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चूनाव की नाव, पब्लिक का लक : दैनिक जनवाणी 8 अप्रैल 2014 अंक में संपादकीय पेज पर तीखी नजर स्‍तंभ में प्रकाशित


देश में 10 अप्रैल 14 को चुनाव संपन्‍न होने हैं या बड़े अथवा फिल्‍मी पर्दे पर लड़ाई भिड़ाई का दृश्‍य फिल्‍माया जा रहा है। इस संबंध में प्रचार और प्रसार की भाषा तो यही बतला रही है कि किसी फीचर फिल्‍म के संवाद सुनाई दे रहे हों जबकि इसे परदे पर देखने पर ऐसा नहीं लगेगा। परदे पर तो इन सबके चुनकर आने के बाद जूते, चप्‍पल, माइक, घूंसे, लातों की जोर आजमायश इन्‍हें यश दिलवाने में अहम् भूमिका दिलाते हैं। इन अनूठे पलों के जीवंत दृश्‍य छोटे परदे पर दिखलाए जा  हैं।  जिनके जाल में  पब्लिक उलझ-उलझ जाती है और अपने वोट को किसी न किसी सपने दिखाने वाले को सौंप आती है। जबकि वह जानती है कि दोनों ने ही नफरत वाली राजनीति की है और उसी की ताकत के बल पर फिर से सत्‍ता  हथियाने को तैयार बैठे हैं।
किसी पार्टी के पद पर आने के लिए फॉर्म भरकर दाखिल दफ्तर के लिए खड़ा होना तो ऐसे कहा जाता है मानो कोई शिशु पहली बार कोशिश करके खड़ा हो गया हो।  टिकट लेने को लाईसेंस लेने की प्रक्रिया से जोड़कर देखा जा सकता है। वोट अपने पक्ष में डलवाने की कोशिशों को लड़ना और दारू तथा नकदी के वितरण की  भिड़ाई कहकर चुनाव की सारी व्‍याकरण ही बदल दी जाती है। चुनाव की नई व्‍याकरण सचमुच में ही  बहुत मौजूं है।  आप इसी के मजे में इतराते रहते हैं और इतराने के नशे की गिरफ्त में अपना वोट इसलिए इन्‍हें सौंप आते हैं क्‍योंकि इन्‍हें तो किसी न किसी को देना ही है और यह सामने आकर लुभाने वाले को बेहिचक दे आते हैं।
किसी के विजयी होने को कीमतें गिरने के संदर्भ में देखा जाता है। जबकि हारने को किसी जमानत जब्‍त नहीं हुई और इतने सारे वोट मिले हैं। सिर्फ कुछ सौ, हजार या लाख वोटों की कमी को ऐसे माना जाता है, जैसे कुछ सौ पैसों की बात हो रही हो।

आओ चुनाव में खड़े हो जाएं में अपनी कल्‍पना की ताकत का रुतबा दिखलाकर देखिए कितना मनोरंजक व मनभावन चित्र सामने ले आते हैं। इसी प्रकार चुनाव लड़ना सोचने विचारने पर दिलखुश कर देता है। मानो चुनाव न होकर डब्‍ल्‍यू डब्‍ल्‍यू एफ की ड्रॉमेटिक कॉमेडी युद्ध चल रहा हो। युद्ध में भी आनंद लूटना इस खेल की विशेषता है।अइस प्रकार पूरे चुनाव का व्‍याकरण एक हंसी मजाक बनकर रह गया है। यह हंसी मजाक राजू श्रीवास्‍तव, सुनील पाल,बनवारी झोल जैसे कॉमेडियन्‍स का खिलौना बन गया है। जिनका पेशा  पब्लिक को हंसा हंसाकर नोट कमाना है। आजकल हास्‍य कविता हास्‍यास्‍पद कविता बन गई है जबकि हास्‍यास्‍पद कविता मनोरंजक कॉमेडी प्रदर्शन। पर इनके दर्शन आंखें नहीं,  कान करते हैं। चुनाव वह नाव है जो आम पब्लिक का लक बन गया है। जिसने पब्लिक और सरकार को लूट लिया है, वह लकी। जो नहीं लूट पाया,वह बिना उछलने वाला मंकी। मंकी वह जो अपने मन की की यानी चाबी का मालिक हो। इसलिए आज सभी चाहते हैं कि चुनाव की नाव में विजयी होकर मन की सागर से बाहर निकलकर अपना पूरा का पूरा भुवन सुधार लें। पर इसके लिए काला धन चाहिए, जिन चेहरों पर स्याह रंग की बरसात हुई, वह दिन में स्‍वप्‍न देखते हैं, दिन के अपनी मर्जी के रंग के होते हैं। चाहो तो उन्‍हें काले रंग में देख लो,वरना वह रंगीन तो बनायेंगें ही  मस्ती भरी निंदियाई आंखों को। इन्‍हें देखने के लिए धन नहीं खर्च होता पर इनका निर्माण, निर्देशन आपकी कल्‍पना की ताकत, रचना की तार्किकता, सच्‍चाई की डराने वाली अभिव्‍यक्तियां, अनुभूति बनाकर दिखलाती हैं। इसलिए हम सब मस्‍त रहे हैं।  मंकी वही जो मन की जादू की की यानी चाबी कब्‍जाकर व्‍यस्‍त और मस्‍त रहे। इन दिनों जादू की छड़ी की नहीं, जादू की चाबी का काला जादू उम्‍मीदवारों  के फेस पर मारा जा रहा है। वह करें भी तो क्‍या, क्‍योंकि ऐसा मौका दोबारा तो मिलने से रहा।
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तलाक कहकर ताला किया लॉक‍ : जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नज़र' 18 जून 2013 अंक में प्रकाशित


अब सब रहे हैं लॉफ। लॉफिग यह बुद्धा की नहीं है, सर्फिंग यह विशुद्ध नहीं है। इस हंसने में जीवन नहीं है, चहकने का बिल्‍कुल मन नहीं है। परिहास से शुरू हुआ सफर हास्‍यास्पद गति तक पहुंच गया है। तलाक कहा और कर दिया रिश्‍तों का ताला लॉक। शायरी का भरपूर बेड़ा गर्क हुआ है, जान लीजिए बंदर के हाथ में अदरक दिया है। दुआ दे रहे हैं जीने की और तीन कदम उपर बढ़ते ही वह जीना तोड़ देते हैं। करते हैं जो दवा उसमें भी मिलाते हैं दारू और कहते हैं कि कारूं का खजाना हाजिर है। दुआओं में उनकी छेद इतने सारे, नीयत में होने लगे हैं बंटवारे,  जिसमें षडयंत्र बैठा है पैर पसारे। नीयत मंडरा रही है कुर्सी के आसपास। न किसी को आस, न किसी को विश्‍वास। जब दिल ही टूट गया अब पीकर क्यों मरेंगे, मरने के बाद भी पीने का बिल भरेंगे। कुर्सी नहीं मिलने का रहा भरोसा, फिर एक कदम भी मिलकर क्‍यों चलेंगे।

