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युद्ध की हिंसा और प्रेमकथाएं : अजित राय गोवा से

पणजी, गोवा, 2 दिसम्‍बर
भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के प्रतियोगिता खंड में दिखाई गई पौलेंड के सुप्रसिद्ध फिल्‍मकार जान किदावा ब्‍लोंस्‍की की नई फिल्‍म ‘लिटल रोज’ एक दिलचस्‍प प्रेम कथा का त्रिकोण है। जिसमें इतिहास की कुछ कटु स्‍मृतियां शामिल हैं। इजरायल ने 1968 में जब फिलिस्‍तीन पर हमला किया था तो पौलेंड के कम्‍युनिस्‍ट शासकों ने इस अवसर का इस्‍तेमाल यहूदी और कई दूसरी राष्‍ट्रीयताओं वाले नागरिकों को देशनिकाला देने में किया था। उसी दौरान 1968 के मार्च महीने में पौलेंड की राजधानी वारसा में अभिव्‍यक्ति की आजादी को लेकर लेखकों, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और विश्‍वविद्यालयों के छात्रों ने एक बड़ा आंदोलन किया था जिसे सरकार ने बेरहमी से कुचल दिया। इसी पृष्‍ठभूमि में कम्‍युनिस्‍ट सुरक्षा सेवा का एक सीक्रेट एजेंट रोमन अपनी प्रेमिका कैमिला को एक सत्‍ता विरोधी लेखक एडम के पीछे लगा देता है। जिस पर शक है कि वह यहूदी है।
एडम एक प्रतिष्ठित लेखक है और लगातार शासन की तानाशाही के खिलाफ आंदोलन का समर्थन करता है। कैमिला उसकी जासूसी करते हुये अंतत: उसके प्रेम में पड़ जाती है क्‍योंकि उसे लगता है कि एडम का पक्ष मनुष्‍यता का पक्ष है। इसके विपरीत उसका प्रेमी रोमन सिर्फ सरकार की एक नौकरी कर रहा है और सरकारी हिंसा और दमन को सही ठहराने पर तुला हुआ है। जब पहली बार कैमिला को इस रहस्‍य का पता चलता है तो उसे सहसा विश्‍वास ही नहीं होता कि सरकारी दमन और हिंसा में शामिल खुफिया पुलिस का एक दुर्दांत अधिकारी किसी स्‍त्री से प्रेम कैसे कर सकता है। वह यह भी पाती है कि प्रोफेसर एडम के ज्ञान और पक्षधरता का आकर्षण उसे एक नये तरह के प्रेम में डुबो देता है। अपने पहले प्रे‍मी के साथ उसे हमेशा लगता रहता है कि वह रखैल बनकर केवल इस्‍तेमाल होने की चीज है। उसकी न तो कोई पहचान है और न अस्तित्‍व। वह बिस्‍तर में अपने प्रेमी को सुख देने की वस्‍तु बनकर रह गई है। एडम से मिलने के बाद उसे जिंदगी में पहली बार अपने होने का अहसास होता है।
‘लिटल रोज’ के लिए जान किदावा ब्‍लोंस्‍की को मास्‍को अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में 32वें मास्‍को अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में सर्वश्रेष्‍ठ निर्देशक का पुरस्‍कार मिल चुका है। यह फिल्‍म एक प्रेम कथा के माध्‍यम से 1968 के पोलैंड की नस्‍लवादी राजनीति का वृतांत प्रस्‍तुत करती है। फिल्‍म के अंत में पर्दे पर वारसा रेलवे स्‍टेशन से आस्ट्रिया की राजधानी विएना जाने वाली एक ट्रेन छूट रही है। जिसमें देशनिकाला पाये हजारों लोग भेजे जा रहे हैं। पर्दे पर हम पढ़ते हैं कि कितनी संख्‍या में किस तरह के लोगों को पोलैंड से जबर्दस्‍ती निकाल बाहर किया गया था। कम्‍युनिस्‍ट सरकार को लगता था कि इन लोगों के रहते हुए पोलैंड में समाजवाद सुरक्षित नहीं रह सकता।
गोवा फिल्‍मोत्‍सव में दर्शकों के लिए सबसे अधिक आकर्षण का केन्‍द्र कॉन क्‍लाइडोस्कोप 2010 खंड के अंतर्गत दिखाई जाने वाली वे 10 फिल्‍में थीं, जिन्‍हें प्रतिष्ठित कॉन फिल्‍म समारोह (मई 2010) से चुना गया था। इसमें क्रिस्‍तोफ होचास्‍लर की जर्मन फिल्‍म ‘द सिटी बिलो’ और ब्रिटिश फिल्‍मकार केन लोच की अंग्रेजी फिल्‍म ‘रूट आयरिश’ का विशेष रूप से उल्‍लेख किया जाना चाहिए।
क्रिस्‍तोफ होचास्‍लर की फिल्‍म ‘द सिटी बिलो’ नये जमाने में कॉरपोरेट युद्ध को अलग तरीके से प्रस्‍तुत करती है। जर्मनी के फ्रेंकफुर्त शहर के एक टावर की अंतिम मंजिल पर बने रेस्‍त्रां में चार बिजनेसमैन एक पूरी कंपनी पर कब्‍जा करने की रणनीति बनाते हैं। उनमें से एक 50 वर्षीय रोलैंड अपने एक अधिकारी को साजिश करके इंडोनेशिया के खतरनाक इलाकों में भेज देता है ताकि वह उसकी पत्‍नी के साथ अपने सैक्‍स संबंधों को जारी रख सके। एक सुंदर और महत्‍वाकांक्षी स्‍त्री श्‍वेंजा शुरू-शुरू में तो उसके प्रेम जाल में अपने पति के साथ विश्‍वासघात करती है लेकिन बाद में वह सारा खेल पलट देती है।

केन लोच की ‘रूट आयरिश’ दो अभिन्‍न दोस्‍तों के माध्‍यम से इराक युद्ध में ब्रिटेन के निजी सुरक्षा एजेंसियों और सीक्रेट एजेंसियों के हिंसक कारोबार की परतें उधेड़ती है। फर्गस अपने दोस्‍त फ्रेंकी को बगदाद में चल रहे युद्ध के एक प्रॉजेक्‍ट में भेजता है जहां फ्रेंकी मारा जाता है। दस हजार पाउंड प्रतिमाह टैक्‍स फ्री वेतन का लालच अंतत: उसे महंगा पड़ता है। फर्गस को लगता है कि फ्रेंकी की हत्‍या की गई है। इसके बाद की पूरी फिल्‍म एक थ्रिलर की तरह इस हत्‍या के पीछे छिपे सच को जानने का अवसर देती है। यह हत्‍या खुद सीक्रेट सर्विस के लोगों ने इसलिए की थी क्‍योंकि उन्‍होंने बगदाद में एक निर्दोष परिवार को मार डाला था। फ्रेंकी उनके खिलाफ सैनिक अदालत में मुकदमा कर सकता था और उन्‍हें उस इराकी परिवार को भारी मुआवजा देना पड़ता। इस कहानी के साथ लंदन और बगदाद के बीच घटित होने वाली कई दूसरी कहानियां भी चलती हैं।
गोवा फिल्‍मोत्‍सव में हमेशा की तरह ईरान की फिल्मों ने जबर्दस्‍त वाहवाही लूटी। इस बार कंट्री फोकस में ईरान की 9 नई फिल्‍में प्रदर्शित की गईं। बिना सैक्‍स और हिंसा वाली इन फिल्‍मों में मानवीय करूणा और संघर्ष की कहानियों को जिस कुशलता से कहा गया है। वह दर्शकों के दिल के भीतर तक असर करता है। 
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एक दिन की प्रेम कथा जो किसी के साथ कहीं भी घट सकती है # अब्बास किरोस्तामी की ‘सर्टीफाइड कॉपी’ : गोवा से अजित राय

