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"मेरा कंप्यूटर पगला गया"

दो दिन से तबियत खराब थी
डाक्टर साहब ने दो दो गोली
सुबह शाम की दी थी
कल तक सब ठीक ठाक
सा ही जा रहा था
पता नहीं शाम होते ही
ऎसा महसूस हो रहा था
कि कोई जबर्दस्ती कुछ
पिलाये जा रहा था
गिलास भी कोई कहीं
नजर नहीं आ रहा था
मेरा तो जो हुवा सो हुवा
कंप्यूटर खोला तो वो तो मेरे
से ज्यादा पगला रहा था
"उल्लूक टाईम्स" के ब्लाग
के साथ साथ "नुक्कड़" को
पता नहीं क्यों दिखा रहा था
हो सकता हो मेरे कंप्यूटर
को भी कोई गोली खिला
कर चकरा रहा था ।

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बैंड.......बाजा........बंदूक .......!

यह ज्यादा विचारणीय इसलिए भी है क्योंकि ये सिर्फ दुर्घटनायें नहीं हैं। समाज में मौजूद मानसिकता और अहम की भी बानगी है। यह भी एक तरह का शक्ति प्रर्दशन है जो मुझे किसी सामंती परंपरा से कम नहीं लगता। पूरी पोस्ट पढने के लिए यहाँ कृपया यहाँ जाये ........
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