आह भरी बदनाम हुए, इतना भारी नाम हुआ, तलाक दिया जिसके तले कुचलकर उनका काम तमाम किया। कत्‍ल करने की जरूरत पड़ी नहीं, दफा 302 लगी नहीं। उनके मरने के इल्‍जाम चार सौ बीसी करके उनके उपर ही दे मारे, कुर्सी के गुल कर दिए सभी सितारे। कुर्सी की महक इनके मन में महकती है। महक बोले तो मेरा हक, चल छिछोरे दूर हट, मत कर लिपट-झिपट, यह कुर्सी है खुदगर्जी की, सिर्फ मेरी मर्जी की, नहीं ताकत किसी अर्जी की। नमो की ताकत ऐसी जैसे सिंह दहाड़ा। यह दहाड़ रहे हैं, वह पहाड़ पर भाग-भाग कर चढ़ाई कर रहे हैं। सोचते हैं कुर्सी पहाड़ा पढ़ रहे हैं। पहाड़ से ही गिरे हैं, इसलिए दबे-कुचले हैं, रिश्‍तों को बनाया दिया है नासूर इसलिए अब नहीं मिल रहा एक भी सुर, सब बने गए हैं असुर।

मजबूत लोहा समझा था, न गुमां था कि यूं ही भरभराकर ताश के महल की तरह ढह जाएगा। बरतन की आवाज घर की रसोई में रोजाना आती है। आवाज से यह कयास मत लगायें कि सब चूर चूर चकनाचूर हो गए होंगे। आपने जो बताया मान लिया कि जहां पर बरतन गिरे, वह सीमेंट का फर्श पक्‍का था। अहसास था कि रिश्‍तों की ताकत बहुत मजबूत होती है पर देख रहे हैं सब कि अब उनसे रक्‍त रिस रहा है। रिश्‍ते यह रस्‍सी से कमजोर निकले। न सुलझी रस्‍सी की गांठ उलटे उलझ गई रिश्‍तों की गांठ न खुली, न सुलझी, हुई बरबादी और किया सत्‍यानाश। कह रहे हैं उनके अपने रिश्‍तों की रस्‍सी काट डाली गई।

इतना गैरपना कि बैरपना भी शर्मिन्‍दा है, कोई लिहाज नहीं । बरतन की छोड़ें अब पेड़ की सोचें - पेड़ भी काटा जाता है तो उसकी लकडि़यों में चीरा लगाकर उसको उपयोगी बना लेते हैं।  उन लकडि़यों की पेड़ के उपर ही मचान बना सकते हैं और रच सकते हैं बेशकीमर्ती फर्नीचर। सब कुछ स्‍वाहा कर दिया। पेड़ के पेड़पने को कुर्सी मोह की दीपक चट कर गई।  तनिक गुंजायश नहीं रही, न आस बची, न भरोसा डटा और विश्‍वास तो टूट ही गया – चारों तरफ सत्‍यानासी के बीज पड़े हुए थे, मन की गांठ की देखी करामात। चुनाव बतलाएगा किस किसके पड़ी, कैसी पड़ी लात। दिख रहा है कि दोनों की होगी अब करारी मात।

पत्‍थर से दिल लगाया और तन कुचला पाया। दोनों का न रहेगा अब नामलेवा, लगता है इसलिए ना ना कर बैठे। अपनी-अपनी शैया पर शूल जड़ लिए। कुर्सी से दिल लगाया और लोहे से चोट खाई। सोच रहे हैं कि कुर्सी ही लोहे की क्‍यों नहीं बनाई, वाणी आडवाणी की दूर पार्श्‍व में हो गई मौन है। कुर्सी की मलाई की चिकनाहट ने ऐसा रपटाया है।  मंसूबे बांध लिए हैं ऐसे-ऐसे कि लोहे की कुर्सी बनवाएंगे उसमें अपने नेता की वेल्डिंग करवाएंगे।  पर इसकी भनक मानसून को लग गई।  दरार को पाटने तेरह दिन पहले ही चली आई जबकि तेरह दिन के महात्‍मय से कौन परिचित नहीं है। लग रहा है कि जरूर किसी की तेरहवीं होकर रहेगी। मोदी का गुजरात से बाहर आना पूरे राजनीतिक परिदृश्‍य में रात का घेरा कस रहा है। पर उसका चहेता गोदी में बैठा हंस रहा है। जब रात है ऐसी मतवाली तो सुबह का आलम क्‍या होगा ?
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कल्‍पना में इतराता खुराफाती मन : दैनिक जनवाणी 12 मार्च 2013 स्‍तंभ 'तीखी नजर' में प्रकाशित