अब्‍बास किरोस्‍तामी
पणजी, गोवा, 1 दिसम्‍बर
अब्‍बास किरोस्‍तामी की नयी फिल्‍म ‘सर्टीफाइड कॉपी’ 2010 इस वर्ष कॉन फिल्‍मोत्‍सव का एक प्रमुख आकर्षण रही है। इस फिल्म में उत्‍कृष्‍ट अभिनय के लिए जूलियट बिनोचे को कॉन फिल्‍मोत्‍सव में सर्वश्रेष्‍ठ अभिेनेत्री का पुरस्‍कार मिल चुका है। भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में इसे देखने के लिए दर्शक इतने उतावले हो गए कि टिकट खिड़की खुलने के तुरंत बाद ही पहला शो हाउस फुल हो गया। दर्शकों, समीक्षकों और फिल्‍म-प्रेमियों की जबर्दस्‍त मांग पर आयोजकों को रात के 10 बजे वाले शो में इसका दोबारा प्रदर्शन रखना पड़ा।
कहा जा रहा है कि इस विश्‍वप्रसिद्ध ईरानी फिल्‍मकार की यह पहली यूरोपीय फिल्‍म है, जिसे फ्रांस और इटली के सहयोग से उन्‍होंने पूरा किया है। फिल्‍म की भाषा अंग्रेजी और फ्रेंच है और यह केवल दो चरित्रों के आसपास बुनी गयी है। कहानी के नाम पर सिर्फ इतना है कि एक ब्रिटिश कला समीक्षक इटली के एक गांव में आर्ट गैलरी चलाने वाली एक महिला से मिलता है, दोनों 15 वर्षों से शादी शुदा हैं और एक दिन के लिए ऐसे मिलते हैं, मानो वे वास्‍तविक जीवन में पति-पत्‍नी हों। पूरी फिल्‍म उनकी एक दिन की मुलाकात की अनेक छवियों, मनोभावों, दृश्‍यों और उतार-चढ़ाव को प्रस्‍तुत करती है। आर्ट गैलरी की मा‍लकिन की भूमिका में जूलियट बिनोचे के अभिनय की दुनिया भर में तारीफ हो रही है।
अब्‍बास किरोस्‍तामी अपनी फिल्‍मों में सच्‍चाई और कल्‍पना के विभ्रम पैदा करने के लिए जाने जाते हैं। उनकी फिल्‍म ‘वेयर इज माई फ्रेंड्स हाउस’ (1990) ने उन्‍हें विश्‍व सिनेमा के एक महत्‍वपूर्ण फिल्‍मकार के रूप में स्‍थापित किया था। ‘सर्टीफाइड कॉपी’ में आख्‍यान के तौर पर उन्‍होंने अपनी बहुचर्चित फिल्‍म ‘क्‍लोज-अप’ के अधूरे काम को पूरा किया है। ‘क्‍लोज-अप’ में एक व्‍यक्ति ईरान के मशहूर फिल्‍मकार मोहसिन मखमल बाफ बनकर एक फिल्‍म बनाने की कोशिश करता है। हालांकि हम यहां वांग कार वाइ की ‘इन द मूड फॉर लव’ को भी याद कर सकते हैं।
‘सर्टीफाइड कॉपी’ में आर्ट गैलरी चलाने वाली एक फ्रेंच महिला (जूलियट बिनोचे) एक ब्रिटिश लेखक और कला समीक्षक (विलियम शिमेल) से उलझती हुई दिखाई गई है, जिसने अभी-अभी कलाकृतियों की कॉपी करने के चलन पर अपना लेक्‍चर पूरा किया है। ऊपर से देखने पर यह एक व्‍यस्‍क किस्‍म की रोमांटिक स्‍टोरी लग सकती है, जो किसी के साथ कहीं भी घटित हो जाता है। ध्‍यान से देखने पर पता चलता है कि इसमें किरोस्‍तामी का यह दर्शन छिपा हुआ है कि हमारी दुनिया और जीवन में दरअसल असली या वास्‍तविक कुछ भी नहीं होता, सब कुछ कहीं-न-कहीं से ‘कॉपी’ किया गया है।  यूरोप के कुछ समीक्षक इस फिल्‍म को यूरोपीय कला फिल्‍मों की नकल भी बता रहे हैं, जो दरअसल असल से भी अधिक वास्‍तविक है।
फिल्‍म का एक दृश्‍य 
फिल्‍म में कैमरा इटली के एक पर्यटक ग्राम में लगातार दो चरित्रों के ही आसपास घूमता रहता है। अधिकतर शॉट क्‍लोजअप में लिए गए हैं और फिल्‍म मंथर गति से दोनों चरित्रों के संवादों के माध्‍यम से आगे बढ़ती है। फिल्‍म बड़ी सूक्ष्‍मता से एक स्‍त्री और एक पुरुष के रिश्‍तों की हकीकत और उसके बाहरी आवरणों की पड़ताल करती है। बाहर से जो दिखता है वह तथा अंदर से दरअसल जो होता है वह, दोनों चरित्रों का यह संबंध दरअसल वैध विवाहित संबंध की कॉपी है। किरोस्‍तामी यहां बड़ी खूबसूरती से यह स्‍थापित करते हैं कि भले ही उस स्‍त्री के पास विवाहित होने की वैधानिक स्थिति नहीं है लेकिन पुरुष के प्रति उसकी सारी भावनायें वैध हैं।
यह फिल्‍म अच्‍छे अर्थों में ईरान के इस मास्‍टर फिल्‍मकार का एक सिनेमाई विचलन है, जो  इसे उनकी पहली फिल्‍मों से अलग करता है। उन्‍होंने लोकेशन का खूबसूरती से इस्‍तेमाल तो किया है लेकिन किसी टूरिस्‍ट गाइड की तरह नहीं। उनका सारा जोर अपने दोनों चरित्रों पर है। पटकथा इतनी कसी हुई है कि दर्शक कई बार संवादों को सुनते हुये अमूर्त और दार्शनिक किस्‍म की कल्‍पना में खो जाता है। जूलियट बिनोचे ने अपने चरित्र में कई तरह के मनोभावों को जिस कुशलता के साथ निभाया है, वह अभिनय के लिए एक क्रांतिकारी परिघटना बन जाती है।
एक और दृश्‍य 
यह एक ऐसी फिल्‍म है जिसे पहली बार में देखने पर बहुत सारी चीजें हमारी पकड़ से छूट जाती हैं। दूसरी बार देखने पर बहुत सारी चीजों के नये अर्थ खुलते हैं। जाहिर है यह अब्‍बास किरोस्‍तामी की फिल्‍म है जो सबके लिए नहीं है, इसका आनंद उठाने के लिए दर्शक को थोड़ा सा बौद्धिक और भावनात्‍मक रूप से संवेदनशील होना पड़ेगा। लेकिन यदि आप एक बार किरोस्‍तामी की सिनेमाई दुनिया में चले गये तो बीच में वे आपको उठने का मौका नहीं देंगे। किरोस्‍तामी की दूसरी फिल्‍मों की तरह इस फिल्‍म में भी कहानी का कोई निश्चित अंत नहीं किया गया है। यह काम दर्शकों पर छोड़ दिया गया है कि वे अपने हिसाब से इस कहानी को उसकी मंजिल तक पहुंचा दें। 
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‘फिल्म सोशिएलिज्म ‘ - भविष्य के सिनेमा का ट्रेलर : गोवा से अजित राय



