जूझना पड़ रहा है बल्कि भीतर ही ऐसे घुसपैठिये हैं, जो खामोश रहकर या मुस्कराकर वार करते हैं। रचनाविरोधी माहौल से निपटना कठिन नहीं हैं, उनसे संग्राम जारी है और जारी रहेगा पर भीतर के घेरे में कुछ ऐसी ताकतें है, जो आम तौर पर बहुत अपनापन दिखाती हैं, जुलूस में शामिल रहने और नारे लगाने का उतावलापन भी प्रदर्शित करती हैं पर जब भी मंच पर संभावना बनती है तो वे नेपथ्य में रहकर खेल बिगाड़ने में भी नहीं चूकतीं। उनका सारा सामाजिक संवाद निजी हानि-लाभ के गणित में उलझकर उन्हें भी रचनाविरोधी ताकतों के साथ ला खड़ा करता है।
मैं दो घटनाओं का जिक्र करना चाहूंगा। जाने-माने वयंग्यकार और व्यंग्ययात्रा तथा गगनांचल जैसी दो महत्वपूर्ण पत्रिकाओं के संपादक
प्रेम जनमेजय की पीड़ा पर गौर कीजिए। उनकी पीड़ा निजी नहीं है बल्कि उन सबकी पीड़ा है, जो साहित्य की मर्यादा और शक्ति को समझते या पहचानते हैं। उन्होंने अपना दुख इस तरह व्यक्त किया है- अक्षर थियेटर में , शरद जोशी की ९ रचनाओं का नटरस पाठ था . शरद जोशी ने व्यंग्य को असीमित पाठक दिए, गद्य व्यंग्य को मंच पर स्थापित किया. गया बहुत उत्साह से था पर लौटा बहुत ही उदास. शरद जी की रचनाओं का पाठ करने वाले अधिक थे, श्रोता कम. व्यंग्यकार गायब, बहुत व्यस्त हो गए हैं? इसकी टिकट थी और हम लोग मुफ्तखोर संस्कृति के रक्षक हैं...? अनेक मित्रों को फ़ोन पर सूचना दी, पर बड़े लोगों की व्यस्तताओं को क्या कहिये?
दूसरी कथा घटी मशहूर शायर
सर्वत एम जमाल के साथ. उन्हें एक मुशायरे में आमंत्रित किया गया. उन्होंने कार्यक्रम के लिए आर्थिक मदद का भी इंतजाम कराया. समय से कार्यक्रम स्थल पर मौजूद भी हुए। वहां आये लोग उनसे प्यार से, गर्मजोशी से मिले भी. यहां तक कि जिन्होंने बाद में मुशायरे के संचालन का कार्यभार संभाला, वे भी स्वागत मुस्कान के साथ मिले. मंच पर मुख्य कार्यक्रम आरंभ होने के पहले कुछ गणमान्य लोगों ने सर्वत जमाल साहब का नामोल्लेख भी किया पर आश्चर्य वे मंच पर आखिर तक बैठे रहे और संचालक महोदय ने उन्हें काव्य-पाठ के लिए बुलाना तो दूर, उनके नाम का जिक्र तक नहीं किया। कुछ लोगों द्वारा याद दिलाये जाने पर भी न तो उनके इरादे बदले, न ही उनके चेहरे पर किसी अनजानी गलती का आभास ही झलका। बात बहुत साफ है कि सर्वत जमाल को जानबूझकर नहीं पढ़वाया गया। एक बड़े शायर का यह अपमान नहीं तो और क्या है?