खुराफाती मन कई मजेदार कल्‍पनाओं में इतराने लगा है। सोच रहा है‍ कि इस आयु से उस आयु तक के लेखक बच्‍चों के विषय पर लेखन नहीं कर सकेंगे। बच्‍चों के लिए सिर्फ बच्‍चे ही लिख सकेंगे अथवा महिलाएं भी। हो सकता है बच्‍चों के लिए पुरुषों का लिखना प्रतिबंधित कर दिया जाए। हो तो यह भी सकता है कि बड़ों के लिए लिखे जाने वाले साहित्‍य पर 30 प्रतिशत बच्‍चों के द्वारा लिखने का आरक्षण लागू किया जाए। संभावना है कि पुरुष विषयों पर पुरुष अथवा स्त्रियों के विषय पर स्त्रियां ही लिख सकेंगी। फिर कन्‍याओं पर लिखने का आरक्षण किसे मिलेगा और किशोर किशोरियों पर लिखने के लिए किसका आरक्षण होगा। विदेशी और विदेशिनों पर लिखने के लिए प्रवासी भारतीय अपना आरक्षण अवश्‍य करवाने की जोरदार मांग करेंगे।
कहानी लिखने वाले को सिर्फ कविता लिखने पर और व्‍यंग्‍य लिखने वाले को पाठक के नाम पत्र लिखने के लिए आरक्षण का लाभ दिया जा सकता है। इसी प्रकार ग़ज़़ल लिखने वाला कविता नहीं लिख सकेगा। वह चाहे तो परिचर्चा तैयार कर सकता है। इसी प्रकार हिंदी वाला हिंदी में और अंग्रेजी वाला अंग्रेजी में लिख सकेगा तथा अन्‍य भाषा बोली धारक भी अन्‍य भाषाओं में नहीं लिख सकेंगे। आरक्षण सिर्फ अपनी मातृभाषा में लिखने का ही होगा।
विषय बहुत मौजूं है और विचार भी मजेदार होंगे। यह भी किया जा सकता है कि नए लेखकों को सिर्फ संपादक अथवा सरकारी विभागों के नाम लिखे गए पत्रों पर पते लिखने का आरक्षण ही किया जाए। यह आरक्षण समाचार पत्र लिखने वालों के लिए होगा या इसमें पत्रिकाएं भी शामिल रहेंगी और पुस्‍तकों के संबंध में क्‍या कानून रहेगा। जिस क्षेत्र में आरक्षण हो लेखक उसी विधा में लिख सकेगा, किसी अन्‍य में घुसपैठ करना सर्वथा वर्जित रहेगा और ऐसा करने पर जुर्माने की व्‍यवस्‍था के साथ ही लेखक को काली सूची में भी फेंका जा सकता है। इसी प्रकार पकवान कला और सुंदरता पर सिर्फ महिलाएं और पुरुषों की आवारागर्दी की पोल महिलाएं लिखकर नहीं खोल पाएंगी। और जिन्‍हें अधिकार होंगे वे भला क्‍यों कर खोलेंगे – लेखन में आरक्षण के यह नुकसान भी जरूर होंगे। चुगली कला पर लिखने के लिए विशेषज्ञता की अनिवार्यता होती है, जिन्‍हें इसका अनुभव नहीं होगा, वे इसमें से रोचकता के सभी किले नेस्‍तनाबूद कर सकते हैं।
आरक्षण सिर्फ विषय पर ही होगा या विधा पर भी होगा। हो सकता है कलम, बालपैन,पैंसिल से लिखने के लिए आरक्षण लागू कर दिया जाए।  लेखन में आरक्षण होगा तो प्रकाशन में भी आरक्षण की मांग उठेगी कि बाल पत्रिकाओं में बच्‍चों के अतिरिक्‍त कोई नहीं लिख पाए और उसके संपादकीय विभाग में भी बच्‍चों की ही नियुक्ति आरक्षित हो। बाल पत्रिकाओं के अतिरिक्‍त किसी भी अखबार और पत्र-पत्रिका द्वारा बाल सामग्री प्रकाशित करने पर रोक लगाने की मांग की जा सकती है। यही पैमाना महिलाओं, पुरुषों के मामले में लागू होगा किंतु वाहन संबंधी पुस्‍तकों और जानवरों की जानकारी देने वाली पुस्‍तकों का लेखन किसके लिए आरक्षित किया जाएगा। ऐसा ही आरक्षण पाठकों के संबंध में किया जाना चाहिए। आरक्षण का लाभ दिए जाने पर पाठकों के हित में भी आरक्षण किया जा सकता है। 
अभी तक तो संपादकीय लेखन संपादक के लिए आरक्षित रहा है लेकिन यह हो सकता है कि सप्‍ताह के कुछ संपादकीय लिखने की जिम्‍मेदारी पाठकों के लिए आरक्षित कर दी जाए। अपनी पुस्‍तक की समीक्षा खुद ही लिखी जा सकेगी। कोई अन्‍य धुरंधर समीक्षक भी उस पर लिखने अथवा विचार करने के लिए आरक्षित नहीं होगा। वैसे लेखन में आरक्षण के बारे में इतना ज्ञान बघारने के बाद भी मैं बिल्‍कुल नहीं समझ पा रहा हूं, हो सकता है कि नासमझों के लिए व्‍यंग्‍य में स्‍थान आरक्षित कर दिया जाए और कविता लिखने का हक सिर्फ समझदारों के लिए ही। ऐसे ही प्रावधान स्‍तंभ लेखन के संबंध में किए जा सकते हैं। फिर क्‍या पारिश्रमिक का चैक लेखन का कार्य भी लेखक को ही सौंप दिया जाएगा। वैसे इसका अधिकार लेखक को ही होना चाहिए कि अपनी रचना के लिए पारिश्रमिक खुद ही तय करे। वही जानता है कि उसने लिखने में कितनी मेहनत की है अथवा कहीं से टीप टाप के लेख लिख दिया है।  लेखक को तो सिर्फ हस्‍ता‍क्षरित और मुहरलगे असली चैकों की पुस्‍तकें सौंप देनी चाहिएं। कहो कैसी रही, आप भी लगे हाथ कुछ कह डालिए, आरक्षण लागू होने के बाद संकट से जूझना जो पड़ेगा।
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मिशन, कमीशन या करप्‍शन : दैनिक जनवाणी स्‍तंभ 'तीखी नजर' 5 मार्च 2013 में प्रकाशित