पणजी, गोवा, 30 नवम्‍बर
विश्‍व के सबसे महत्‍वपूर्ण फिल्‍मकारों में से एक ज्‍यां लुक गोदार की नयी फिल्‍म ‘फिल्‍म सोशिएलिज्‍म’ का प्रदर्शन के भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह की एक ऐतिहासिक घटना है। पश्चिम के कई समीक्षक गोदार को द्वितीय विश्‍वयुद्ध के बाद का सबसे प्रभावशाली फिल्‍मकार मानते हैं। इस 80 वर्षीय जीनियस फिल्‍मकार की पहली ही फिल्‍म ‘ब्रेथलैस’ (1959) ने दुनिया में सिनेमा की भाषा और शिल्‍प को बदल कर रख दिया था। ‘फिल्‍म सोशिएलिज्‍म’ गोदार शैली की सिनेमाई भाषा का उत्‍कर्ष है। इसे इस वर्ष प्रतिष्ठित कॉन फिल्‍मोत्‍सव में 17 मई 2010 को पहली बार प्रदर्शित किया गया। गोदार ने अपनी इस फिल्‍म को ‘भाषा को अलविदा’ (फेयरवैल टू लैंग्‍वेज) कहा है। अब तक जो लोग यह मानते रहे हैं कि शब्‍दों के बिना सिनेमा नहीं हो सकता, उनके लिए यह फिल्‍म एक हृदय-विदारक घटना की तरह है। इस फिल्‍म को दुनिया भर में अनेक समीक्षक उनकी आखि‍री फिल्‍म भी बता रहे हैं।
यह अक्‍सर कहा जाता है कि सिनेमा की अपनी भाषा होती है और वह साहित्यिक आख्‍यानों को महज माध्‍यम के रूप में इस्‍तेमाल करता है। गोदार की यह फिल्‍म आने वाले समय में सिनेमा के भविष्‍य का एक ट्रेलर है, जहां सचमुच में दृश्‍य और दृश्‍यों का कोलॉज शब्‍दों और आवाजों से अलग अपनी खुद की भाषा में बदल जाते हैं। गोदार ने पहली बार इसे हाई डेफिनेशन (एच डी) वीडियो में शूट किया है। वे विश्‍व के पहले ऐसे बड़े फिल्‍मकार हैं, जो अपनी फिल्‍मों की शूटिंग और संपादन वीडियो फार्मेट में करते रहे हैं। यह उनकी पहली फिल्‍म है, जहां उन्‍होंने अपनी पुरानी तकनीक से मुक्ति लेकर पूरा का पूरा काम डिजीटल फार्मेट पर किया है। गोदार ने अपनी फिल्‍मों से आख्‍यान, निरंतरता, ध्‍वनि और छायांकन के नियमों को पहले ही बदल डाला था और हॉलीवुड सिनेमा के प्रतिरोध में दुनिया को एक नया मुहावरा प्रदान किया था। वे कई बार अमेरिकी एकेडेमी पुरस्‍कारों को लेने से मना कर चुके हैं। इस नयी फिल्‍म में उन्‍होंने शब्‍द, संवाद, पटकथा की भाषा आदि को पीछे छोड़ते हुए ‘विजुअल्‍स‘ की अपनी भाषाई शक्ति को प्रस्‍तुत किया है। इस प्रक्रिया में कई बार हम देखते हैं कि जो ध्‍वनियां हमें सुनाई देती हैं, दृश्‍य उससे बिल्‍कुल अलग किस्‍म के दिखाई देते हैं। इससे यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि यह केवल गोदार का एक कलात्‍मक प्रायोगिक और तकनीकी आविष्‍कार है। इस फिल्‍म की संरचना में उनका अस्तित्‍ववाद और मार्क्‍सवाद का राजनैतिक दर्शन पूरी तरह से घुला-मिला है। उन्‍होंने कहा भी है कि ‘’मानवता के लिए भविष्‍य का दृष्टिकोण प्रस्‍तुत करने का काम केवल सिनेमा ही कर सकता है क्‍योंकि हमारे अधिकतर कला-माध्‍यम अतीत की जेल में कैद होकर रह गए हैं’’।
गोदार की नई कृति ‘फिल्‍म सोशिएलिज्‍म’ दरअसल तीन तरह की मानवीय गतियों की सिम्‍फनी है। फिल्‍म के पहले भाग को नाम दिया गया है ‘कुछ चीजें’। इसमें हम भूमध्‍य सागर में एक विशाल और भव्‍य क्रूजशिप (पानी का जहाज) देखते हैं, जिस पर कई देशों के यात्री सवार हैं और अपनी-अपनी भाषाओं में एक दूसरे से बातचीत कर रहे हैं। इन यात्रियों में अपनी पोती के साथ एक बूढ़ा युद्ध अपराधी है, जो जर्मन, फ्रेंच, अमेरिकी कुछ भी हो सकता है, एक सुप्रसिद्ध फ्रेंच दार्शनिक है, मास्‍को पुलिस के खुफिया विभाग का एक अधिकारी है, एक अमेरिकी गायक, एक बूढ़ा फ्रेंच सिपाही, एक फिलिस्‍तीनी राजदूत और एक संयुक्‍त राष्‍ट्रसंघ की पूर्व महिला अधिकारी भी शामिल है। गोदार ने समुद्र के जल की अनेक छवियां मौसम के बदलते मिजाज के साथ प्रस्‍तुत की हैं। जहाज पर चलने वाली मानवीय गतिविधियों का कोलॉज हमारे सामने एक नया समाजशास्‍त्र रचता हुआ दिखाया गया है। सिनेमॉटोग्राफी इतनी अद्भुत है कि रोशनी और छायाओं का खेल एक अलग सुंदरता में बदलता है।


फिल्‍म के दूसरे हिस्‍से का नाम ‘अवर ह्यूमैनिटीज’ है जिसमें मानव-सभ्‍यता के कम से कम 6 लीजैंड बन चुकी जगहों की यात्रा की गई है। ये हैं मिश्र, फिलिस्‍तीन, काला सागर तट पर यूक्रेन का शहर उडेसा, ग्रीक का हेलास, इटली का नेपल्‍स और स्‍पेन का बर्सिलोना।
तीसरे भाग को ‘हमारा यूरोप’ कहा गया है जिसमें एक लड़की अपने छोटे भाई के साथ अपने माता पिता को बचपन की अदालत में बुलाती है और स्‍वतंत्रता, समानता तथा बंधुत्‍व के बारे में कई मुश्किल सवाल करती है।
गोवा फिल्‍मोत्‍सव में गोदार की ‘फिल्‍म सोशिएलिज्‍म’ बिना अंग्रेजी उपशीर्षकों के दिखाई गई। गोदार कुछ दिन बाद 3 दिसम्‍बर 2010 को अपनी उम्र के 81वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। उनकी कही गई एक बात, जिसका अक्‍सर उल्‍लेख किया जाता है, इस फिल्‍म को देखते हुए याद आती है। उन्‍होंने कभी कहा था कि ‘’सिनेमा न तो पूरी तरह कला है, न यथार्थ, यह कुछ-कुछ दोनों के बीच की चीज है।’’ इस फिल्‍म के कुछ दृश्‍य इतने सुंदर हैं कि उनके सामने विज्ञापन फिल्‍में भी शर्मा जाएं। संक्षेप में, हम इसे कला, इतिहास और संस्‍कृति का क्‍लाइडोस्‍कोपिक मोजे़क कह सकते हैं। 
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विश्व सिनेमा में इतिहास से जुड़ी यादें - गोवा से अजित राय

