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जनसंदेश टाइम्‍स रविवार दिनांक 1 मई 2011 का पेज नंबर 19 हिन्‍दी ब्‍लॉगों पर केन्द्रित है

ब्‍लॉग पोस्‍टें ही पोस्‍टें हैं चहुं ओर
ब्‍लॉग लोक है
जिसने फैलाया आलोक है ।

क्लिक करिए और
पढ़ते जाइये
एक एक करके
पोस्‍टें सारी पढ़ते
जाइये।

ढूंढ़ कर इनके ब्‍लॉग
बधाई तो दे ही आइये
मत शर्माइये
ब्‍लॉग पर सीधे जाकर
धमक जाइये।

सफेद घर है
बाहर भीतर है

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प्रिय सुभाष भाई की वापसी बात बेबात पर : आइये स्‍वागत करें

श ब्‍दों की जीवंतता
कला या रचना केवल विचार नहीं है, नारा या भाषण भी नहीं. अपनी प्रभविष्णुता को बढ़ाने के लिए रचनाकार कला और शिल्प के उपकरणों क़ा इस्तेमाल करता है, कइÊ बार पुराने औजारों की जड़ता या प्रभावहीनता उसे नए शिल्प गढ़ने को भी मजबूर करती है. यह कलात्मकता ही उसे दर्शकों, पाठकों या श्रोताओं के बीच ले जाती है. यह सब कला के सिद्धांत और दर्शन की बातें हैं, अगर आप इन पर बहस कर सकते हैं तो केवल पेट और तिजोरी के खेल में प्राणपण से जुटे लोगों की भीड़ से अलग नजर आ सकते हैं पर क्या आप इस मान-प्रतिष्ठा से संतुष्ट होकर उपदेशक की भूमिका अख्तियार करना चाहेंगे या एक जरूरी सवाल से जूझने क़ा साहस करेंगे ... पूरा पढ़ने और प्रतिक्रिया देने के लिए यहां पर‍ क्लिक कीजिएगा
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प्रवासी लेखकों को प्रकाशक नहीं मिलते

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डीएवी गर्ल्‍ज़ कॉलेज, यमुनानगर, हरियाणा और कथा यूके के तत्‍वावधान में प्रवासी साहित्‍य संगोष्‍ठी का आयोजन पिछले दिनों चर्चा में रहा। इस संगोष्‍ठी के एक सत्र पर प्रकाशित गीता चतुर्वेदी की दैनिक जनसंदेश टाइम्‍स, लखनऊ में प्रकाशित एक रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहां क्लिक कीजिए। 
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