किसका मिशन कमीशन नहीं है। जिसे नहीं मिलता है कमीशन, वह सदा ही रहता है सन्‍न। जो हमें कमीशनखोर कह रहे हैं, वे सभी कमीशन के मिशन को अपनाए हुए हैं। कमीशन की वैतरणी में सब उतरते हैं। कमीशन के मिशन को नहीं अपना पाया, वह किसलिए सत्‍ता में आया। फिर कमीशन न होता तो सत्‍ता के धंधे में मात्र पचास हजार या एक लाख रुपये की पगार पाने के लिए कौन सत्‍ता में आता। इससे अधिक तो किसी सरकारी मलाई वाली नौकरी में पाता। जिस काम में कमीशन रहता है, उसे तन, मन और अपने धन से भी इसलिए किया जा सकता है क्‍योंकि उसमें पाने का आस्‍वाद रचा बसा होता है। इस धरा पर धरने के लिए कोई नहीं आया है, सब पाने आए हैं। इसलिए पाने मेंसब खुश हैं। पाने में पालने से हुई शुरूआत कुर्सी पाने तक पहुंचती है। पूत के पांव पालने से कुर्सी तक न पहुंच पाए तो पूत के सपूत होने में संदेह तारी हो जाता है। इसलिए पूत के जन्‍म लेने के बाद से ही कमीशन की गंगा बहाई जाती है। न कमीशन बुरा लगता है,न गंगा बुरी लगती है। दरअसल जो मिलता है, वह कभी बुरा नहीं होता।
जो दिया जाता है, कई बार वह भी भला ही होता है। भला जिससे लाभ मिल रहा हो, उसे बुरा कैसे कहा जा सकता है। कमीशन प्रत्‍येक प्रकार के मिशन का आदरभाव है। यह आदि सत्‍य है, इस सत्‍य को जिसने जान लिया, समझ लीजिए वह राजनीति रूपी वैतरणी से पार, वरना तो डूबा मंझधार। उसका नहीं मिलेगा कोई तारणहार।  जिसने नहीं जाना, वह किसी तालाब को भी पार नहीं कर सकता। तालाब की तो छोडि़ए किसी पोखर अथवा गंदेनाले को पार करना भी उसके बस का नहीं है। अब जो किनारे पर है, उसको सदा ही दूर वाले दूसरे किनारे पर पहुंचकर हथियाने का मोह मन में बसता है। सभी पार्टियों और उसके रसूखदारों के मन में यह मोह व्‍याप्‍त है, आप किसी से भी कितनी ही दरियाफ्त कर लो। किनारा सिर्फ दरिया का ही नहीं होता है। हर सौदेबाजी में किनारा होता है। गंदा सिर्फ नाला ही नहीं होता, गंगा भी होती है। उसकी गंदगी में जो तर गया है, उसे तैरने में माहिर समझें। जो तैरने से परिचित होते हैं पर सत्‍ता में नहीं होते, वे मजबूरीवश इस ओर खूब जोर से चिल्‍लाते और शोर मचाते हैं। यह चिल्‍लाना और शोर मचाना उनका स्‍थायी भाव बन जाता है।
सत्‍ता के पक्षियों के सामने वाले विपक्षी न जाने किस श्रेणी के हैं, जो आपस में दुश्‍मन बने हुए हैं। पशु पक्षियों और जानवरों के प्रेम को इन्होंने बिसरा दिया हैं इसलिए ही तो बिसूर रहे हैं। जो काम मिल जुलकर किया जा सकता है, चाहे सौदेबाजी हो अथवा कमीशनबाजी, सब मिलकर ही पार उतरते हैं। खुद तो पार उतरते ही हैं, अपने परिवारजनों और नाते-रिश्‍तेदारों, बंधु, मित्र और बांधवों को पार उतारने के ठेके भी लेते हैं। यह ठेका लेना कब से कमीशनखोरी हो गया। अब अगर अपने लोगों की ही मदद नहीं की तो क्‍या राजनीति में गंजे होने के लिए आए हैं। गंजे होना होता तो राजनीति से बाहर रहकर ही गंजे होते, उसमें अधिक मजा आता। राजनीति में गंजे होने की भी कीमत मिलती है। अभी तो ‘क’ से कमीशन है, कल को ‘भा’ से भार यानी कमीशन होगा। अचरज मत कीजिए शब्‍दों की वर्णमाला और उनके अर्थ कैसे भी संयोजित किए जा सकते हैं। कमीशन एक तरह का भार ही है, भालू नहीं है, जो उससे डरा जाए। भार और कमीशन एकदूसरे के समानअर्थ धर्मा हैं। जितना भारी होगा, उतना ही लुभाएगा, अपने पास बुलाएगा।
इसमें भला किसे संदेह होगा। कमीशन की कोई देह नहीं होती है, दस्‍तावेज होते हैं, कई बारवे भी नहीं होते हैं क्‍योंकि कंप्‍यूटर की आभासी देह में रहते हैं इसलिए पकड़ लिए जाते हैं।जिन मामलों में देह नहीं होती, उसमें दिल भी नहीं होता है, वे सर्वथा सुरक्षित रहते हैं। कोई नहीं चाहता कि पकड़ा जाए। इतने बड़े भारी भरकम सौदों की तो छोडि़ए, एक छोटा बच्‍चा दुकान से पेंसिल, कलम, कापी या जीभ के स्‍वाद के लिए टाफी की चोरी करता है,वह भी कभी नहीं चाहता कि पकड़ा जाए। वो तो इन नामुराद सीसीटीवी कैमरों, तकनीक के उल्‍लुओं ने ऐसी तैसी करके रख दी है, वरना वह चोर ही क्‍या जो पकड़ा जाए।आजकल चोरी चोरी से चले जाते हैं पर हेराफेरी से नहीं जाते। राजनीति में प्रवेश करना हेराफेरी ही है। राजनीति में अब डकैती का जमाना है। किसी के माई के लाल में दम नहीं,जो पकड़ पाएगा या गरदन नापने की कोशिश करेगा। चुनाव की नाव में डूबने का भय न होता तो सब निर्भय होते, कोई निर्भया न होती,  जमाना यूं ही सो जाता दास्‍तां कहते कहते। 
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पीएम पद की मिठाई खाने की लालसा : दैनिक जनवाणी 26 फरवरी 2013 स्‍तंभ 'तीखी नज़र' में प्रकाशित