फ्रीडा पिंटो
पणजी, गोवा, 29 नवम्‍बर
भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में विश्‍वप्रसिद्ध फिल्‍मकार रोमन पोलांस्‍की की नयी फिल्‍म ‘द घोस्‍ट राइटर’ राजनैतिक कारणों से इन दिनों दुनिया भर में चर्चा में है। पोलांस्‍की ने इस फिल्‍म की पटकथा पिछले वर्ष तब पूरी की थी, जब स्विटजरलैंड  पुलिस ने अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों के आग्रह पर उन्‍हें गिरफ्तार किया था। उन पर एक फिल्‍म की शूटिंग के दौरान एक कम उम्र की लड़की के साथ यौनाचार का आरोप लगाया गया था। पोलांस्‍की हमेशा अपने जीवन और फिल्‍मों के कारण विवाद में रहते हैं। इसके बावजूद इस फिल्‍मोत्‍सव में उनकी नयी फिल्‍म का प्रदर्शन एक बड़ी उपलब्धि है। इस फिल्‍म का प्रीमियर इसी वर्ष 12 फरवरी 2010 को 60वें बर्लिन अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में हुआ था, जहां उन्‍हें सर्वश्रेष्‍ठ निर्देशक का सिल्‍वर बीयर पुरस्‍कार मिला।
‘द घोस्‍ट राइटर’ ब्रिटेन के एक पूर्व प्रधानमंत्री की कहानी है जो रिटायर होने के बाद अपना शेष जीवन अमेरिका के किसी द्वीप में बिता रहा है। उस पर आरोप है कि उसने एक युद्ध में अमेरिका का हद से बाहर जाकर अंध-समर्थन किया था। फिल्‍म के प्रदर्शन के बाद बीबीसी ने दावा किया था कि फिल्‍म का मुख्‍य चरित्र एडम लंग हूबहू ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री टोनी ब्‍लेयर से मिलता है और फिल्‍म जिस युद्ध की बात की गई है, वो दरअसल इराक युद्ध है। यह साफ है कि टोनी ब्‍लेयर ने इराक युद्ध में अमेरिका का अंध-समर्थन किया था और ब्रिटिश जनता से झूठ भी बोला था कि इराकी राष्‍ट्रपति सद्दाम हुसैन के महल में रासायनिक हथियार हैं। लंदन के एक चर्चित अखबार ‘द इंडिपेंडेंट’ ने यह भी खुलासा किया है कि इस फिल्‍म के लिए जर्मन सरकार से भारी आर्थिक मदद मिली है। यह भी कहा जाता है कि जिस फिल्‍म को बर्लिन फिल्‍मोत्‍सव में सिल्‍वर बीयर मिलता है, उसे जर्मन सरकार भारी आर्थिक अनुदान देती है।
Roman Polanski
रोमन पोलांस्‍की की यह फिल्‍म इस तरह के राजनीतिक विवादों से आगे एक बड़ी सिनेमाई पहल है, जिसमें एक दिलचस्‍प रहस्‍य कथा के माध्‍यम से दुनिया की सत्‍ता-राजनीति की परतें खोली गई हैं। पोलांस्‍की ने पटकथा पर काफी शोध किया है और इराक युद्ध के दौरान की मीडिया सामग्री का रचनात्‍मक इस्‍तेमाल भी। यह फिल्‍म भारत में जल्‍दी ही रिलीज होने वाली है।
पोलैंड के बहुचर्चित फिल्‍मकार जान जाकूब कोलस्‍की की 8 फिल्‍मों का प्रदर्शन गोवा फिल्‍मोत्‍सव की एक खोज ही कही जायेगी। इस फिल्‍मकार के बारे में भारत में बहुत कम लोग जानते हैं। यहां हम उनकी ताजा फिल्‍म ‘वेनिस’ (2010) की चर्चा कर रहे हैं। इसमें द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान पोलैंड की राजधानी वारसा में एक 11 वर्षीय बच्‍चे मारक के सपनों के माध्‍यम से एक नया जादुई संसार रचा गया है। वैसे भी कोलस्‍की अपनी फिल्‍मों में जादुई यथार्थवाद के लिए भी जाने जाते हैं। यह फिल्‍म लोकप्रिय पोलैंड लेखक वुडमिर्ज ओडोजेवस्‍की के एक चर्चित उपन्‍यास पर आधारित है। अपनी सिनेमाई भाषा, पटकथा, संवाद, छायांकन और मार्मिक अपील के कारण ‘वेनिस’ गोवा फिल्‍मोत्‍सव की सबसे अधिक चर्चि‍त फिल्‍मों में से एक है। लेखक का कहना है कि मैंने द्वितीय विश्‍वयुद्ध के दौरान पोलैंड के समय का सारांश बताने की कोशि‍श की है, जिसमें भावनाएं, यातना, प्रेम, भय और घृणा सब कुछ है।
‘वेनिस’ जाने की प्रबल इच्‍छा रखने वाला मारक युद्ध के दौरान अपनी डायरी लिखता है। एक दिन वह लिखता है कि ‘’क्‍या रूसियों की तरह जर्मन भी ईश्‍वर में विश्‍वास करते हैं ? यदि हां, तो वे इतने बुरे क्‍यों हैं। मैं अब यहां नहीं रहना चाहता।‘’ उसकी आंटी उसे खुश करने के लिए अपने घर के तलघर में वेनिस शहर का एक मॉडल बनाती है, जिसमें नाव पर बैठकर मारक सचमुच के वेनिस शहर की सैर करता है। मारक लिखता है कि ‘’दुनिया में सबसे महत्‍वपूर्ण चीज प्रेम है, मुझे अब प्रेम के बारे में सोचना चाहिए।’’ फिल्‍म में बहुत कम संवाद हैं। युद्ध के दृश्‍य तो बिल्‍कुल नहीं हैं। युद्ध में मरते, तबाह होते लोगों के परिवारों के दृश्‍य जरूर हैं। जो दुख और यातना की अंतहीन चादर लपेटे हुए अच्‍छे दिनों के आने का इंतजार कर रहे हैं। उनकी इस मुश्किल दुनिया में फिल्‍म उम्‍मीदों की रोशनी के रूप में बच्‍चों के सपनों को सामने ला खड़ा करती है।
ऑस्‍कर पुरस्‍कारों से सम्‍मानित फिल्‍म ‘स्‍लम डॉग मिलिनेयर’ की हीरोइन फ्रीडा पिंटो का यहां आना दर्शकों के लिए जबर्दस्‍त आकर्षण का विषय था। हालांकि अमेरिकी फिल्‍मकार वुडी एलेन की जिस नई फिल्‍म ‘यू विल मीट ए टॉल डार्क स्‍ट्रेंजर’ को दिखाया गया, उसमें फ्रीडा पिंटो का इस्‍तेमाल केवल शो पीस के तौर पर किया गया है। जैसे अनुपम खेर भी केवल 4 मिनट के लिए आते हैं। फिल्‍म की शुरूआत बड़े दार्शनिक अंदाज में होती है, जिसमें विलियम शेक्‍सपियर का एक प्रसिद्ध वाक्‍य हमें सुनाई देता है – ‘जीवन आवाजों और उन्‍मादों से भरा हुआ होता है लेकिन अंत में कुछ भी सार्थक नहीं बचता’। वुडी एलेन की यह फिल्‍म देखने के बाद सचमुच यह बात सार्थक हो जाती है क्‍योंकि हम एक दूसरे से यह पूछते हैं कि इस फिल्‍म का क्‍या मतलब है, यह सवाल और लाजमी है कि भारत के इस अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍मोत्‍सव में किसको चाहिए फ्रीडा पिंटो। हालांकि उन्‍होंने यह जरूर कहा कि इस फिल्‍म से उन्‍हें यह सीख मिली ‘’ उस पार मेरे लिए खुशियां ही खुशियां हैं’’। फ्रीडा पिंटो को भले ही खुशियां मिली हों पर फिल्‍म को देखकर निकले दर्शकों को भारी निराशा ही हाथ लगी।
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यातना, संघर्ष और स्‍वप्‍न का नया सिनेमा : गोवा से अजित राय

