ठिकाने
बदल जाते हैं
ठिठक जाते हैं दौड़ने वाले
जीतने वाले, जिताने वाले
फिर भी सब मतवाले हैं
खुद को जिंदा मारे हैं
मालूम है उन्हें
जानते हैं वह
लटके हुए हैं सबके पैर
उस कब्र पर
जो चाहे अनखुदी है
दिखाई नहीं देती है
पर मौजूद है।
यह मौजूदगी
इंसान की है
इंसानियत की
भी हो सकती है
नहीं भी
यह सबके अपने
अपने निजी अनुभव हैं।
सांसों का मीटर
नहीं आता नजर
पर चलता रहता है
रुकने पर भी
नहीं होता आभास
पर मीटर तो मीटर है
वही बनता किलोमीटर
उसका जीवन कोश है
कोष कब रिक्त हो जाए
न तुम जानते हो
न मुन्ना(अविनाश वाचस्पति)
न अन्य कोई।
यही कोश निरंकुश लगता है
पर इस पर भी किसी का अंकुश
कसा तो जाता है
जब गहरे से कसता है
न तब और न जब धीरे से
कसने पर पीड़ा होती है।
जीवन को ढूंढा है पीड़ा मे
तुझमें ढूंढूंगा पीड़ा
पीड़ा जो सच है
पीड़ा ही दर्द है
सच मानो मित्रो मेरे
पीड़ा ही सच्चा जीवन है।
ठिठक जाते हैं दौड़ने वाले
जीतने वाले, जिताने वाले
फिर भी सब मतवाले हैं
खुद को जिंदा मारे हैं
मालूम है उन्हें
जानते हैं वह
लटके हुए हैं सबके पैर
उस कब्र पर
जो चाहे अनखुदी है
दिखाई नहीं देती है
पर मौजूद है।
यह मौजूदगी
इंसान की है
इंसानियत की
भी हो सकती है
नहीं भी
यह सबके अपने
अपने निजी अनुभव हैं।
सांसों का मीटर
नहीं आता नजर
पर चलता रहता है
रुकने पर भी
नहीं होता आभास
पर मीटर तो मीटर है
वही बनता किलोमीटर
उसका जीवन कोश है
कोष कब रिक्त हो जाए
न तुम जानते हो
न मुन्ना(अविनाश वाचस्पति)
न अन्य कोई।
यही कोश निरंकुश लगता है
पर इस पर भी किसी का अंकुश
कसा तो जाता है
जब गहरे से कसता है
न तब और न जब धीरे से
कसने पर पीड़ा होती है।
जीवन को ढूंढा है पीड़ा मे
तुझमें ढूंढूंगा पीड़ा
पीड़ा जो सच है
पीड़ा ही दर्द है
सच मानो मित्रो मेरे
पीड़ा ही सच्चा जीवन है।