चोर पुलिस का खेल चल रहा है। एक बच्‍चे ने जिद की है कि वह तो पुलिस बनेगा। चोर बनकर तो अपनी सारी कलाबाजियां दिखला चुका है। अब उसे पुलिस बनकर भाग्‍य आजमाने दो। वह पुलिस बन जाता है और खूब कहर ढाता है। सारे चोर यानी चोर बने बच्‍चे बिखर जाते हैं, खेल बंद हो जाता है। अब खेल के खेल में हालत यह हो गई है कि सब पुलिस ही बनना चाहते हैं, चोर तलाशने से भी नहीं मिल रहे हैं। जबकि सारे चोर हैं और मुखौटों का वर्चस्‍व है।
पीएम की कुर्सी खाली नहीं है, कोई शख्‍स उस पर चुपचाप कब्‍जा जमाए बैठा है। वह मन में लड्डू फोड़ रहा है कि इस बार पीएम बनने का मौका एक जवान को दूंगा। जवान मन ही मन मान बैठा है कि वही भविष्‍य का पीएम बन सकता है। दूसरे काम करते हुए भी उसकी निगाहें कुर्सी पर हैं। वह कुर्सी पर बैठने के चक्‍कर में घोड़ी पर भी नहीं बैठ रहा है। कहीं इधर वह घोड़ी पर बैठा, उधर कुर्सी पर कोई और बैठ गया तो ? घोड़ी पर बिना सवारी किए घूमने का आनंद लिया जा सकता है, पर एक बार कुर्सी न मिली तो सारा खेल बिखर जाएगा। वह कुर्सी को अपने लिए हकीकत मान आत्‍ममुग्‍ध है, उसकी आत्‍ममुग्‍धता परवान पर है।
चोर पुलिस का खेल नेपथ्‍य में पहुंच गया है। अब पीएम की कुर्सी के चारों ओर गहमागहमी मच चुकी है। जिनसे अपने घर की कुर्सियां भी छीन ली गई हैं, वह भी घर से बाहर निकल आए हैं। वे सब चिल्‍ला रहे हैं,चीख पुकार मची हुई है। यह चीख पुकार आतंक की नहीं है। पर उनके पीएम बनते ही जरूर आतंक फैलेगा। पब्लिक इससे परिचित है पर वह मजबूर है .मजबूर पब्लिक मजदूर के माफिक है। वह उनके हित में अपने वोट को हिट करेगी, इसे सब जानते हैं। बिना वोट के पीएम की कुर्सी पर बैठने की कवायद तेज है।
कुर्सी के खेल में कोई गोदी से उतर आता है, कोई अपनी माया दिखलाता है, कोई यूं ही डींगें हांक रहा है,मतलब सब एक कुर्सी को अपनी पूरी ताकत से अपनी ओर खींचने में जुट गए हैं। देश यह देखने में इतना बिजी हो गया है कि देश के शरीर में कहीं पीड़ा हो रही है, पीड़ा उन जख्‍मों में है जो उसे अभी ताजा-ताजा लगे हैं। जख्‍म मौसमी हैं पर उनके लिए बजट तैयार किया जा रहा है। इस बीच नींद आनी स्‍वाभाविक है। माया से अभिभूत एक नेत्री नींद में है। दिन में सोते हुए सपनों में निमग्‍न हैं। नींद में वह बड़बड़ा भी रही है। उनका बड़बड़ाना लालकिले पर पीएम के भाषण के माफिक है। नींद में दिए गए भाषण और उसकी नींद पूरी तरह से सुर्खियों में है। गिनीज बुक ऑफ वर्ल्‍ड रिकार्ड्स वाले इस घटना को शामिल करने की औपचारिकताएं पूरी कर रहे हैं। यह देख समझकर वे खूब खुश हैं, देश भी खुश है, उनके मातहत भी खुश हैं। चारों ओर से खुशी फूट-फूट कर रिसायमान है।
कोई नहीं चाह रहा है कि यह मायावी तिलिस्‍म टूटे। इसे सपनों की पीएम बने रहने दो। सपनों में ही लालकिले पर भाषण करने दो। उधर कोई पीएम की गोदी में उचककर बैठने को आतुर है। कयास लग रहे हैं कि पीएम तो वही बनेंगे पर पीएम की कुर्सी पहले खाली तो हो !
पीएम न बनने के दुख पर सब चुप हैं, कोई दुखी नहीं होना चाहता। पीएम बनने के सुख सबकी आंखों में स्‍वप्‍न की चमक को निखार रहे हैं। इस कुर्सी को हथियाने के लिए न जाने कितना सहना पड़ता है, सहकर भी चुप रहना पड़ता है, पर पीएम बनने की भूख है कि मिटती नहीं । पीएम का पद पकवान सरीखा है जबकि यह वह जलेबी नहीं है जो सीधी हो। सीधी जलेबियां राजनीति में तो मिलती नहीं हैं। सब खीर खाना चाहते हैं, एक साथ टूट भी पड़ते हैं पर जिस बरतन पर वे एक साथ भूखों की तरह लारातुर हैं, वह रसमलाई है। खीर पर एक चौकस बिल्‍ली की नजर है, वह उसे अपने जवान होते बच्‍चे को खिलाएगी। उसने सारे जोड़-तोड़ और जुगाड़ बिठा लिए हैं।

रचना घर : छपन छपाई
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तानाशाह की विदाई हुई संपन्‍न

गद्दाफी को एक  गद्दा तक न नसीब हुआ, यूं ही मारा गया। खुद तो डूबा, जान के लिए गिड़गिड़ा कर तानाशाही का नाम भी डुबो गया। तानाशाह पर व्‍यंग्‍य लिखने का ठेका नहीं मिला है, हौसला बुलंद इसलिए हो गया है क्‍योंकि तानाशाह की विदाई संपन्‍न हो गई है। जिसका न जीवन व्‍यंग्‍य था और न उसका जाना व्‍यंग्‍य है। आना तो सबका एक सा रोना रहता है। रोने का रंग सबके संग आता है। इसमें तानाशाही व्‍यंग्‍यकार की नहीं, एक तानाशाह की ही चलती है। तानाशाह शब्‍द का आरंभ व्‍यंग्‍य के एक प्राणतत्‍व ताना से ही शुरू हुआ है। लेकिन यह ताना है, बाना नहीं है, इसे आप भी जानते हैं। व्‍यंग्‍य लेखन में हिटलरी चलती है, या यूं कहूं कि व्‍यंग्‍यकारों की कलम मचलती है, उछलती है, कूदती है – कहीं कहीं पर बिसूरती भी है। आपने उसके बिसूरने को बिसरा दिया होगा, यह मुझे पक्‍का मालूम है।
वह अनेक रंग बिखेरती है। अब जो तानाशाह गोली खाकर मर गया, उस पर क्‍या तो व्‍यंग्‍य लिखें और क्‍या ताना मारें। उसके जीते जी उसे व्‍यंग्‍य विषय बनाने और उस पर लिखने की कूबत किसी व्‍यंग्‍यकार की नहीं हुई थी और अब हालत यह है कि सभी उसको कलम से कोंचने में जुट गए हैं। कुछ सीधे कीबोर्ड से ही खटराग की रागनी गा रहे हैं। मैं भी उनमें से एक हूं। तानाशाह पर व्‍यंग्‍य लिखा तो खुदा भी व्‍यंग्‍यकार की मदद नहीं कर सकता, सब जानते हैं। सत्‍ता का यह शाही अंदाज सबको लुभाता है, पर सबका बस नहीं चल पाता है। आप इसमें लिंगदोष मत ढूंढने बैठ जाइये। मान लिया कि बस स्‍त्रीलिंग है पर व्‍यंग्‍य तो स्‍त्रीलिंग है। जी हां, तानाशाह के गांव में आकर सभी पुल्लिंग स्‍त्रीलिंग हो जाते हैं, यह तानाशाही का अनूठा अंदाज है।
लोकसत्‍ता में हर दूसरे दिन कुर्सी पर खतरा मंडराता रहता है क्‍योंकि नेता बन जाते हैं खूब सारे, खुद ही अपने लिए लगाते हैं नारे, अपनी ही मूर्तियां बनवाते हैं, खुद ही उन पर फूल चढ़ाते हैं। इसलिए 5 बरस कुर्सी पर ठहर जाएं तो इतरा जाते हैं। उनका इतराना जायज है। इसी तराने पर मोहित होकर प्रजा कई पांच साला पैकेज गिफ्ट कर देती है।  इसके उलट तानाशाही में सब हथियाया जाता है। तानाशाह विरला ही हो पाता है। तानाशाह के रंग तो कई बरस लगातार बरसात की तरह बरसते रहते हैं। पिछले सप्‍ताह जिसे विदा किया, उसके यहां 42 बरस से लगातार धुंआधार बरसात हो रही थी। तानों की असली बरसात व्‍यंग्‍य में होती है। व्‍यंग्‍य में ही तानों की खेती होती है। यह ऐसी खेती है जो बिना बीजों के की जाती है और खूब फसल देती है, बरसात में भी नहीं डूबती। खेती करना भी प्रत्‍येक के बस का नहीं है। प्रत्‍येक व्‍यंग्‍यकार किसान नहीं हो सकता और न ही प्रत्‍येक व्‍यंग्‍यकार कार चलाने में निपुण होता है। किसान इसलिए कार नहीं चलाता क्‍योंकि फिर वो हल चलाते समय भी गियर तलाशेगा।
व्‍यंग्‍य में जब तक पुलिंग नहीं होगी, तब तक तीखा रंग नहीं निखरेगा। वैसे कुछ ही व्‍यंग्‍य या व्‍यंग्‍य उपन्‍यास होते हैं, जिनका राज बरसों से निरंतर चल रहा है। मानस में महामारी की तरह मचल रहा है। वरना तो अखबारी व्‍यंग्‍य की उम्र तो उसी दिन पूरी हो जाती है वह तो व्‍यंग्‍यकार ही उसे अपने साथ घसीटता रहता है। घिसटना व्‍यंग्‍य को पड़ता है रोजाना। तानाशाह कभी-कभार ही घिसटता है। वह विषय से लिपट उसमें रच बस जाता है लेकिन उसकी हुकूमत कायम नहीं रह पाती, जो तानाशाही में निखरकर दिव्‍य स्‍वरूप पाती है।
तानाशाह न गोली खाता है, न गाली खाता है। इन दोनों मामलों में ही उसका बहुत मुश्किल से खुलता खाता है। गोली सरेआम और गाली, वे ही खिला पाते हैं जो छिप कर देते हैं। सामने आकर गाली खिलाने का किसी में दम नहीं होता। कभी किसी तानाशाह को जूता मारा गया हो, इसकी भी मिसाल नहीं है, वह सीधा गोली खाता है। तानाशाह ताना नहीं मारता, जान लेता है, जान देता है यानी नाता ही तोड़ देता है। न जान रहेगी, न व्‍यंग्‍यकार तनतनाएगा।
माना कि व्‍यंग्‍य लेखन के भी उसूल होते हैं। पर जिंदा तानाशाह पर व्‍यंग्‍य लेखन से जिंदगी भी सलामत रहेगी, इसका भरोसा नहीं किया जा सकता। अब व्‍यंग्‍यकार का जो चालान होना हो, हो जाए। जान रहेगी तो भुगत कर दुख सुख का परिचय प्राप्‍त कर पाएगा। जानेगा कि दुख कैसे फनफनाते हैं। मुझे गोली न मारें, गाली चाहें कितनी दे दें –अब यह छूट भी मिली, समझ लीजै।

