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कौन कहता है कि कविता के पाठक कम हुए हैं : कविता हो या न हो पर पाठक तो मौजूद हैं खूब सारे

पढ़ आइए और टिप्‍पणी देने का मन करे तो वापिस लौट आइए। फैसला कर ही डालिए कि कविता क्‍या होती है ?


देह खिलाती है गुल
बत्‍ती करती है गुल
विवेक की
मन की
जला देती है
बत्‍ती तन की।
देह सिर्फ देह ही होती है
होती भी है देह
और नहीं भी होती है देह।
देह धरती है दिमाग भी
देह में बसती है आग भी
देह कालियानाग भी
देह एक फुंकार भी
देह है फुफकार भी।
देह दावानल है
देह दांव है
देह छांव है
देह ठांव है
देह गांव है।

देह का दहकना
दहलाता है
देह का बहकना
बहलाता नहीं
बिखेरता है
जो सिमट पाता नहीं।
देह दरकती भी है
देह कसकती भी है
देह रपटती भी है
देह सरकती भी है
फिसलती भी है देह।
देह दया भी है
देह डाह भी है
देह राह भी है
और करती है राहें बंद
गति भी करती मंद।

टहलती देह है
टहलाती भी देह
दमकती है देह
दमकाती भी देह
सहती है देह
सहलाती भी देह।


मुस्‍काती है
बरसाती है मेह
वो भी है देह
लुट लुट जाती है
लूट ली जाती है
देह ही कहलाती है।
देह दंश भी है
देह अंश भी है
देह कंस भी है
देह वंश भी है
देह सब है
देह कुछ भी नहीं।
देह के द्वार
करते हैं वार
उतारती खुमार
चढ़ाती बुखार
देह से पार
देह भी नहीं
देह कुछ नहीं
नि:संदेह।


http://www.nukkadh.com/2012/05/blog-post_2708.html
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आज का फैसला और आपका हौसला .......................... अविनाश वाचस्‍पति

जब इतना रख लिया है तो तनिक सा और रख लो और यकीन मानो जितना रखोगे उससे मिलने वाला फल अद्भुत मिठास लिए हुए होगा । जिसने भी रखा है, इस मिठास को मन से चखा है, उसने इस का महत्‍व जाना-माना है। आप रखोगे तो आप भी मान जाओगे, इसके मुरीद हो जाओगे। जबकि आपको मनाने के लिए कोई नहीं आएगा। आपके भीतर से ही इसको मानने की इच्‍छाशक्ति जागृत होगी। जब मिठास मिलेगी तो आप भी मिठास ही दोगे न, वह मिठास आपकी बोली में इस कदर रची-घुली होगी कि लेने वाला दिव्‍य-मिठास से ओत-प्रोत हो जाएगा।

आप सोच रहे होंगे, बल्कि कईयों ने तो फैसला भी ले लिया होगा कि मैं क्‍या रखने की भूमिका बना रहा है और वे भी गलत नहीं हैं क्‍योंकि आजकल माहौल ही ऐसा है कि कोई भी धन से दीगर सोच ही नहीं पाता है। धन के होने को ही सब अच्‍छाईयों की वजह पाता है। मैं मानता हूं कि धन की ताकत अपरंपार है। पर अपरंपार होते हुए भी पार नहीं पहुंचा पाता है, जबकि किनारा नजर आ रहा है। जिसका किनारा दिखलाई दे रहा हो, उसे मालूम नहीं, मानव क्‍यों अपरंपार मान लेता है। जबकि मानव जहां पहुंच जाता है, उसे अपरंपार नहीं कहा जाना चाहिए। अपरंपार तक तो मानव की पहुंच ही संभव नहीं है। जहां मानव पहुंच ही गया तो वो अपरंपार नहीं रहा।

जीवन में जिनके पास पैसा नहीं होता है और न आने की उम्‍मीदें भी होती हैं। उनके पास इतनी मिठास होती है कि कई धनवान भी अचरज में पड़ जाते हैं और ईर्ष्‍या कर बैठते हैं, जबकि ईर्ष्‍या भाव मन में स्‍वयं ही पैदा हो जाता है। ईर्ष्‍या कभी रखने-सहेजने की चीज नहीं रही है पर फिर भी बहुतायत में सहेजी जाती है। होना तो यह चाहिए कि इसे मन में आने से पहले ही निकालकर बाहर कर देना चाहिए।
मैंने सब्र रखने की बात की है। आप मानेंगे कि सब्र से बड़ी ताकत, इस कायनात में कुछ भी नहीं है। जिसने सब्र रख लिया, उसने सकल जग पा लिया। धैर्य के बल पर कठिन से कठिन संकटों को काटा जाता है। सहनशक्ति धारण करने के लिए पैसा मददगार नहीं हुआ है। पैसा कभी इतना ताकतवर न तो हुआ है और न कभी होगा कि वो सब्र का मुकाबला कर सके। आप एक बार रखकर तो देखिए, सभी फल मीठे मिठास भरे ही मिलेंगे और इस मिठास से न शरीर को, न दिल को, न जिगर को, न रक्‍तवाहिनियों को और अन्‍य किसी अंग को या विचारों को नुकसान पहुंचता है। तो आज जो भी फैसला आये, उसे हौसले से सुनिये, सहन करिये। जान लीजिए कि हौसला ही सबके वजूद का सबब बनता है। तो आप फैसला सुनने के बाद भी सब्र रख रहे हैं न ? घड़ी इम्‍तहान की है।
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