प्रेम का दुख निजी कारणों से नहीं है। अगर किसी व्यंग्यकार के मन में शरद जोशी के लिए आदर नहीं है, सूचना मिलने के बाद भी वह इसलिए कार्यक्रम से कन्नी काट जाता है कि उसे केवल बुलाया गया है, उसके लिए टिकट नहीं भेजी गयी है तो इसके क्या मायने हो सकते हैं? मैं अपनी तरफ से कुछ कहने की जगह कुछ प्रतिक्रियाओं से आप को रुबरू कराऊँ तो ज्यादा अच्छा रहेगा। मशहूर व्यंग्यकार
प्रमोद ताम्बट ने इस ओढ़ी हुई व्यस्तता को कृतघ्नता कहा जबकि
अविनाश वाचस्पति ने सलाह दी कि इन बड़े लोगों की व्यस्तताओँ पर कुछ न कहना ही सब कुछ कहना होगा। मेरा मानना है कि मूल्यहीनता ने इस तरह सबको जकड़ लिया है कि सार्थक सम्वाद की गुंजाइश धीरे-धीरे कम होती जा रही है. इस सर्वग्रासी संकट से साहित्य और रचनाधर्मिता का चेहरा लगाये घूमते बहुत से लोग भी मुक्त नहीं हैं. सवाल है कि क्या ये लोग शरद जोशी से भी बड़े हो गये हैं? नहीं, इस तरह तो उन्होंने अपना बौनापन ही दिखाया है।
इस घटियापन का दूसरा चेहरा देखिये। सिद्धार्थनगर में पिछ्ले महीने एक नाट्य कायर्शाला चलाई जा रही थी, जिसके समापन पर एक 26 जून को एक मुशायरा हुआ. गजल की दुनिया में बड़े नाम सर्वत जमाल को भी इस आयोजन में शरीक होने के लिए बुलाया गया। आयोजकों के आग्रह पर उन्होंने कुछ आर्थिक सहायता भी दिलवायी। इस आयोजन में वीनस केशरी, मेजर राजरिशी गौतम, अर्श के अलावा कुमार विश्वास भी शरीक होने वाले थे। आयोजन का सारा ज़िम्मा नेट पर गजलों की कक्षा चलाने वाले गज़ल गुरु पंकज सुबीर के हाथों में था. राहत इन्दौरी को बुलाया जाना था लेकिन वो इंकार कर चुके थे, कुमार विश्वास की सहमति मिल चुकी थी. सर्वत जमाल पहुंचे तो सभी मिले, पंकज सुबीर से भी भेंट हुई. बड़े दोस्ताना माहौल में गुफ्तगू हुई. कार्यक्रम के आरम्भ में दैनिक जागरण के ब्यूरो चीफ को दो शब्द कहने के लिए बुलाया गया और उन्होंने सर्वत जमाल की तारीफों के पुल बाँध दिए. मुशायरा/कवि सम्मेलन शुरू हुआ और १५ मिनटों में दो बार, पंकज सुबीर ने सभी रचनाकारों के नाम लिए लेकिन उनमें सर्वत का नाम नहीं था. आयोजन चलता रहा और रात पौने बारह बजे के आसपास कुमार विश्वास को अंतिम शायर के रूप में आवाज़ दी गयी. रात लगभग २ बजे कुमार विश्वास ने अपना पाठ समाप्त किया और कार्यक्रम की समाप्ति का एलान हो गया. सर्वत जमाल के अपमान से पंकज सुबीर के कई प्रशंसक भी क्षुब्ध दिखे। सर्वत ने आमंत्रित होने के बावजूद आयोजकों से पारिश्रमिक के रूप में कोई धन नहीं लिया। इस घटना से वे भीतर ही भीतर इतने हिल गये कि कई सप्ताह सदमे में रहे. तय नहीं कर पा रहे थे कि क्या करें, क्या न करें. ब्लाग बंद कर दें या लिखना बंद कर दें. आखिर में उन्होंने अपने ब्लाग पर एक खूबसूरत गज़ल लिखी और कमेंट बाक्स बंद कर दिया। किसी को समझ में नहीं आया कि उन्हें क्या हो गया है. वहां इतना संकेत जरूर था कि कुछ अघटित हुआ है. मैने वह गज़ल
बात-बेबात पर पोस्ट कर दी. बहुत कुरेदने पर भी उन्होंने मुंह नहीं खोला. मुझे लगा मामला गम्भीर है. फिर मैंने अपने स्तर से खोजबीन की तो सारी कहानी मालूम हुई.
आखिर ऐसा व्यवहार पंकज सुबीर ने सर्वत जमाल के साथ क्यों किया ? उन्हें बुलाकर अपमानित क्यों किया गया ? केवल इसलिए कि कुमार विश्वास का विश्वास जीता जा सके और कमाई के और रास्ते खोले जा सकें ? शायद सर्वत जमाल उस मंच से पढ़ते तो पंकज जी को अपनी धाक जमाने में कामयाबी नहीं मिलती। एक समर्थ रचनाकार का अपमान करने वाला आखिर रचनाकार कैसे हो सकता है ? क्या कविता केवल धन कमाने और इसके लिए किसी भी स्तर तक गिर जाने की इजाजत दे सकती है ? क्या इस तरह किसी कवि का अपमान करने वाला कवि कहलाने का अधिकारी भी हैं?
- डॉ. सुभाष राय
सभी मित्रों से इस पीड़ा पर अपनी बेबाक प्रतिक्रियाएं देने और सहमति स्वरूप साथियों से अपने ब्लॉग पर पुनर्प्रकाशन के लिए विनम्र अनुरोध है।
- अविनाश वाचस्पति