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पीपी ने बढ़ाया बीपी, आओ चलें सीपी

पीपनी बच्‍चों को बहुत प्‍यारी लगती है। देखने में पकड़कर बजाने में उसका कोई जवाब नहीं। उसे छूने में भी बच्‍चों को मजा आता है। पीपनी की आवाज बच्‍चों को ही नहीं, बड़ों को भी मस्‍त कर देती है। वही पीपनी आज क्रिकेट की तरन्‍नुम में झूम रही है और विश्‍वभर के क्रिकेट प्रेमियों को मस्‍त कर रही है। क्रिकेट का विश्‍व कप अभी जीता भी नहीं था कि पीपी यानी पूनम पांडेय ने सभी क्रिकेट उन्‍मादियों के लिए पीपनी का मादक स्‍वर छेड़ दिया। सभी उसी में मस्‍त हो गए। सबकी आंखों में गुलाबी डोरे तैर गए।
सबको यह उम्‍मीद थी कि पीपी ने विजयी खिलाडि़यों के सम्‍मान में न्‍यूड होने का जो फरमान जारी किया है, उसे वह अमल में जरूर लाएगी। इस घोषणा से सबका बढ़ा बीपी आज तक भी नीचे नहीं उतरा। विश्‍व क्रिकेट कप भारत को मिल गया परंतु पीपी ने कहा कि उसे न्‍यूड होने की परमीशन नहीं मिली। उसने भरोसा दिलाया है, उसकी इन्‍हीं मीठी बातों में मस्‍ती भी है पर उस मस्‍ती की पाठशाला ने शुगरधारकों की शुगर बढ़ा दी है। आखिर मीठी बातें भी तो देह में मीठापन बढ़ाती ही हैं।  
अचंभे की बात तो यह है कि वो न्‍यूज में बराबर बनी हुई है पर न्‍यूड नहीं हो रही है। जिसके कारण विशेष हैं, परंतु देखने वाले शेष हैं, प्रतीक्षा में हैं। कितनों ने तो तब से आज तक पलकें नहीं झपकाई हैं कि कहीं पलक झपकी और उसे ताड़ने के लक से हाथ धो बैठे। आजकल संचार के इस युग में इतना जोखिम सब क्‍यों ले रहे हैं, यह भी तो समझ नहीं आ रहा है। जबकि पोर्नो साइटों से साइबर संसार भरा पूरा है। पर सीधे आंखों से जो नहीं देखा, वो तो अधूरा है।  

पीपी की विशिष्‍ट पहचान अब विश्‍व कप में धमाल मचाने के तौर पर दर्ज हो चुकी है। पूनम के चांद की तरह उसने क्रिकेट के चांद को असीम ऊर्जा प्रदान की है। वो पूनम है पर नम नहीं है। उसे पहचान कर बहुत सारे लोग नम हो गए हैं। वे उसको नमन करने के लिए लालायित हैं परंतु वो परमीशन मांग रही है। पीपी की चाहना है कि जुटी रहे पर लुटे नहीं। वो न तो क्रिकेट प्रेमियों से परमीशन मांगेगी, क्‍योंकि वे तो बिना परमीशन ही चौकस हैं,  पूनम के देहजाहिर मिशन को सक्‍सेस स्‍टोरी उन उन्‍मादियों ने बनाया है। पूनम की घोषणा के बाद वे कल्‍पना के घोड़े नहीं, ऊंट, तोते उड़ा रहे थे।
भारतवासी एक संस्‍कृति प्रधान देश के बाशिन्‍दे हैं। ऐसे नहीं कि विवाह करने के लिए निर्वस्‍त्र होकर चर्च पहुंच जाएं, आपने खबर पढ़ ही ली होगी। आपको पता लगता तो आप सब भी वहीं पहुंच जाते। पर भारत में ऐसा करने का रिवाज नहीं है, इसलिए सबकी आंखें माकूल मौकों की तलाश में लगी रहती हैं।
पीपी को सभी देशी-विदेशी क्रिकेटप्रेमी पहचान गए हैं और उन्‍हें भीतर तक जानने की उत्‍कंठा मन में दबाए हैं। वे जो कभी पीएम से मिलने और पीएम बनने की चाहत रखते थे, उनकी चाहतों का गियर भी बदल गया है। इसी बीच एक अफवाह उड़ी थी कि पीपी दिल्‍ली के सीपी में देहदर्शन कार्यक्रम संपन्‍न करेगी। पूरे सीपी में जवानी आ गई थी, परंतु खबर विश्‍वस्‍त नहीं थी, इसलिए जल्‍दी ही भीड़ छंट भी गई।
विश्‍व कप की विजय का श्रेय पीपी को जाता है, चाहे कोई भी कितनी भी पीपनी बजाता रहे। पीपी ने पब्लिकली पब्लिक की, जो पीपनी बजाई है, उसी ने विरोधी टीम को भी हारने के लिए मानसिक तौर पर तैयार किया है। यह सच्‍चाई अब किसी से छिपी नहीं है।   पीपी का टोटका टटका नहीं है, खूब जोर का झटका है, झटका यह कहीं नहीं अटका, सबको भटका गया और विश्‍व कप भारत को दिला गया।  कहीं आप भी तो पीपी के इंतजार में सब काम-धाम छोड़कर, अभी तक बेनहाये टी.वी. के सामने धूनी रमाए तो नहीं बैठे हैं, अगर बैठे हैं तो आप साधु नहीं, स्‍वादु हैं।
आज दैनिक जनवाणी में प्रकाशित।
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भारतीय मीडिया सकारात्मक बदलाव के दौर से गुजर रहा है


