शबनम धुली थी,महकी कली थी,
पंखुडी नाज़ुक, खुलने लगी थी,
मन के द्वारों पे दस्तक हुई थी,
वो चाहत किसी की बनी थी!
शबनम धुली थी ....
बिछुड़ने वाली थी उसकी वो डाली,
जिस पे वो जन्मी,पली थी,
उसे कुछ खबर ही नहीं थी,
पी की दुनिया सजाने चली थी,
शबनम धुली थी.. ...
बेसाख्ता वो झूमने लगी थी,
पुर ख़तर राहों से बेखबर थी
वो राह प्यारी, वो मन की सहेली,
हाथ छुडाये जा रही थी,
शबनम धुली थी.....
कहता कोई उससे कि पड़ेगी,
सबसे जुदा,वो बेहद अकेली,
तो कली, सुनने वाली नहीं थी!
पलकों में ख्वाबों की झालर बुनी थी!
शबनम धुली, वो महकी कली थी,
वो महकी कली थी...
ऐसा था, यौवन के दहलीज़ पे क़दम रखना...! बचपन को भुलाना...और फिर याद करना...!
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पंखुडी नाज़ुक, खुलने लगी थी,
मन के द्वारों पे दस्तक हुई थी,
वो चाहत किसी की बनी थी!
शबनम धुली थी ....
बिछुड़ने वाली थी उसकी वो डाली,
जिस पे वो जन्मी,पली थी,
उसे कुछ खबर ही नहीं थी,
पी की दुनिया सजाने चली थी,
शबनम धुली थी.. ...
बेसाख्ता वो झूमने लगी थी,
पुर ख़तर राहों से बेखबर थी
वो राह प्यारी, वो मन की सहेली,
हाथ छुडाये जा रही थी,
शबनम धुली थी.....
कहता कोई उससे कि पड़ेगी,
सबसे जुदा,वो बेहद अकेली,
तो कली, सुनने वाली नहीं थी!
पलकों में ख्वाबों की झालर बुनी थी!
शबनम धुली, वो महकी कली थी,
वो महकी कली थी...
ऐसा था, यौवन के दहलीज़ पे क़दम रखना...! बचपन को भुलाना...और फिर याद करना...!