Girish Kasarvalli

पणजी, गोवा, 28 नवम्‍बर
भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के पैनोरमा खंड में दिखाई गई सुप्रसि‍द्ध फिल्‍मकार गिरीश कासरवल्‍ली की नई कन्‍नड़ फिल्‍म ‘मानासाम्‍बा कुदुरेयानेरी’ (राइजिंग ड्रीम्‍स) अपने विषय और बर्ताव के कारण हमारा ध्‍यान खींचती है। भूमंडलीकरण के बाद भारतीय समाज में उपभोक्‍तावाद की नकली चमक-दमक के पीछे लगभग 80 करोड़ लोगों के जीवन की यातना, संघर्ष और स्‍वप्‍न को यह फिल्‍म सामने लाती है।
अब तक 12 फिल्‍में बना चुके गिरीश कासरवल्‍ली को 4 बार सर्वश्रेष्‍ठ फीचर फिल्‍म एवं निर्देशन का राष्‍ट्रीय पुरस्‍कार मिल चुका है। ‘घटश्राद्ध’ से दुनिया भर में चर्चित इस फिल्‍मकार की शैली अब तक नहीं बदली है, हालांकि उनकी हर फिल्‍म कहानी के स्‍तर पर एक नया प्रस्‍थान रचती है। पिछले वर्ष वैदेही कहानी पर बनी उनकी फिल्‍म गुलाबी टाकीज को भारी प्रशंसा और कई पुरस्‍कार मिले थे। इस बार भी केवल 38 दिन और 45 लाख रुपये के बजट में उन्‍होंने इस फिल्‍म को पूरा किया है, जो अमरेश नुआगादोनी की पुरस्‍कृत कहानी पर आधारित है। इसमें एक पिछड़े गांव में मृत्‍यु, गरीबी, रिश्‍तों और बाजार की रस्‍साकशी के माध्‍यम से भारतीय समाज पर भूमंडलीकरण के प्रभावों को बिल्‍कुल नये तरीके से दिखाया गया है। फिल्‍म का एक-एक दृश्‍य हमें बिल्‍कुल नये देशकाल में ले जाता है। ऐसा लगता है कि हर चरित्र अभिनय की बजाय अपना वास्‍तविक काम कर रहा है।
फिल्‍म की कहानी कर्नाटक के बीजापुर जिले के एक गांव में रहने वाले इरीया नामक मजदूर की है, जो कब्र खोदने का काम करता है। आश्‍चर्य है कि कर्नाटक के हिन्‍दुओं में मरने के बाद दफनाने की अनूठी परंपरा है। इरीया को अक्‍सर एक सपना आता है जिससे उसे पता चल जाता है कि गांव में दूसरे दिन कोई मरने वाला है और वह सुबह से ही कब्र खोदने में लग जाता है। एक रात उसके गुरू सिद्धा सपने में आते हैं और पता चलता है कि अगले दिन गांव का जमींदार मरने वाला है। दूसरी सुबह वह उनके लिए कब्र खोदने में लग जाता है। काम पूरा कर वह जमींदार के घर जाता है, जहां मैनेजर मातादैया उसे कुछ रूपये देकर डांटकर भगा देता है। इरीया सदमे में है कि उसका सपना झूठा कैसे हो गया। बाद में पता चलता है कि इरीया का सपना झूठा नहीं हुआ, उस दिन सचमुच जमींदार की मौत हो गई। दरअसल उसका बेटा शिवन्‍ना फैक्‍टरी बनाने के लिए अपनी जमीनें बेचना चाहता था, जिस दिन जमीनें बेची जानी थीं उसी दिन उसके पिता की मृत्‍यु हो गई। यदि यह खबर घर से बाहर निकलती तो जमीन की बिक्री को रोकना पड़ता। मैनेजर की सलाह पर शिवन्‍ना दो दिन बाद अपने पिता की मृत्‍यु की घोषणा करता है तब तक लाश की दुर्गन्‍ध से पूरी हवेली आक्रांत हो चुकी होती है। एक दृश्‍य में हम देखते हैं कि गाजे बाजे के साथ जमींदार की शवयात्रा निकली है और जैसे ही इरीया जुलूस में लोगों को यह बताने की कोशिश करता है कि जमींदार की मौत तो दो दिन पहले ही हो गई थी, उसे मार पीट कर भगा दिया जाता है। अंत में वह अपनी पत्‍नी रूद्री के साथ बंजर जमीन पर खेती करते दिखाया गया है। उसके सपने में फिर उसके गुरू आते हैं। वह कहता है कि अब वह कब्र खोदने का काम नहीं करेगा क्‍योंकि लोग इतने बदल गए हैं कि मृत्‍यु का भी कारोबार करने लगे हैं।
इस फिल्‍म को देखते हुए हमें प्रेमचन्‍द की कहानी कफन के घीसू और माधव की याद आती है। इरीया और रूद्री समाज के आखिरी पायदान पर जी रहे दो लोग हैं, जिनके लिए सपने देखना, उनके जिंदा रहने की शर्त है। कैमरा बार-बार एक बंजर लैंडस्‍केप में इन दो लोगों के फटेहाल जीवन में सपनों को उगते हुए दिखाता है। फिल्‍म में कोई खलनायक नहीं है। भूमंडलीकरण के बाद का समय खुद एक खलनायक की तरह समूचे जीवन पर हावी है। संवाद बहुत कम हैं लेकिन अंदर तक चोट करते हैं। विशाल हवेली में तार-‍तार होता सामंतवाद जाते-जाते भी नये व्‍यापार में रूपांतरित होता है। जहां रूपये का लालच रिश्‍तों की अनिवार्य मर्यादा पर भारी पड़ता है। यह कैसे संभव है कि शिवन्‍ना के लिए पिता के अंतिम संस्‍कार से ज्‍यादा जरूरी फैक्‍टरी के लिए जमीन की खरीद-बिक्री हो जाए। फिल्‍म में उसकी सुशिक्षित अभिजात्‍य पत्‍नी की घबराहट और बेचैनी एक दुविधा की तरह बनी रहती है। उसकी 8 साल की छोटी बच्‍ची और उसके निष्‍पाप से लगने वाले सवाल निर्देशक का एक प्रतिकात्‍मक हस्‍तक्षेप है।
kanasemba kudureyaneri
फिल्‍म का छायांकन हृदयस्‍पर्शी है। दिन भर कब्र खोदने के बाद जब थका-मांदा इरीया अपनी झोंपड़ी में लौटता है तो उसकी पत्‍नी रूद्री जिस तरह से सपनों का उत्‍सव मनाती है, वह गरीबी पर फिल्‍मकार की संवेदनशील टिप्‍पणी है। अंतिम दृश्‍य में जब रूद्री सपने में आए गुरू सिद्धा का तिरस्‍कार करती है, जिसके अंधविश्‍वास में फंसा इरिया सामान्‍य जीवन नहीं जी पाता और दोनों को खेती करते हुए देख गुरू पूछता है कि पौधों को कैसे सींचोगे, इरीया का जवाब सामान्‍य भारतीय आदमी की जिजीविषा और दृढ-निश्‍चय का घोषणा पत्र बन जाता है। वह कहता है कि एक-एक पौधे को बढ़ा करूंगा, भले ही उन्‍हें अपने पेशाब से ही क्‍यों सींचना पड़े। 
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कहानी से बाहर निकलती पटकथाएं : गोवा से


Director Fatih Akin

पणजी, गोवा, 27 नवम्‍बर
इस समय दुनिया भर में नयी पीढ़ी के जिन फिल्‍मकारों का जादू चल रहा है, उनमें तुर्की मूल के जर्मन फिल्‍मकार फतिह अकीन का नाम प्रमुख है। अपनी फिल्‍म ‘हैड-ऑन’ (2004) के लिए बर्लिन फिल्‍मोत्‍सव में गोल्‍डन बीयर तथा यूरोपियन बेस्‍ट फिल्‍म का यूरोपियन फिल्‍म अवार्ड पाने वाले इस फिल्‍मकार को ठीक तीन साल बाद ‘द एज ऑफ हैवन’ (2007) के लिए कॉन फिल्‍मोत्‍सव में सर्वश्रेष्‍ठ पटकथा का पुरस्‍कार मिल गया। गोवा फिल्‍मोत्‍सव में विशेष रूप से दिखाई गई उनकी नयी फिल्‍म ‘सोल किचन’ (2009) को भी बर्लिन फिल्‍मोत्‍सव में स्‍पेशल ज्यूरी अवार्ड मिल चुका है। यह फिल्‍म अपनी नयी सिनेमाई भाषा, उत्‍कृष्‍ट पटकथा, श्रेष्‍ठ संपादन और एक साथ कई जिंदगियों को देखने की चुटीली दृष्टि के कारण महत्‍वपूर्ण है। पारंपरिक कथा संरचना से बाहर निकलकर यह फिल्‍म आधुनिक यूरोप में नयी पीढ़ी की जिंदगी की नयी पटकथाएं प्रस्‍तुत करती है।
जर्मनी के हैम्‍बर्ग शहर के कम भीड़-भाड़ वाले इलाके में कम आय वर्ग के लोगों के लिए एक रेस्‍त्रां है सोल किचन। इसका मालिक जिनोस ग्रीक मूल का जर्मन है तथा वह नेदीन से प्रेम करता है, जो एक पत्रकार है और उसे चीन के शंघाई शहर में स्‍थानांतरित किया जा रहा है। जिनोस का भाई इलियास एक गुमराह युवक है जिसे पैरोल पर जेल से छोड़ा गया है। एक पारिवारिक भोज के दौरान दूसरे रेस्‍त्रां में जिनोस श्‍यान से मिलता है, जिसे उसे मालिक ने शेफ की नौकरी से निकाल दिया है। जिनोस अपनी प्रेमिका नेदीन से स्‍काईप पर वीडियो चैटिंग से जुड़ा रहता है। रात के अकेलेपन में अपने लैपटाप पर अपनी प्रेमिका को विविध मुद्राओं में निर्वस्‍त्र देखते हुए वह अक्‍सर सपनों की दुनिया में खो जाता है। याद कीजिए कि अनुराग कश्‍यप की फिल्‍म ‘देव डी’ में माही गिल पंजाब से अपना निर्वस्‍त्र एमएमएस देव को लंदन भेजती है। यह संयोग नहीं है कि अनुराग कश्‍यप फतेह अकीन के जबर्दस्‍त प्रशंसक हैं। गोवा के एनएफडीसी फिल्‍म बाजार में उन्‍होंने फतिह अकीन के साथ एक विशेष सत्र का संचालन भी किया। बहरहाल जिनोस अंतत: फैसला करता है कि वह अपना रेस्‍त्रां बेच कर शंघाई चला जाएगा। नये शेफ श्‍यान के आने के बाद रेस्‍त्रां का भाग्‍य खुल जाता है। इस हालत में वह इलियास को मैनेजर बनाकर शंघाई का टिकट खरीदता है। हवाई अड्डे पर अचानक उसे नेदीन मिलती है, जो अपनी दादी की मृत्‍यु के बाद अपने चीनी ब्‍आय फ्रेंड के साथ लौटी है। उधर इलियास अपने अपराधी दोस्‍तों के साथ जुए में रेस्‍त्रां को हार जाता है। जिनोस भयानक कमरदर्द से पीडि़त है और उसकी मुलाकात एक सुंदर फिजियोथेरेपिस्‍ट अन्‍ना से होती है। उसका रेस्‍त्रां नीलाम हो रहा है, उसे बचाने के लिए जिनोस अपनी पूर्व प्रेमिका नेदीन से बड़ा कर्ज लेता है जो अब अमीर हो चुकी है। अंत में, हम देखते हैं कि सोल किचन के बंद दरवाजे पर ‘प्राइवेट पार्टी’ का बोर्ड टंगा है और भीतर केवल दो लोग हैं – जिनोस और उसकी नई सहयात्री अन्‍ना ।
‘सोल किचन’ में हमारा सामना तरह-तरह के चरित्रों से होता है जिनमें से अधिकतर जर्मनी में काम करने वाले विभिन्‍न देशों से आए मजदूर हैं। कई बार  कोई एक कहानी चल रही होती है, तभी दूसरी तीसरी चौथी शुरू हो जाती है। फिर पहली वापिस लौटती है तो पांचवीं शुरू हो जाती है। इस तकनीक का सबसे अच्‍छा इस्‍तेमाल मैक्सिको के फिल्‍मकार इना ऋतु अपनी फिल्‍मों ‘बावेल’ और ‘ट्वेंटी वन ग्राम’ में किया था। ‘सोल किचन’ का टोन, मूड और ट्रीटमेंट कॉमेडी का है। जो एक क्षण के लिए भी दर्शक को अपने जादुई प्रभाव से अलग नहीं होने देती। प्रेम और सैक्‍स के दृश्‍यों को बड़ी सुंदरता के साथ फिल्‍माया गया है। फिल्‍म का संपादन कमाल का है और अलग-अलग स्‍वभाव की छवियां अपने आप एक तार से जुड़कर पटकथा रचती हैं।
फिल्‍म के विशेष प्रदर्शन के दौरान फतिह अकीन ने कहा कि ‘सोल किचन’ उसके और उसके मित्र के एक साझे रेस्‍त्रां के सच्‍चे अनुभवों पर आधारित है। इसका केन्‍द्रीय विषय है – ‘करें या न करें’। हमेशा यह दुविधा बनी रहती है। चाहे वह बिजनेस हो, प्रेम हो या सैक्‍स। फिल्‍म के अधिकतर चरित्र इस दुविधा से घिरे दिखाई देते हैं। गोवा फिल्‍मोत्‍सव में इस फिल्‍म को जबर्दस्‍त सफलता मिली है। हालांकि कुछ वर्ष पहले दिल्‍ली के ओसियान फिल्‍मोतसव में इसी फिल्‍मकार की ‘हैड-ऑन’ को भी काफी पसंद किया गया था। इन दोनों फिल्‍मों में आधुनिक यूरोप के राष्‍ट्रवाद के भीतर की उपराष्‍ट्रीयताओं की अस्मिता का संघर्ष भी दिखाया गया है। कोई भव्‍य और महंगी दृश्‍य-श्रंखलाएं नहीं हैं। समाज के तलछंट में जी रहे लोगों के जीवन के दुख, संघर्ष और खुशियों को कॉमेडी के मूड में दिखाया गया है। कई बड़े फिल्‍मकारों की तरह फतिह अकीन मानते हैं कि अभिनय तो फुटपाथ पर बिखरा पड़ा है, एक फिल्‍मकार को चाहिए कि वो अपने हिसाब से उसे चुनकर एक तस्‍वीर में बदल दे। फिल्‍म की शैली को देखकर नई पीढ़ी के पसंदीदा वरिष्‍ठ फिल्‍मकार वांग कार वाई (हांगकांग) की याद आती है, खासतौर पर उनकी चर्चित फिल्‍म ‘शूंग किन एक्‍सप्रेस’ की। 
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धर्मांधता के खिलाफ सिनेमाई हस्तक्षेप : गोवा से अजित राय