जनवाणी के 25 साल पूरे होने पर दिल्ली में हुआ ऐतिहासिक राष्ट्रीय मीडिया सेमिनार
·         द संडे इंडियन और टाइम्स फाउंडेशन के संयुक्त आयोजन में जुटे टीवी और प्रिंट मीडिया के डेढ़ दर्जन दिग्गज संपादक और चैनल प्रमुख
·         प्रभु चावला ने कहा- प्रधानमंत्री की बैठक में भी नहीं जुटे थे इतने संपादक
·         मैनेजमेंट गुरू प्रो. अरिंदम चौधरी ने कहा –आम जनता की फिक्र करे मीडिया

नई दिल्लीः शनिवार की ढलती गुनगुनी दोपहर के बाद दिल्ली के कमानी ऑडिटोरियम का माहौल तल्ख था. देश के दिग्गज पत्रकारों ने मीडिया की वर्तमान भूमिका को जायज भी ठहराया तो उसकी खामियों को इंगित करते हुए आत्ममंथन की जरूरत भी बतायी. मौका था प्लानमैन मीडिया समूह की समाचार पत्रिका द संडे इंडियन और टाइम्स फाउंडेशन द्वारा आयोजित “जनवाणी से जनता की वाणी”विषयक सेमिनार का.  दरअसल ठीक 25 साल पहले सरकार नियंत्रित भारतीय दूरदर्शन पर शुरु हुआ था एक कार्यक्रम जनवाणी, जिसके माध्यम से पहली बार भारत में दर्शकों के राजनीतिज्ञों से सीधे सवाल पूछने का मौका मिला. उसके बाद सरकार की ओपन स्काई पॉलिसी आयी और शुरु हुआ निजी समाचार चैनलों का आगमन. और आज 25 साल बाद भारतीय आकाश में 600 से ज्यादा चैनल हैं, जो हर रोज सवाल पूछ रहें हैं. तो क्या 25 सालों में जनवाणी से शुरु हुए इस सफर में आज के चैनल जनता की वाणी बन गये हैं. या कहीं वे उच्छृंखल तो नहीं हो गये. ऐसे ही मौजूं सवालों पर आयोजित था यह विशेष राष्ट्रीय सेमिनार. जिसका उद्घाटन वरिष्ठ पत्रकार प्रभु चावला ने किया.

खचाखच भरे कमानी सभागार में आयोजित इस ऐतिहासिक सेमिनार का विषय पर्वतन करते हुए द संडे इंडियन के प्रधान संपादक व मैनेजमेंट गुरु प्रो. अरिंदम चौधरी ने सवाल उठाया कि क्या वास्तव में आज की मीडिया जनता की आवाज है? उन्होंने कहा कि 25 साल पहले देश में निजी समाचार चैनल नहीं थे, उस समय पहली बार दूरदर्शन पर “जनवाणी”कार्यक्रम शुरू हुआ जिसमें केंद्रीय मंत्री जनता के सवालों से रूबरू होते थे. आज सैकड़ों की तादाद में समाचार चैनल और अखबार हैं क्या वास्तव में हम जनता की आवाज उठाते हैं. श्री चौधरी ने कहा कि यह आत्ममंथन की घड़ी है, और जब हम अपने भीतर झांकते हैं तो पाते हैं कि वास्तव में हम अपनी दिशा भूल गये हैं. “जनवाणी” भले ही सरकार द्वारा आयोजित अपने प्रचार का माध्यम रहा, लेकिन उसने भारतीय मीडिया को एक नयी अवधारणा दी. उन्होंने कहा कि अब हमें अपनी दिशा तय करनी होगी और देश के आम लोगों की फिक्र करनी होगी, मीडिया में जनसरोकार वाले मुददों को प्रमुखता देनी होगी वरना हम यूं ही हाय-तौबा मचाते रहेंगे और अपने दायित्वों से मुंह छुपाते रहेंगे.
द न्यू इंडियन एक्सप्रेस के संपादकीय निदेशक प्रभु चावला ने कहा कि आज हम जनता की आवाज नहीं उठाते, ये सही है. हम अपनी दिशा भूल गये हैं, यह भी सही है लेकिन मीडिया ही है, जिसने देश को, देश के लोकतंत्र को बचा कर रखा है. हमें अपनी खामियों को दुरुस्त करना होगा. बाजार के ताकतवर होने से हमारी नैतिकता कमजोर हुई है. हमें अपनी साख को बरकरार रखते हुए जनोन्मुख होना होगा.“जनवाणी” की नियत अच्छी नहीं थी, लेकिन प्रयास बेहतर था. लेकिन हमें अच्छी नीयत के साथ अच्छे प्रयास करने होंगे. उन्होंने कहा कि यह सेमिनार इस मामले में सभी सेमिनारों से इतर है कि यहां प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक्स मीडिया के सभी दिग्गज मौजूद हैं, ऐसी उपस्थिति तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा आयोजित संपादकों की बैठक में भी नहीं थी.




