छवि- अजन्ता शर्मा
अजंता शर्मा नोयडा से हिंदी की अत्यंत संभावनशील युवा कवयित्री हैं। ‘नुक्कड़’ के सुधी पाठकों के लिये मैं उनकी यहां एक कविता मल्हार प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसमें इस मौसम के अनुकूल एक सरस-सलिला प्रेम-विरह की बानगी निखर कर सामने आयी है जिससे आशा है, आप अभिभूत हुये बिना नहीं रहेंगें। आपसे अनुरोध होगा कि इनकी हौसला-आफ़जायी के लिये आप कविता पर अपनी ओर से टिप्पणी देना न भूलें- सुशील कुमार।
मल्हार
अचानक
किसी बसंती सुबह
तुम गरज बरस
मुझे खींच लेते हो
अंगना में .
मैं तुममें
नहा लेने को आतुर
बाहें पसारे
ढलक जाती हूँ .
मेरा रोम रोम
तुम चूमते हो असंख्य बार .
अपने आलिंगन में
भिगो देते हो
मेरा पोर पोर.
मेरी अलसाई पलकों पर
शीत बन पसर जाते हो.
माटी के बुलबुलों में छुपकर
मेरी पायल का
उन्माद थामते हो.
मेरा हाथ पकड़
जिस डार तले
तुम खींचते हो,
उसकी कनखियों से
मैं लजा जाती हूँ.
नाखूनों से खुरचती हूँ
जमीन.
और हाथ पसार
कुछ मुक्ता जुटाती हूँ.
शिख नख
तुम ह्रदय बन झरते हो.
मुझे हरते हो .
बारिश संग
जब
तुम बरसते हो