फिल्‍म का दृश्‍य 

सुप्रसिद्ध भारतीय फिल्‍मकार गौतम घोष की नई फिल्‍म मोनेर मानुष (द क्‍वेस्‍ट) धर्मांधता के खिलाफ एक सशक्‍त सिनेमाई हस्‍तक्षेप है। भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह के प्रतियोगिता खंड में इसे प्रदर्शित किया गया है। यह फिल्‍म भारतीय पैनोरमा खंड की भी एक विशिष्‍ट कृति है। भारत और बांगलादेश में एक साथ 3 दिसम्‍बर 2010 को रिलीज किया जा रहा है। इसमें दोनों देशों के कलाकारों ने काम किया है। 1952 के बाद पहली बार ऐसा होने जा रहा है।
ज्ञानपीठ पुरस्‍कार विजेता बांगला लेखक और साहित्‍य अकादमी के अध्‍यक्ष सुनील गंगोपाध्‍याय की कहानी पर आधारित यह फिल्‍म उस सूफी संत लालन फकीर के बारे में है, जिन्‍होंने हिन्‍दुओं और मुसलमानों की धार्मिक कट्टरता का जवाब प्रेम और करूणा की एक नयी मानवीय परंपरा को बनाकर दिया। फिल्‍म में पहले से बनी बनायी कोई कहानी नहीं है। 19वीं सदी में घटित बंगाल के नव जागरण की पृष्‍ठभूमि में फिल्‍म शहरी बौद्धिकता और देशज ज्ञान की बहस का सिनेमाई आख्‍यान रचती है। गुरूदेव रवीन्‍द्रनाथ ठाकुर के बड़े भाई और अपने जमाने के चर्चित चित्रकार ज्‍योतिन्‍द्र नाथ ठाकुर लालन फकीर को अपने घर आमंत्रित करते हैं, यह 1889 का अविभाजित बंगाल है और जीवन एवं जगत के बारे में कई सवालों पर बातचीत करते हैं। लालन फकीर के जीवन को फ्लैश बैक में देखते हुये हम एक विस्‍मयकारी देशकाल की यात्रा करते हैं। जीवन के अधिकतर जटिल सवालों के जवाब फिल्‍म में विलक्षण संगीत के माध्‍यम से दिए गए हैं। इस प्रकार फिल्‍म का गीत संगीत, फिल्‍म की पटकथा और संवादों के अंग हैं। यह फिल्‍म जीवन और समय के बारे में एक अद्भुत संगीतमय आख्‍यान है। खास बात यह है कि 19वीं सदी के अंतिम दिनों के बंगाल का देशकाल जिस जीवंतता के साथ प्रस्‍तुत होता है, उसे देखना एक दुर्लभ अनुभव है।
बंगाल के एक निर्धन हिन्‍दू परिवार में जन्‍मे लालन फकीर को दूसरा जीवन मु‍स्लिम परिवार में मिलता है। बाउल संगीत की परंपरा उन्‍हें सूफी दर्शन से जोड़ती है। उन्‍होंने तब के अविभाजित बंगाल में हिन्‍दू और मुस्लिम धर्मांधता के खिलाफ शांति, करूणा एवं सह-अस्तित्‍व की नई परंपरा शुरू की। जिसकी जरूरत आज पहले से कहीं अधिक है। नदी, जंगल, खेत, आसमान, हवा, आग, पानी यानी प्रकृति मनुष्‍य के इतने करीब सिनेमा में बहुत कम देखी गई है। गौतम घोष का कैमरा एक तिनके से लेकर पानी की बूंद और हवा की सरसराहट को भी बड़े सलीके से दृश्‍यों में बदलता है। उन्‍होंने लगभग लुप्‍त हो चुके लालन फकीर के गीतों और धुनों को पहली बार इतनी मेहनत से पुनर्जीवित किया है। बांगला देश के सूफी गायक फरीदा परवीन और लतीफ शाह ने अपनी गैर-व्‍यावसायिक आवाजों से वास्‍तविक प्रभाव पैदा किया है। गौतम घोष को बांगलादेश के कुश्तिया में 85 वर्षीय फकीर अब्‍दुल करीम खान ने लालन के संगीत के खजाने के बारे बताया था।
फिल्‍म का दृश्‍य
फिल्‍म में हम साधारण लोगों की करिश्‍माई छवियां देखते हैं। जहां जीवन अपनी सहजता में अद्भुत कलात्‍मक और दार्शनिक ऊंचाई पर पहुंचता है। एक स्‍त्री जिसका प्रेमी नपुंसक हो चुका है, अपनी शारीरिक कामना के आवेग में लालन फकीर के पास जाती है और निराश होकर लौट जाती है। आश्‍चर्य है कि अपने एक सहयोगी की उत्‍कट देहाकांक्षा को पूरा करने के लिए लालन उसी स्‍त्री से अनुरोध करते हैं। फिल्‍म स्‍त्री पुरूष संबंधों में प्रेम, सेक्‍स, समर्पण और शरीर से जुड़े जटिल सवालों का आसान जवाब गानों के रूप में सामने रखती है। धर्म, समाज, परिवार और रिश्‍तों की दुनिया में लालन फकीर का संगीत किसी आध्‍यात्मिक ऊंचाई के बदले दिल की धड़कन की तरह मौजूद है। गौतम घोष की करिश्‍माई सिनेमाटोग्राफी प्रकृति और मनुष्‍य के रिश्‍तों को दिन रात के बदलते काल चक्र के पर्दे पर खूबसूरती से उकेरती है। लालन फकीर की भूमिका में बांगला फिल्‍मों के सुपर स्‍टार प्रसेनजीत चटर्जी का अभिनय जादुई असर पैदा करता है। उनकी आंखें और उनका चेहरा बिना संवाद के दृश्‍यों में बहुत कुछ कहता रहता है। 