सेमिनार की अध्यक्षता वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने की. सेमिनार में दूरदर्शन के महानिदेशकलीलाधर मंडलोई, आज समाज के समूह संपादकराहुल देव, अमर उजाला के सलाहकार संपादकअजय उपाध्याय, आईबीएन 7 के प्रबंध संपादकआशुतोष, दूरदर्शन के पूर्व डीडीजी एमपी लेले, टाइम्स फाउंडेशन के निदेशक पूरन चंद्र पांडे, जी न्यूज के प्रसिद्ध एंकर व वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी, साधना न्यूज चैनल के प्रमुख व ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसियेशन के महासचिव एन के सिंह, इंडिया न्यूज के प्रबंध संपादक कुर्बान अली, एनडीटीवी के कार्यकारी संपादक संजय अहिरवाल, न्यूज एक्सप्रेस चैनल के प्रमुख मुकेश कुमार, वरिष्ठ लेखक व चैनल पी 7 के प्रोग्रामिंग हेड शरद दत्त, दूरदर्शन के पूर्व चीफ प्रोड्यूसर कुबेर दत्त और लेखिका व मीडिया समीक्षक वर्तिका नंदा भी मौजूद थीं.
सभी अतिथियों का स्वागत करते हुए प्लानमैन मीडिया के प्रबंध संपादक सुतनु गुरु ने कहा कि मीडिया जनता के लिए होती है और वह जनता प्रति जवाबदेह है और वह अपनी जवाबदेही से नहीं मुकर सकती.

प्रख्यात पत्रकार अच्युतानंद मिश्र ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में कहा कि भारत में मीडिया अपने सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई है. अब इसके साख को बचाने का समय है. किसी लोकतंत्र में मीडिया इतनी मजबूर नहीं होनी चाहिए कि वह बाजार के सामने घुटने टेक दे. इस प्रवृति से बाहर आने की दिशा में कदम उठाने का समय है.

आईबीएन 7 के प्रबंध संपादक आशुतोष ने कहा कि हिंदुस्तान बदल रहा है, इस बदलाव के दौर में मीडिया भी बदल रही है लेकिन यह बदलाव सकारात्मक है. इस पर आंसू बहाने की जरुरत नहीं है. ये बात सच है कि 2004-05 और 2009 में मीडिया के कृत्यों से इसके साख पर बट्टा जरूर लगा. लेकिन इसने फिर खुद को संभाल लिया. दुनिया के जिस कोने में मीडिया स्वतंत्र है वहां मिस्र जैसे हालात पैदा नहीं हो सकते. भारत में भी ऐसा कुछ नहीं होने जा रहा. मीडिया ही है जिसने भारतीय समाज के मनोबल को ऊंचा रखा है.

आज समाज के समूह संपादक राहुल देव ने कहा कि मीडिया पर बाजार भारी है और इससे लड़ने की मीडिया के पास ताकत नहीं है. ऐसी स्थिति में इससे ज्यादा उम्मीद की कल्पना कैसे की जा सकती है. सबसे पहली जरुरत है कि मीडिया को बाजार के दबाव से मुक्त कराया जाए, हालांकि यह दुरुह कार्य है. लेकिन उम्मीदें बाकी हैं.

अमर उजाला के सलाहकार संपादक अजय उपाध्याय ने कहा कि भारतीय मीडिया अपनी सीमाओं का अतिक्रमण नहीं करती, संतुलित है, लेकिन यह लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है या नहीं, इस पर नये सिरे से मंथन करना होगा. मीडिया की जनपक्षधरता पर हमेशा से सवाल उठाये जाते रहे हैं. यह कोई नई बात नहीं है लेकिन यह भी सही है कि इन सारी चुनौतियों के बीच मीडिया जनता की आवाज को एक मंच जरुर देती है.
वरिष्ठ टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून वाजपेयी ने कहा कि आज मीडिया नफा-नुकसान के गणित को ध्यान में रख कर अपनी दिशा तय कर रही है. इसके लिए मीडिया को अकेले जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, पूरी व्यवस्था ही जिम्मेदार है. नैतिकता कहने की चीज हो गई है अपनाने की नहीं. वास्तव में वैकल्पिक बहस ही बंद हो गई है.

ब्रॉडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन के महासचिव और साधना न्यूज के  चैनल हेड एन के सिंह ने कहा कि जहां ज्यादा पैसा है वहीं टैम मीटर लगे हैं और वही समाचार चैनलों की दिशा तय करते हैं. जब तक टीआरपी के झमेले से चैनल मुक्त नहीं होंगे. जनपक्षधरता हाशिये पर रहेगी. उन्होंने कहा कि जहां तक कंटेंट का सवाल है, तो दो वर्षों में भारतीय मीडिया के कंटेंट का स्तर काफी बेहतर होगा, इसका विश्वास दिलाता हूं.

इंडिया न्यूज के प्रबंध संपादक कुर्बान अली ने कहा कि देश मीडिया पर बहुत ज्यादा निर्भर नहीं है. देश की जनता जागरूक है. एनडीए की फील गुड और शाइनिंग इंडिया को नकार कर अयोध्या मामले के फैसले के दिन देश में अमन रख कर जनता ने अपने जागरुक होने का सबूत दे दिया है. इस उपलब्धि में मीडिया का कोई रोल नहीं था. अब समय आ गया है कि मीडिया अपने साख और दायित्व तय करे.

एनडीटीवी इंडिया के कार्यकारी संपादक संजय अहिरवाल ने कहा कि अब खबरिया चैनलों को अपने कंटेंट पर ध्यान देना होगा, नहीं तो देश की जनता उन्हें नकार देगी और इसके साथ ही वे अपनी साख बरकरार नहीं रख पाएंगे. बाजार के दबाव और अपनी नैतिकता के बीच का कोई रास्ता निकालना होगा.

वरिष्ठ पत्रकार जफर आगा ने कहा कि वर्तमान दौर में टीआरपी ने समाचार चैनलों की दिशा तय कर दी है. ऐसे में सवाल उठता है कि क्या पत्रकारिता अब बेमतलब की चीज हो गई है.

मंच संचालन द संडे इंडियन हिंदी व भोजपुरी संस्करण के कार्यकारी संपादक तथा ब्रॉडकास्टर्स क्लब ऑफ इंडिया के कार्यकारी अध्यक्ष ओंकारेश्वर पांडेय ने किया. सेमिनार के समापन से पहले  प्रो. अरिंदम चौधरी ने पूरी चर्चा का सार संक्षेप रखा और इस ऐतिहासिक आयोजन में सहभागी बनने के लिए टाइम्स फाउंडेशन के निदेशक पूरन पांडेय तथा सेमिनार में आये मीडिया के दिग्गजों का आभार व्यक्त किया. आखिर में प्रो. अरिंदम चौधरी और श्री पूरन पांडेय ने सभी अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट कर उन्हें सम्मानित किया.  
भोपाल से राजू कुमार की रिपोर्ट
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