लोग ख्याति से क्यों इतना जलते हैं
अपने कदम उनसे जरा न संभलते हैं
करते-कहते हैं उल्टा सीधा उटपटांग
बतलाते हैं सामने वाले को ही रांग
जंग करते हैं वह बिना पिए भंग
फिर भी कलुषित ही बहते हैं रंग
रहते हैं संग उनके फिर भी अच्छे नहीं ढंग
मन में उठती है विकृत विचारों की तरंग
बाबा पर करते हैं शक बे-वजह आंख मूंद
बाबा से लिपटते हैं देकर धन जैसे फफूंद
करते हैं सच में पैदा इतनी कलह
मन में शांति के लिए रहे न जगह
चढ़ना चाहते हैं कूद कूद कर सीढ़ी
बने साहित्यकार उनकी अगली पीढ़ी
संदेश ब्लॉगवासियों के लिए : याद रहे ऊपर ले जाने वाली सीढ़ी नीचे भी लाती है।



