योग गुरू बाबा रामदेव लोगों को ये सिखाते नहीं थकते कि जिंदगी में संयम बनाये रखना है तो योग की शरण में आओ। लेकिन धारा 377 को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट के ताजा फैसले पर अपनी वाणी पर संयम नहीं रख पाये। समलैंगिकता को लेकर एक टीवी चैनल पर बहस के दौरान बाबा ने जो कहा उसे यहां लिखा नहीं जा सकता मगर उनका मतलब ये था कि " वो जगह किसी और काम के लिये है" यौन संबंध के लिये नहीं। तमाम धर्माचार्य भी कोर्ट के इस फैसले से आग बबूला हैं। इनके मुताबिक समलैंगिकता धर्म विरोधी है, घृणित कर्म है, एक मानसिक विकृति है, एक ऐबरेशन यानि विचलन है जिसका विरोध न किया गया तो समाज का पतन निश्चित है। बाबा और धर्माचार्यों को समझने के लिये भारतीय सभ्यता, संस्कृति और इतिहास सब ताक पर रखनी पड़ेगी। क्योंकि इन महापुरूषों ने भारतीय संस्कृति का एक नया इतिहास रचने का हठ कर लिया है। इस नये इतिहास का पहला चैप्टर सेक्स और समलैंगिकता पर होगा। इसमें खजुराहो और कोणार्क के मंदिरों के इरॉटिक शिल्पकारी की बात नहीं बतायी जायेगी, उन चित्रों में दिखाये गये ओरल सेक्स का जिक्र बाबा की किताब में नहीं होगा। READ MORE...
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