गौतम घोष
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सिनेमा का बाजार और बाजार में सिनेमा : गोवा से अजित राय

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Film Socialism
 पणजी, गोवा, 24 नवम्‍बर
भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह में राष्‍ट्रीय फिल्‍म विकास निगम ने भारतीय फिल्‍मों का दुनिया भर में बाजार विकसित करने के लिए गोवा के मेरियट रिजार्ट में चार दिवसीय फिल्‍म बाजार इंडिया, 2010 का आयोजन किया है। इसमें पहली बार अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍मोत्‍सव में भारतीय फिल्‍मकारों की भागीदारी बढ़ाने के लिए गंभीर प्रयास किए जा रहे हैं। इसी क्रम में आज लोकार्नो अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍मोत्‍सव के निदेशक ओलिवर पेरे ने घोषणा की कि अगले वर्ष गोवा में होने वाले भारत के 42वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह से लोकार्नो फिल्‍म समारोह का एक विशेष पैकेज प्रदर्शित किया जाएगा। उन्‍होंने दुनिया भर के फिल्‍मोत्‍सवों में भारतीय फिल्‍मों की कम होती भागीदारी पर चिंता व्‍यक्‍त की।
Director Godard
फिल्‍म बाजार में पहली बार अफ‍गानिस्‍तान, भूटान, बांग्‍लादेश, पाकिस्‍तान, श्रीलंका, नेपाल से आमंत्रित प्रोजेक्‍ट शामिल किए गए हैं। इसके अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, फ्रांस, नीदरलैंड से फिल्‍मों के कई जाने-माने खरीददार और एजेंट शामिल हो रहे हैं। एन एफ डी सी की प्रबंध निदेशक नीना लाठ गुप्‍ता का कहना है कि ‘हमारी मुख्‍य चिंता इस बात की है कि अधिक से अधिक भारतीय फिल्‍में विश्‍व के अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍मोत्‍सवों में शामिल हो सकें तथा दूसरे देशों के साथ फिल्‍म निर्माण के साझा प्रोजेक्‍ट शुरू किए जाएं। ‘
गोवा फिल्‍मोसव की सबसे खास बात यह है कि जिन फिल्‍म प्रेमियों को दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित फिल्‍म समारोह – कान फिल्‍मोत्‍सव (फ्रांस) – में जाने का अवसर नहीं मिला, उनके लिए वहां से चुनी हुई दस फिल्‍मों का एक विशेष खंड प्रदर्शित किया जा रहा है। इसमें फ्रेंच न्‍यू वेब के प्रमुख फिल्‍मकार ज्‍यां लुक गोदार की नई फिल्‍म ‘फिल्‍म सोशियलिज्‍म’ और मशहूर ईरानी फिल्‍मकार अब्‍बास किरस्‍तामी की पुरस्‍कृत फिल्‍म ‘सर्टीफाइड कॉपी’ शामिल हैं। अन्‍य फिल्‍मों में ‘आउटरेज’ (ताकेशी किटानो), वी आर व्‍हाट वी आर (सबना गज्‍जंती), यंग गर्ल्‍स इन ब्‍लैक (जीन पाल सिवेयरेक), रूट आइरिश (केन लोच), ए स्‍क्रीमिंग मैन (महामत सलेह हारून), द ट्री (जूली बर्तुसेली), द सिटी (क्रिस्‍टोफ होचस्‍टर) आदि।
भारत सरकार की सिनेमा से जुड़ी सभी संस्‍थाओं-एजेंसियों को अब लगने लगा है कि बाजार ही उनका अस्तित्‍व बचाए रख सकता है। फिल्‍म प्रभाग पिछले 60 वर्षों में बनी फिल्‍मों का वेबकास्‍ट जारी करने वाला है। प्रभाग द्वारा बनाई गई फिल्‍मों की मार्केटिंग के लिए एन एफ डी सी के साथ समझौता किया गया है। करीब 110 करोड़ की लागत से बनने वाले देश के अनूठे सिनेमा संग्रहालय बनाने का जिम्‍मा भी सरकार ने फिल्‍म प्रभाग को सौंपा है। फिल्‍म प्रभाग आज से शास्‍त्रीय नृत्‍य एवं नृत्‍य गुरुओं पर बनी फिल्‍मों का उत्‍सव शुरू कर रहा है। प्रभाग के महानिदेशक कुलदीप सिन्‍हा ने उम्‍मीद जताई है कि भारतीय सिनेमा के शताब्‍दी वर्ष 2013 में सिनेमा संग्रहालय फिल्‍म प्रेमियों के लिए उपलब्‍ध हो जाएगा। यह संग्रहालय मुंबई में बनाया जा रहा है।
भारत के अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍मोत्‍सवों में राष्‍ट्रीय फिल्‍म संग्रहालय (NFAI, Pune) पुणे की बड़ी भागीदारी होती है। इस बार कई फिल्‍मों को फिर से संरक्षित किया गया है। ऐसी 5 फिल्‍में गोवा में प्रदर्शित की जा रही हैं, जिनमें 1931 में बनी पी वी राव की मूक फिल्‍म ‘मार्तण्‍ड वर्मा’ और मृणाल सेन की ‘बाईशे श्रावण’ प्रमुख हैं। एन एफ ए आई ने पणजी की कला अकादमी में दादा साहेब फाल्‍के पुरस्‍कार से सम्‍मानित फिल्‍मी हस्तियों पर एक महत्‍वपूर्ण पोस्‍टर प्रदर्शनी भी लगार्इ है। इसमें पहली बार पुरस्‍कृत देविका रानी (1969) से लेकर इस बार पुरस्‍कृत डी रामानायडू (2009) तक की यात्रा को प्रदर्शित किया गया है। इन फिल्‍मी हस्तियों से जुड़ी फिल्‍मों के दुर्लभ पोस्‍टरों को देखना एक अलग तरह का अनुभव है। बाजार में इन पोस्‍टरों की कीमत अब काफी बढ़ गई है। इस प्रदर्शनी से पता चलता है कि सुप्रसिद्ध अभिनेता पृथ्‍वीराज कपूर को 1971 में दादा साहेब फाल्‍के अवार्ड दिया गया था। इसके अगले ही साल (1972) उनका निधन हो गया। यही घटना उनके बड़े बेटे राज कपूर के साथ घटी। जिन्‍हें 1987 में यह सम्‍मान मिला और अगले ही साल (1988) उनका निधन हो गया। इस प्रदर्शनी में सत्‍यजीत राय, अडूर गोपालकृष्‍णन, श्‍याम बेनेगल, अशोक कुमार, लता मंगेशकर आदि की फिल्‍मों के दुर्लभ पोस्‍टर लगाए गए हैं।
कन्‍फेडरेशन ऑफ इंडियन इंडस्‍ट्रीज द्वारा आयोजित ‘द बिग पिक्‍चर वर्कशाप’ में इस बात पर काफी चर्चा हुई कि यूरोप अमेरिका की बजाय एशिया-अफ्रीका में भारतीय फिल्‍मों के बाजार की अधिक गुंजायश है। फिल्‍म निर्माण और वितरण से जुड़े अधिकतर लोगों का कहना है कि गोवा में इन देशों के प्रतिनिधियों को आमंत्रित किया जाना चाहिए।
गोवा में कुछ अविस्‍मरणीय कालजयी फिल्‍मों को बड़े परदे पर दोबारा देखने का आनंद भी अलग तरह का है। मशहूर अभिनेता अशोक कुमार की याद में बिमल राय की फिल्‍म ‘बंदिनी’ का विशेष प्रदर्शन किया गया। यह फिल्‍म सचिन देव बर्मन के विलक्षण संगीत के कारण भी याद की जाती है। इस अवसर पर अशोक कुमार की पोती अनुराधा पटेल और उनके भाई सुप्रसिद्ध गायक के बेटे किशोर कुमार के बेटे अमित कुमार ने ठीक ही कहा कि ‘दादामुनि भारत के पहले रैपस्‍टार थे। बीना राय की स्‍मृति में ‘अनारकली’ को देखना एक अलग अनुभव है।
गोवा फिल्‍मोत्‍सव में एक तरफ जहां यूरोप की आधुनिक फिल्‍में हैं तो वहीं दूसरी तरफ भारत की क्‍लासिक फिल्‍में भी हैं। आधुनिकता और परम्‍परा के बीच सिनेमा पर कई बहसें भी चल रही हैं। लाख टके का सवाल यह भी है कि इतने सारे भगीरथ प्रयासों के बावजूद हिन्‍दी सिनेमा की कोई विशेष पहचान विश्‍व–स्‍तर पर क्‍यों नहीं बन पा रही है। यहां दुनिया भर से आए फिल्‍मकारों से बात कीजिए, वे सत्‍यजीत राय, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन से लेकर गौतम घोष तक की बातें तो करेंगे लेकिन हिन्‍दी फिल्‍मकारों के बारे में वे कुछ नहीं जानते।
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'ईस्‍ट इज ईस्‍ट' के बाद अब 'वेस्‍ट इज वेस्‍ट' : गोवा से अजित राय

