कुमार विश्वास का अहंकार इन दिनों चरम पर है. यक़ी न हो तो आप उपर लगी कतरन को ध्यान से देखिये...


भारत के भावुक युवाओ : अपने में पहचाने की ताकत लाओ
अब देखिये ये दो पोस्ट

भारत के भावुक युवाओ : अपने में पहचाने की ताकत लाओ
| |||
| जन्म स्थान | पिलखुआ गाज़ियाबाद, उत्तर प्रदेश, भारत | ||
| कुछ प्रमुख कृतियाँ | एक पगली लड़की के बिन (1996), कोई दीवाना कहता है (2007) | ||
| जीवनी | कुमार विश्वास / परिचय | ||
अब देखिये ये दो पोस्ट
और कुछ औरों की कुछ अपनी पर: कविता का दाय ?, या इलाही ये माज़रा क्या है ?
", कुमार विश्वास मंचीय कविता की उस गौरवशाली परम्परा के साथ भी अन्याय कर बैठे हैं , जिसमें लोकप्रियता के साथ जन-पक्ष-धरता थी | ६२' के चाइना युद्ध पर सफल मंचीय कवि गोपाल सिंह नेपाली की पंक्तियाँ जनता के लिए कंठहार बन गयी थीं | कुमार की कविता में प्रसिद्धि होने के बाद भी सामाजिक सकारात्मकता नहीं है | कुमार , बच्चन-नेपाली-नीरज-रमानाथ अवस्थी-सोम ठाकुर आदि की सफल और उपयोगी मंचीय परम्परा के वाहक नहीं हैं | कुमार को अगर किसी की परम्परा से जोड़ा जा सकता है तो गुलशन नंदा - वेद प्रकाश शर्मा के ऐयारी गद्य की काव्यात्मक प्रवृत्ति के तौर पर बनने वाली परम्परा से जोड़ा जा सकता है जिसके लिए कविता विशुद्ध ऐशो-आराम की चीज रही हो | हुल्लड़ और कुल्हड़ कविता के दाय नहीं हो सकते | "
", कुमार विश्वास मंचीय कविता की उस गौरवशाली परम्परा के साथ भी अन्याय कर बैठे हैं , जिसमें लोकप्रियता के साथ जन-पक्ष-धरता थी | ६२' के चाइना युद्ध पर सफल मंचीय कवि गोपाल सिंह नेपाली की पंक्तियाँ जनता के लिए कंठहार बन गयी थीं | कुमार की कविता में प्रसिद्धि होने के बाद भी सामाजिक सकारात्मकता नहीं है | कुमार , बच्चन-नेपाली-नीरज-रमानाथ अवस्थी-सोम ठाकुर आदि की सफल और उपयोगी मंचीय परम्परा के वाहक नहीं हैं | कुमार को अगर किसी की परम्परा से जोड़ा जा सकता है तो गुलशन नंदा - वेद प्रकाश शर्मा के ऐयारी गद्य की काव्यात्मक प्रवृत्ति के तौर पर बनने वाली परम्परा से जोड़ा जा सकता है जिसके लिए कविता विशुद्ध ऐशो-आराम की चीज रही हो | हुल्लड़ और कुल्हड़ कविता के दाय नहीं हो सकते | "
लाल -बवाल पर



