वरिष्ठ कवि महेंद्र भटनागर की कविता -
प्राण दीप
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रात भर जलता रहा
यह दीप प्राणों का अकेला!
वेग लेकर नाश का आया पवन था,
शक्ति के उन्माद में गरजा गगन था,
दीप, पर, अविराम जलने में मगन था,
आ नही जब तक गई
संसार में नवस्वर्ण-बेला।
रात भर जलता रहा
यह दीप प्राणों का अकेला!
रात भर हँस-हँस सतत जलता रहा है
आँधियों के बीच भी पलता रहा है,
आतातायी का अहम दलता रहा है,
मूक हत भयभीत मानव
को दिया जगमग उजेला
रात भर जलता रहा
यह दीप प्राणों का अकेला।
(कवि से आभार सहित)
सुशील कुमार की कविता
ज्योति-पर्व की इस सांध्य बेला में।
आओ मिलकर दीप जलायें
घर-बाहर,सब नगर-डगर में।
छायी है निराशा घोर जहाँ
घनी तमिस्त्रा तन-मन में,
वहाँ हर्ष के फूल खिलायें
काली रात सब दूर भगायें।
दीवारों पर नहीं सिर्फ़
ज्योति-पर्व की सांध्य-बेला में
आस जगी है अंदर-बाहर,
मन के मैल भी दूर भगायें।
हँसी-खुशी बीते यह जीवन
बिखरे हों सब-ओर प्रकाश-कण
सुख-दु:ख सब मिल-बाँटकर
राग-द्वेष सब फाँक-फाँककर
नये पथ पर नई उमंग में
हम सब मिल नये रंग में
चलो फिर से नये ढ़ंग में
हर हृदय में प्रेम-दीप जलायें
कोना-कोना आज जगायें
घर-बाहर, सब नगर-डगर में।