पणजी, गोवा, 23 नवम्‍बर
अजित राय
भारत के 41वें अंतरराष्‍ट्रीय फिल्‍म समारोह की उद्घाटन फिल्‍म वेस्‍ट इज वेस्‍ट इस समारोह की सर्वश्रेष्‍ठ फिल्‍मों में से एक है। यह फिल्‍म करीब एक दशक पहले बनी ईस्‍ट इज ईस्‍ट का दूसरा भाग है, जिसने दुनिया भर में करीब 160 करोड़ रुपये का कारोबार किया था। यह फिल्‍म भारत के सु‍प्रसिद्ध अभिनेता ओमपुरी को विश्‍व के महान अभिनेताओं की पंक्ति में ला खड़ा करती है। ब्रिटिश फिल्‍म की निर्माता लैस्‍ली एडविन ने बताया कि लगभग 18 करोड़ रुपये की लागत वाली यह फिल्‍म ब्रिटेन और भारत में अगले वर्ष 25 फरवरी को एक साथ रिलीज की जाएगी। इसमें मुख्‍य भूमिकाएं ब्रिटिश कलाकारों के साथ ओमपुरी, इला अरुण, विजयराज, राज भंसाली आदि भारतीय कलाकारों ने निभाई है। उन्‍होंने कहा कि वे इस श्रंखला की तीसरी फिल्‍म ‘ईस्‍ट इज वेस्‍ट’ की पटकथा पर तेजी से काम कर रही हैं।
‘वेस्‍ट इज वेस्‍ट’ ब्रिटेन के मैनचेस्‍टर शहर में साल्‍फोर्ड इलाके में बसे एक पाकिस्‍तानी जहांगीर खान की कहानी है जो 35 साल पहले 1940 में अपनी पहली बीवी बशीरा और अपनी बेटियों को छोड़कर आ गया था। मैनचेस्‍टर में उसने एक आयरिश महिला से प्रेम विवाह किया जिससे उसके कई बेटे हुए। ‘ईस्‍ट इज ईस्‍ट’ 1975 के ब्रिटेन में पाकिस्‍तानी समाज के जिस सांस्‍कृतिक संकट पर खत्‍म होती है, वहीं से ‘वेस्‍ट इज वेस्‍ट’ शुरू होती है। ‘ईस्‍ट इज ईस्‍ट’ के अंतिम दृश्‍य में हमने देखा था कि जहांगीर खान अपनी पत्‍नी एली पर हाथ उठाता है, तभी उसका बड़ा बेटा उसका हाथ पकड़ लेता है। उसे अब लगता है कि पुराने सामंती मूल्‍यों के सहारे अब उसका परिवार नहीं चल सकता। ‘वेस्‍ट इज वेस्‍ट’ की शुरूआत जहांगीर खान की पाकिस्‍तान यात्रा से होती है। जहां वह 35 साल पहले अपने परिवार को छोड़ गया था। वह अपने दो बेटों को साथ लाता है और चाहता है कि दोनों पाकिस्‍तानी की तरह प्रशिक्षित हों। उसे पता चलता है कि इन पैंतीस सालों में सब कुछ वैसा ही नहीं है, जैसा वह छोड़ कर गया था। उसे बहुत ग्‍लानि होती है कि उसने अपने पहले परिवार की घोर उपेक्षा की है। इसी पारिवारिक संघर्ष पूरब और पश्चिम की संस्‍कृतियों की टकराहट और नए पुराने मूल्‍यों की रस्‍साकसी के बीच फिल्‍म आगे बढ़ती है। इस फिल्‍म की शूटिंग भारत के पंजाब प्रांत में हुई थी क्‍योंकि पाकिस्‍तान सरकार ने निर्माताओं को इसकी अनुमति नहीं दी थी।
‘वेस्‍ट इज वेस्‍ट’ में 1976 के एक पाकिस्‍तानी गांव के परिवेश की जीवंत तस्‍वीर पेश की गई है। माहौल को वास्‍तविक बनाने के लिए छोटी से छोटी बातों का ख्‍याल रखा गया है। यहां तक की जहांगीर खान का छोटा बेटा साजिद ‘पंजाब’ को ‘पुंजाब’ कहता है क्‍योंकि अंग्रेजी में उसने पीयूएनजेएबी पढ़ा है। फिल्‍म मानवीय रिश्‍तों की परतों के बीच सांस्‍कृतिक अस्मिता के संघर्ष को ताजगी के साथ प्रस्‍तुत करती है।  पूरी फिल्‍म में कहीं भी शोर, हिंसा, एक्‍शन और भड़काऊ चमक-दमक नहीं है। रोब लेन और शंकर अहसान लॉय का अद्भुत सूफी संगीत दर्शकों को एक रूहानी दुनिया में ले जाता है। एक-एक दृश्‍य खूबसूरत चित्र की तरह है। दृश्‍यों के रंग चरित्रों के आपसी संवाद और उनके मनोभावों को दिखाते हैं। फिल्‍म में एक ऐसी दुनिया रची गई है जहां हर पात्र अपनी-अपनी जगह सही होते हुए भी एक अनवरत यातना सह रहा है। अंत में हम देखते हैं कि जब जहांगीर खान की दूसरी पत्‍नी एली उसे ढूंढते हुए ब्रिटेन से पाकिस्‍तान पहुंचती है और काफी उहापोह के बाद जहांगीर खान अपने बच्‍चों के साथ वापस ब्रिटेन लौटने का फैसला करता है तो वह कहता अपनी पहली पत्‍नी से कहता है ‘’मैंने जो जीवन चुना था, वह यह नहीं है।‘’
ओमपुरी वेस्‍ट इज वेस्‍ट के एक दृश्‍य में
‘वेस्‍ट इज वेस्‍ट’ में जहांगीर खान के केन्‍द्रीय चरित्र को ओमपुरी ने अपने अभिनय से अविस्‍मरणीय बना दिया है। लेस्‍ली एडविन ने फिल्‍म के प्रदर्शन के मौके पर ठीक ही कहा कि ‘’ओमपुरी विश्‍व के महान अभिनेताओं में से एक हैं। ‘’ उन्‍होंने एक पिता, दो पत्नियों के पति, पाकिस्‍तानी मुसलमान और ब्रिटिश नागरिक के रूपों को एक ही चरित्र में सुंदर तरीके से समायोजित किया है। उनके बचपन की जो दुनिया छूट गई है उसे वे अपने बच्‍चों के माध्‍यम से पाना चाहते हैं। लेकिन बच्‍चों के सामने आधुनिक ब्रिटेन और यूरोप है। फिल्‍म में संवादों से अधिक चरित्रों का मौन बोलता है। एक विलक्षण दृश्‍य में जहांगीर खान की पहली पत्‍नी बशीरा और दूसरी पत्‍नी एली का संवाद है। बशीरा अंग्रेजी नहीं जानती जबकि एली को पंजाबी नहीं आती। बशीरा पंजाबी बोलती है और एली अंग्रेजी में उसका जवाब देती है। यह दो स्त्रियों का अद्भुत संवाद है। जो दिल की धड़कनों की भाषा से एक दूसरे को समझने की कोशिश करती हैं। बीच-बीच में सूफी संत समय की व्‍याख्‍या करते रहते हैं। किशोर साजिद अपनी तरह से पाकिस्‍तानी गांव में एक नई और रोमांचक दुनिया से परिचित होता है।
फिल्‍म की निर्माता लेस्‍ली एडविन ने खचाखच भरे सभागार में हिंदी में दर्शकों से मुखातिब होकर सबको खुश कर दिया।  उन्‍होंने हिंदी में कहा कि इस फिल्‍म समारोह में ‘वेस्‍ट इज वेस्‍ट’ के प्रदर्शन के मौके पर मैं इतनी खुश हूं कि मेरे पैर जमीन पर नहीं हैं।

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